ग्रीन पटाखों का सच: सुप्रीम कोर्ट ने दिवाली पर क्यों दी 4 घंटे की इजाजत? क्या कम होगा प्रदूषण?
Authored By: Rajeev Mandal
Published On: Tuesday, November 3, 2026
Updated On: Tuesday, November 3, 2026
दीपावली से महज 5 दिन पहले देश की शीर्ष अदालत ने एक अहम फैसला सुनाया. अदालत ने दिल्ली-एनसीआर में 7 और 8 नवंबर की सुबह 6-7 बजे और रात 8-10 बजे तक हरित पटाखे (ग्रीन पटाखे) चलाने की इजाजत दे दी है. यह लगातार दूसरा साल है जब अदालत ने ग्रीन पटाखा चलाने की अनुमति दी है. आइये समझते हैं ग्रीन पटाखे कैसे होते हैं और क्या वाकई इससे प्रदूषण पर लगाम लगती है….
Authored By: Rajeev Mandal
Updated On: Tuesday, November 3, 2026
ग्रीन पटाखे (Green Crackers) कोई प्रदूषण-फ्री पटाखे नहीं हैं. इन्हें भारत की लैब CSIR-NEERI ने बनाया है. ये दिखने, आवाज और रोशनी में आम पटाखों जैसे ही हैं, पर इनके केमिकल फॉर्मूले को बदल कर प्रदूषण कम किया गया है. हर डिब्बे पर QR कोड होता है जिससे NEERI सर्टिफिकेशन चेक होता है. ग्रीन पटाखा प्रदूषण कम करता है, खत्म नहीं करता. इसीलिए वैज्ञानिक इसे अब ग्रीन नहीं, REF – Reduced Emission Fireworks कहते हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने 29 अक्टूबर के आदेश में कहा कि 2024 में दिल्ली-NCR में पटाखों पर पूरा बैन लगाया गया था, पर AQI में कोई खास सुधार नहीं हुआ. पूरा बैन लगने से कालाबाजारी बढ़ गई, आम पटाखे ही ग्रीन बताकर बिकने लगे. कोर्ट के पास इस बात का पर्याप्त डेटा नहीं है कि पूरा बैन ही सबसे अच्छा उपाय है.
इसलिए रेगुलेटेड अप्रोच के तहत सिर्फ 7 और 8 नवंबर को, सुबह 6-7 बजे और शाम 8-10 बजे तक ही फोड़ने की अनुमति दी गई है. 9 नवंबर से फिर पूरा तरह से पटाखों पर बैन लग जाएगा. यहां तक कि 300 मीटर के दायरे में अस्पताल, नर्सिंग होम, स्कूल, ओल्ड एज होम के पास No-Cracker Zone रहेगा. लड़ी, बेरियम वाले पटाखे, ऑनलाइन बिक्री सब बैन.
कितना प्रदूषण कम होता है?
NEERI के दावे के मुताबिक –
- PM 2.5 / PM10 – 30% से 35% तक कम
- SO2 और NOx गैस – 20% से 30% तक कम
- आवाज – 110 डेसिबल से घट कर 105 डेसिबल
यानी शोर कम करता है, खत्म नहीं करता.
कौन-कौन से तत्व कम होते हैं?
- बेरियम नाइट्रेट – पूरी तरह बैन, यही हरे रंग और सबसे ज्यादा धुएं का कारण है.
- एल्युमीनियम पाउडर – 50% तक कम
- पोटेशियम नाइट्रेट – कम मात्रा
- डस्ट सप्रेसेंट – पानी के छींटे, धूल को दबाने के लिए केमिकल मिलाया जाता है, जबकि सामान्य पटाखों में बारूद = सल्फर + चारकोल + पोटेशियम नाइट्रेट + एल्युमीनियम + बेरियम + स्ट्रोंशियम + कॉपर + लेड, यही रंग और धमाका बनाते हैं.
एक लड़ी वाला पटाखा जलाने से 1 घंटे में AQI 300 से 600 तक जा सकता है. 2025 दिवाली पर दिल्ली का AQI 500 पार कर गया था.
स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर
दरअसल, पटाखों से पैदा प्रदूषण हमारे स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक है. PM2.5 सीधे खून में जाता है, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, COPD ट्रिगर होता है. SO2, NOx से आंख-नाक में जलन की शिकायत होती है. BP का बढ़ना और हार्ट अटैक का खतरा 2 गुना बढ़ जाता है. सबसे ज्यादा असर बच्चे-बुजुर्गों पर पड़ता है. उनकी इम्यूनिटी कम हो जाती है. 125 डेसिबल से ज्यादा आवाज से सुनने की क्षमता पर असर पड़ता है.
कोर्ट ने इसीलिए CPCB को कहा है कि 2-6 नवंबर, 7-8 नवंबर और 9-30 नवंबर तक रोज AQI, मिट्टी और पानी के सैंपल लेकर रिपोर्ट दें, ताकि पता चल सके कि ग्रीन पटाखों से सच में कितना फर्क पड़ा.
कुल मिलाकर कह सकते हैं की ग्रीन पटाखे छलावा नहीं, पर आधा सच जरूर हैं. ये ग्रीन नहीं, सिर्फ ग्रीनवाशिंग है.
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