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एक हफ्ते में दो चक्रवातों ने आंध्र प्रदेश को झकझोरा, अल नीनो और गर्म समुद्र ने बढ़ाई मौसम वैज्ञानिकों की चिंता
Authored By: Mazhar Pathan
Published On: Tuesday, November 3, 2026
Last Updated On: Tuesday, November 3, 2026
आंध्र प्रदेश के तट पर महज पांच से छह दिनों के अंतराल में दो चक्रवाती तूफानों ने दस्तक दी. पहले चक्रवात अर्नब के बाद अब मुरासु ने भारी बारिश और तेज हवाओं से जनजीवन प्रभावित किया है. IMD के मुताबिक, लगातार दो तूफानों का आना महज संयोग हो सकता है, लेकिन मजबूत अल नीनो, समुद्र का बढ़ता तापमान और मौसमी परिस्थितियां इस खतरे को बढ़ाने में भूमिका निभा रही हैं. आखिर बंगाल की खाड़ी में ऐसा क्या बदल रहा है, जिसका असर देश के दूसरे हिस्सों के मौसम पर भी दिखाई दे सकता है?
Authored By: Mazhar Pathan
Last Updated On: Tuesday, November 3, 2026
पांच दिनों में दो तूफान, आंध्र प्रदेश में बढ़ी मुश्किलें
भारत के पूर्वी तट पर नवंबर की शुरुआत मौसम के लिहाज से काफी चुनौतीपूर्ण रही है. आंध्र प्रदेश को एक सप्ताह के भीतर दो चक्रवाती तूफानों का सामना करना पड़ा. पहले चक्रवात अर्नब ने 28 अक्टूबर को राज्य के तटीय इलाकों को प्रभावित किया और इसके कुछ ही दिनों बाद 3 नवंबर की सुबह मुरासु ने दक्षिण आंध्र प्रदेश के तट पर दस्तक दे दी.
लगातार दो तूफानों ने राज्य में बारिश, तेज हवाओं और बाढ़ जैसी परिस्थितियों का खतरा बढ़ा दिया. इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि क्या समुद्र का बढ़ता तापमान और बदलती जलवायु ऐसी मौसमी घटनाओं को ज्यादा प्रभावशाली बना रही है?
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के महानिदेशक मृत्युंजय मोहपात्रा के मुताबिक, कम समय में दो चक्रवातों का आना अपने आप में किसी निश्चित पैटर्न का संकेत नहीं है. हालांकि, इस साल मजबूत अल नीनो की स्थिति और समुद्र का असामान्य तापमान मौसम की परिस्थितियों को प्रभावित कर रहे हैं.
अर्नब के बाद मुरासु ने कैसे बढ़ाई परेशानी?
28 अक्टूबर को चक्रवात अर्नब ने आंध्र प्रदेश के तट को प्रभावित किया था. इसके बाद 3 नवंबर की सुबह गंभीर चक्रवाती तूफान मुरासु ने नेल्लोर और नरसापुर के बीच ओंगोल के नजदीक तट पार किया.
IMD के अनुसार, मुरासु के लैंडफॉल के दौरान हवा की रफ्तार 100 से 110 किलोमीटर प्रति घंटे थी, जबकि झोंकों की गति 120 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच गई. तूफान के साथ भारी बारिश ने तटीय इलाकों में जलभराव और परिवहन संबंधी परेशानियां बढ़ाईं. कई स्थानों पर पेड़ और बिजली के खंभे गिरने की खबरें भी सामने आईं.
दोनों तूफानों के बीच कम समय का अंतर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पहले तूफान के बाद प्रभावित इलाकों को सामान्य स्थिति में लौटने का पर्याप्त समय नहीं मिला. किसानों, मछुआरों और स्थानीय कारोबारियों के सामने दोबारा नुकसान का खतरा खड़ा हो गया.
अल नीनो क्या है और इससे चक्रवातों का क्या संबंध है?
अल नीनो प्रशांत महासागर की एक प्राकृतिक जलवायु घटना है. इसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्सों में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है. इसका प्रभाव दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बारिश, तापमान और हवाओं के पैटर्न पर पड़ता है.
विश्व मौसम संगठन (WMO) की 8 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल अल नीनो की स्थिति लगातार मजबूत हो रही है. अक्टूबर से दिसंबर के दौरान प्रशांत महासागर के नीनो-3.4 क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से लगभग 3.7 डिग्री सेल्सियस अधिक रहने का अनुमान लगाया गया है. यह 2015-16 के पिछले रिकॉर्ड से भी ज्यादा हो सकता है.
हालांकि, अल नीनो का मतलब यह नहीं है कि बंगाल की खाड़ी में चक्रवातों की संख्या अपने आप बढ़ जाएगी. IMD महानिदेशक के मुताबिक, अल नीनो वाले वर्षों में भारत के आसपास बनने वाले चक्रवातों की संख्या सामान्य से कम भी रह सकती है. इस साल भी मानसून और प्री-मानसून अवधि में चक्रवात नहीं बनने के बाद अर्नब और मुरासु दो प्रमुख चक्रवात रहे हैं.
गर्म समुद्र कैसे बढ़ाता है तूफानों की ताकत?
चक्रवातों को ताकत देने में समुद्र की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है. समुद्र की सतह का तापमान अधिक होने पर पानी से वाष्पीकरण बढ़ता है. इससे वातावरण में नमी की मात्रा बढ़ सकती है, जो अनुकूल परिस्थितियों में चक्रवात को ऊर्जा देती है.
आमतौर पर कोई बड़ा चक्रवात समुद्र की सतह के गर्म पानी को हटाकर गहराई का अपेक्षाकृत ठंडा पानी ऊपर लाता है. इससे समुद्र की सतह ठंडी हो सकती है और तूफान को आगे ऊर्जा मिलने की प्रक्रिया प्रभावित होती है. लेकिन अगर समुद्र की गहराई में भी पर्याप्त गर्मी मौजूद हो, तो सतह दोबारा गर्म हो सकती है.
बंगाल की खाड़ी पर प्रकाशित वैज्ञानिक शोध भी समुद्र के बढ़ते तापमान को लेकर चिंता जाहिर करते हैं. वर्ष 1982 से 2022 तक के आंकड़ों पर आधारित एक अध्ययन में बंगाल की खाड़ी के सतही तापमान में औसतन 0.016 डिग्री सेल्सियस प्रति वर्ष की वृद्धि दर्ज की गई. शोधकर्ताओं के मुताबिक, समुद्र की ऊपरी और गहरी परतों का तापमान चक्रवात बनने और उनकी तीव्रता को प्रभावित कर सकता है.
क्या पूरे देश के मौसम पर भी पड़ता है असर?
बंगाल की खाड़ी में बनने वाले चक्रवातों का प्रभाव केवल तटीय राज्यों तक सीमित नहीं रहता. तूफान जब समुद्र से जमीन की ओर बढ़ता है, तो अपने साथ बड़ी मात्रा में नमी लेकर आता है. जमीन से टकराने के बाद कमजोर पड़ने पर भी यह नमी वातावरण में बनी रह सकती है.
यदि इस दौरान उत्तर-पश्चिम भारत से आने वाला पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) सक्रिय हो, तो दोनों मौसमी प्रणालियों के मिलने से कुछ क्षेत्रों में बारिश की परिस्थितियां बन सकती हैं. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर चक्रवात का असर पूरे देश में बारिश के रूप में दिखाई देगा. इसका प्रभाव तूफान की दिशा, उसकी बची हुई नमी और दूसरे मौसमी सिस्टम की स्थिति पर निर्भर करता है.
मुरासु से किन राज्यों में बारिश का खतरा?
मुरासु के प्रभाव से आंध्र प्रदेश के तटीय और आसपास के क्षेत्रों में भारी बारिश हुई. IMD ने तेलंगाना और छत्तीसगढ़ सहित कुछ अन्य क्षेत्रों में भी बारिश की संभावना जताई थी. तूफान के कमजोर होने के साथ इसकी तीव्रता और प्रभाव का दायरा बदलने की संभावना रहती है. इसलिए मौसम विभाग के पूर्वानुमान और स्थानीय प्रशासन की चेतावनियों पर ध्यान देना जरूरी है. दूसरी तरफ, उत्तर भारत में मौसम की स्थिति अलग रह सकती है. दिल्ली-एनसीआर, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे क्षेत्रों में चक्रवात का सीधा प्रभाव पड़ना जरूरी नहीं है. वहां मौसम पश्चिमी विक्षोभ और स्थानीय मौसमी परिस्थितियों से अधिक प्रभावित होता है.
किसानों के लिए क्यों बढ़ी चिंता?
आंध्र प्रदेश में लगातार दो चक्रवातों का आना किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है. पहले तूफान से खेतों और फसलों को नुकसान पहुंचने के बाद दूसरे तूफान ने फिर से कृषि गतिविधियों को प्रभावित किया.
खासतौर पर धान, मक्का, कपास और अरहर जैसी फसलों के लिए खेतों में लंबे समय तक पानी जमा रहना नुकसानदायक हो सकता है. ऐसी परिस्थितियों में कृषि विशेषज्ञों की सलाह है कि किसान खेतों से अतिरिक्त पानी निकालने और फसलों को बचाने के लिए स्थानीय कृषि विभाग के निर्देशों का पालन करें. बारिश और तेज हवाओं के दौरान कटाई तथा बुवाई से जुड़े कामों में सावधानी बरतना भी जरूरी है.
क्या जलवायु परिवर्तन भी है इसकी एक वजह?
समुद्र का लगातार गर्म होना वैज्ञानिकों के लिए चिंता का विषय है. जलवायु परिवर्तन के कारण महासागरों में अतिरिक्त गर्मी जमा हो रही है. इसका असर समुद्री तापमान, नमी और चक्रवातों की परिस्थितियों पर पड़ सकता है. वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि गर्म समुद्र कुछ परिस्थितियों में चक्रवातों को तेजी से ताकतवर बनाने और उनकी तीव्रता बनाए रखने में मदद कर सकता है. हालांकि, किसी एक चक्रवात को सीधे जलवायु परिवर्तन का परिणाम बताना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा. इसके लिए लंबे समय के मौसम संबंधी आंकड़ों और विस्तृत अध्ययन की जरूरत होती है. बंगाल की खाड़ी के तापमान में दर्ज बढ़ोतरी और समुद्र में बढ़ती गर्मी इस बात की ओर इशारा करती है कि भविष्य में चक्रवातों से निपटने के लिए बेहतर तैयारी जरूरी होगी.
आगे क्या संकेत दे रहा है मौसम?
इस साल मजबूत अल नीनो की स्थिति दिसंबर तक अपने चरम पर पहुंच सकती है. WMO और अमेरिकी मौसम एजेंसी NOAA के पूर्वानुमानों के मुताबिक, इसका प्रभाव 2027 की शुरुआत तक बने रहने की संभावना है. हालांकि, इसका असर भारत के हर राज्य में एक जैसा नहीं होगा. कहीं बारिश सामान्य से कम हो सकती है, तो कहीं तापमान सामान्य से अधिक रह सकता है.
आंध्र प्रदेश में अर्नब और मुरासु के लगातार आने से यह स्पष्ट हो गया है कि चक्रवाती मौसम के दौरान सतर्कता कितनी जरूरी है. समुद्र का बढ़ता तापमान, बदलती मौसमी परिस्थितियां और मजबूत अल नीनो भविष्य के मौसम पूर्वानुमानों को और महत्वपूर्ण बना रहे हैं. ऐसे में समय रहते चेतावनी, सुरक्षित निकासी और आपदा प्रबंधन ही जान-माल के नुकसान को कम करने में सबसे अहम भूमिका निभाएंगे.
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