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खालिदा जिया निधन: चार दशकों की सियासी जंग के एक ध्रुव का अंत
Authored By: गुंजन शांडिल्य
Published On: Tuesday, December 30, 2025
Last Updated On: Tuesday, December 30, 2025
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया का निधन सिर्फ एक नेता का जाना नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक युग का अंत है, जिसमें बांग्लादेश की राजनीति दो शक्तिशाली महिलाओं के संघर्ष के इर्द-गिर्द घूमती रही. उनके समर्थकों के लिए वह साहस और परंपरा का प्रतीक थीं. वहीं आलोचकों के लिए विवादों से घिरी नेता.
Authored By: गुंजन शांडिल्य
Last Updated On: Tuesday, December 30, 2025
Khaleda Zia Death News: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की प्रमुख रहीं खालिदा जिया का मंगलवार (30 दिसंबर) को 80 वर्ष की आयु में निधन हो गया. लंबी बीमारी से जूझ रहीं खालिदा के निधन के साथ ही बांग्लादेश की राजनीति का एक निर्णायक अध्याय खत्म हो गया. उनके राजनीतिक जीवन की कहानी सिर्फ सत्ता और विपक्ष की नहीं, बल्कि एक तीखी प्रतिद्वंद्विता की भी है, जिसने दशकों तक पूरे देश की राजनीति को दिशा दी.
उनकी राजनीतिक पार्टी BNP के मुताबिक, ‘खालिदा जिया लंबे समय से गंभीर बीमारियों से पीड़ित थीं. उन्हें लिवर सिरोसिस, गठिया, डायबिटीज के साथ-साथ सीने और दिल से जुड़ी समस्याएं थीं. 2025 की शुरुआत में वह इलाज के लिए लंदन गई थीं, जहां चार महीने बिताने के बाद वह बांग्लादेश लौट आईं थीं. लौटने के कुछ ही महीनों बाद उनका निधन हो गया.
असरदार खालिदा
खालिदा जिया 2006 के बाद कभी सत्ता में वापस नहीं आईं. इसके बावजूद उनका राजनीतिक असर खत्म नहीं हुआ था. जेल, हाउस अरेस्ट और गंभीर बीमारी के बावजूद बीएनपी और उसके समर्थकों में उनकी लोकप्रियता बनी रही. यही वजह है कि आगामी फरवरी में होने वाले संसदीय चुनावों में उनकी पार्टी को सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है.
उनके बेटे और पार्टी के कार्यवाहक अध्यक्ष तारिक रहमान हाल ही में लगभग 17 साल के स्व-निर्वासन के बाद देश लौटे हैं. 60 वर्षीय तारिक को पार्टी का चेहरा और प्रधानमंत्री पद का प्रमुख उम्मीदवार माना जा रहा है. खालिदा की मृत्यु ऐसे समय हुई है, जब बांग्लादेश एक बड़े राजनीतिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है.
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार
अगस्त 2024 में छात्रों के नेतृत्व वाले विद्रोह के बाद शेख हसीना की सरकार गिर गई थी. इसके बाद नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी. इस घटनाक्रम ने बांग्लादेश की राजनीति की दशकों पुरानी धुरी (हसीना बनाम खालिदा) को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया.
नवंबर 2024 में शेख हसीना को छात्र विरोध प्रदर्शनों पर घातक कार्रवाई के लिए उनकी अनुपस्थिति में मौत की सज़ा सुनाई गई थी. यह वही हसीना थीं, जिनके साथ खालिदा जिया की दुश्मनी बांग्लादेश की राजनीति की पहचान बन गई थी.
अनिच्छुक नेता से प्रधानमंत्री तक
खालिदा जिया की राजनीति में एंट्री किसी महत्वाकांक्षी नेता की तरह नहीं हुई थी. उन्हें लंबे समय तक शर्मीली और अपने दो बेटों की परवरिश में लगी एक घरेलू महिला के रूप में जाना जाता था. लेकिन 1981 में उनके पति, सैन्य नेता और तत्कालीन राष्ट्रपति जियाउर रहमान की, तख्तापलट की कोशिश में, हत्या ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी.
तीन साल बाद खालिदा ने बीएनपी की कमान संभाली. इसकी स्थापना उनके पति ने की थी. उन्होंने ‘बांग्लादेश को गरीबी और आर्थिक पिछड़ेपन से मुक्त कराने’ का संकल्प लिया और राजनीति के केंद्र में आ गईं.
पहले हसीना के साथ गठबंधन, फिर दुश्मनी
खालिदा जिया ने शेख हसीना के साथ मिलकर 1990 में सैन्य शासक हुसैन मोहम्मद इरशाद के खिलाफ लोकतांत्रिक आंदोलन का नेतृत्व किया. इस आंदोलन ने इरशाद को सत्ता से बेदखल कर दिया, लेकिन दोनों नेताओं का यह साथ ज्यादा दिन नहीं चला.
जल्द ही यह सहयोग कड़वी दुश्मनी में बदल गया. बांग्लादेश में दोनों (शेख हसीना और खालिदा जिया) को ‘लड़ने वाली बेगम’ कहा जाने लगा. यह मुहावरा बांग्लादेश की राजनीति में महिला नेतृत्व के टकराव का प्रतीक बन गया.
पहली महिला प्रधानमंत्री
1991 में हुए पहले स्वतंत्र चुनाव में खालिदा जिया ने शेख हसीना को अप्रत्याशित रूप से हरा दिया. जमात-ए-इस्लामी के समर्थन से मिली, इस जीत ने उन्हें बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बना दिया. वह बेनज़ीर भुट्टो के बाद किसी मुस्लिम बहुल देश में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई, दूसरी महिला प्रधानमंत्री थीं.
अपने पहले कार्यकाल में खालिदा ने राष्ट्रपति प्रणाली को समाप्त कर संसदीय प्रणाली बहाल की. विदेशी निवेश पर लगे प्रतिबंध हटाए और प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य व मुफ्त बनाया.
वापसी, आरोप और हिंसा
वर्ष 1996 का चुनाव उनकी पार्टी हार गई. उस हार के बाद 2001 में खालिदा ने जोरदार वापसी की. लेकिन उनका दूसरा कार्यकाल इस्लामी आतंकवाद के उभार और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा रहा. 2004 में शेख हसीना की रैली पर हुए ग्रेनेड हमले ने राजनीतिक टकराव को और जहरीला कर दिया. हमले में 20 से अधिक लोगों की मौत हुई और सैकड़ों घायल हुए थे. इस मामले में तारिक रहमान को दोषी ठहराया गया. जबकि उनकी पार्टी बीएनपी ने इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया.
जेल, नज़रबंदी और बरी
2006 में राजनीतिक हिंसा के बीच सेना समर्थित अंतरिम सरकार आई और खालिदा व हसीना दोनों को जेल भेजा गया. 2018 में भ्रष्टाचार के एक मामले में खालिदा को दोषी ठहराया गया और उन्हें जेल हुई. खराब स्वास्थ्य के कारण 2020 में उन्हें घर में नज़रबंद कर दिया गया.
अगस्त 2024 में हसीना के सत्ता से हटने के बाद खालिदा को रिहाई मिली और 2025 की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें और तारिक रहमान को भ्रष्टाचार के मामले में बरी कर दिया.
एक युग का अंत
बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री से लेकर जेल, नज़रबंदी और फिर बरी होने तक खालिदा जिया का राजनीतिक सफर संघर्ष से परिपूर्ण रहा. उनका शेख हसीना के साथ दशकों चली प्रतिद्वंद्विता ने बांग्लादेश की राजनीति को आकार दिया. इसमें कोई शक नहीं कि खालिदा जिया ने बांग्लादेश की राजनीति पर अमिट छाप छोड़ी. एक ऐसी छाप, जो उनके जाने के बाद भी लंबे समय तक महसूस की जाती रहेगी.
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