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धीरेंद्र शास्त्री और संगीत रागी के बयानों से सियासी तूफान, क्या यादव वोट बैंक पर पड़ेगा असर?
Authored By: Mazhar Pathan
Published On: Friday, November 6, 2026
Last Updated On: Friday, November 6, 2026
भगवान कृष्ण पर धीरेंद्र शास्त्री की टिप्पणी और टीवी बहस में संगीत रागी के बयान से यूपी की राजनीति में हलचल है. सपा हमलावर है, बीजेपी पलटवार में जुटी है. जानकार क्या कहते हैं?
Authored By: Mazhar Pathan
Last Updated On: Friday, November 6, 2026
पिछले कुछ दिनों में दो बयानों ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल मचा दी है. दोनों सोशल मीडिया पर तेज़ी से फैले और अब चुनावी चर्चा का हिस्सा बन गए हैं. समाजवादी पार्टी इन पर आक्रामक है, जबकि बीजेपी कुछ असहज दिख रही है.
यह रिपोर्ट बीबीसी हिंदी में छपी खबर पर आधारित है. इसमें हर बात उसी के नाम से लिखी गई है जिसने कही, ताकि आप खुद तय कर सकें कि मामला कितना बड़ा है.
क्या हैं ये दो बयान?
पहला बयान कथावाचक धीरेंद्र शास्त्री का है, जिन्हें उनके अनुयायी बागेश्वर बाबा कहते हैं. उन्होंने भगवान राम और कृष्ण की तुलना करते हुए एक टिप्पणी की, जिस पर विवाद शुरू हो गया.
दूसरा बयान दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर संगीत रागी का है, जिन्हें आरएसएस से जुड़ा माना जाता है. एक टीवी बहस में उन पर सपा प्रवक्ता मनोज यादव ‘काका’ के लिए आपत्तिजनक और जातिसूचक शब्द इस्तेमाल करने का आरोप है.
दोनों ने बाद में माफ़ी मांगी. रागी ने कहा कि उनकी बात किसी खास समुदाय के लिए नहीं थी. शास्त्री ने कहा कि उनकी बात का गलत मतलब निकाला गया. फिर भी सपा का हमला जारी है.
सपा की मांग और विरोध प्रदर्शन
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव चाहते हैं कि शास्त्री के कार्यक्रम रद्द हों. प्रतापगढ़ के कुंडा में 17 नवंबर से उनकी कथा प्रस्तावित है. बुधवार को सपा कार्यकर्ताओं ने लखनऊ के हज़रतगंज थाने में उनके खिलाफ एफ़आईआर के लिए शिकायत दी.
मनोज यादव के समर्थन में प्रदर्शन हुए और रागी का पुतला जलाने की कोशिश की गई. विपक्ष के और नेताओं ने भी प्रतिक्रिया दी, जैसे संजय सिंह (आप), तेजस्वी यादव (आरजेडी) और सांसद पप्पू यादव.
बीजेपी के सामने क्या चुनौती है?
यूपी में विधानसभा चुनाव पास हैं, इसलिए सपा इन बयानों को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश कर सकती है. सपा के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि पार्टी चुनाव तक इन्हें उठाती रहेगी.
बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने कहा कि ऐसे बयानों से बचना चाहिए. साथ ही उनका आरोप है कि सपा नेताओं ने भी दूसरी जातियों पर टिप्पणियां की हैं और पार्टी हिंदुओं को बांटना चाहती है. उन्हें भरोसा है कि हिंदू बीजेपी के साथ रहेंगे.
जानकारों की राय
वरिष्ठ पत्रकार सुनीता ऐरन कहती हैं कि इसे सिर्फ़ सपा के फ़ायदे-नुकसान से नहीं देखना चाहिए. उनके मुताबिक कृष्ण के भक्त सिर्फ़ यदुवंशी नहीं हैं, गुजरात और दिल्ली से भी बड़ी संख्या में लोग मथुरा आते हैं. उनका मानना है कि बीजेपी और आरएसएस को खुलकर निंदा करनी चाहिए, वरना चुप्पी से मामला बिगड़ सकता है.
वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा का कहना है कि यादव बीजेपी के कोर वोटर नहीं रहे, पर पार्टी लंबे समय से इस वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है. उनके अनुसार शास्त्री की माफ़ी से बहुत फ़र्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि जो नुकसान होना था वह हो चुका है.
बीजेपी की यादव वोट वाली कोशिश पुरानी है
रिपोर्ट बताती है कि यह कोशिश नई नहीं है. 2017 में सत्ता में आने के बाद तत्कालीन उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कहा था कि पार्टी अब यादवों पर भी ध्यान देगी. इसके बाद यादव समुदाय के लोगों को सम्मान देना, उनके घर भोजन करना और संगठन में जगह देना जैसे कदम उठाए गए.
2022 के चुनाव से पहले मुलायम सिंह यादव की बहू अपर्णा यादव बीजेपी में शामिल हुईं. बाद में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव को भी यूपी में आगे किया गया. विनोद शर्मा इन सबको एक ही दिशा की कोशिश मानते हैं.
क्या बीजेपी पूरी तरह बैकफुट पर है?
ऐसा कहना भी सही नहीं होगा. बीजेपी की राजनीति समझने वाले एक व्यक्ति ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि राम-कृष्ण पर बहस जितनी बढ़ेगी, पार्टी को उतना फ़ायदा होगा.
बीजेपी प्रवक्ता नवीन श्रीवास्तव ने अखिलेश और तेजस्वी पर निशाना साधते हुए कहा कि चुनाव आते ही उन्हें कृष्ण याद आने लगे हैं. उन्होंने पूछा कि जो अखिलेश राम मंदिर नहीं गए, वे मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि कब जाएंगे और क्या वे उस आंदोलन का समर्थन करते हैं. यानी बीजेपी इस विवाद को सपा से उसका रुख पूछने का मौका बनाना चाहती है.
इस रणनीति पर उठे सवाल
वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी का कहना है कि अभी कृष्ण जन्मभूमि चुनावी बहस के केंद्र में नहीं है. अगर यह मुद्दा बना भी, तो बीजेपी से पूछा जाएगा कि एक तरफ मंदिर की बात है और दूसरी तरफ कृष्ण पर ऐसी टिप्पणियां, तो पार्टी खुलकर आलोचना क्यों नहीं करती.
उन्हें यह भी आशंका है कि दोनों बयान अनजाने में दिए गए नहीं लगते. उनका मानना है कि इनसे यादव वोट और ज़्यादा एकजुट हो सकता है, और कांग्रेस के कुछ यादव नेता, जो सपा में नहीं जाना चाहते, वे बीजेपी में आने से भी हिचक सकते हैं.
आगे क्या देखना होगा?
अभी साफ़ नहीं है कि यह मुद्दा चुनाव तक चलेगा या जल्द ठंडा पड़ जाएगा. सपा इसे बड़ा सवाल बनाने की कोशिश में है और बीजेपी इसे अपने पक्ष में मोड़ने में. कुंडा की कथा और आने वाले दिनों के बयान इसकी दिशा तय करेंगे.














