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दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोप का सबसे बड़ा पलायन: जाने कहां और क्यों हो रहा पलायन
Authored By: गुंजन शांडिल्य
Published On: Tuesday, January 20, 2026
Last Updated On: Tuesday, January 20, 2026
रूसी हमले के बाद यूक्रेन मानवीय त्रासदी में फंसा हुआ है. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शायद ही किसी यूरोपियन लोगों ने ऐसी त्रासदी की कल्पना की होगी. मानवीय त्रासदी की स्थिति यह है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़ी संख्या में यूक्रेनी नागरिक को पलायन होने पर मजबूर होना पड़ा हैं.
Authored By: गुंजन शांडिल्य
Last Updated On: Tuesday, January 20, 2026
European Migration Crisis: करीब चार साल पहले, 22 फरवरी 2022 को यूक्रेन की सुबह अचानक सायरनों की आवाज़ से गूंज उठी. सायरनों की आवाज किसी खतरे की संकेत थी. यूक्रेन के कई शहरों पर एक के बाद एक रूसी मिसाइलें गिरने लगीं. कई रिहायशी इलाकों में बमबारी शुरू हो गई. आम लोगों की कुछ समझ आता, तब तक भारी नुकसान हो चुका था.
उसके बाद आम यूक्रेनी नागरिकों के सामने सिर्फ एक ही सवाल बचा था. जिंदा रहना है या बमबारी में सैनिकों की तरह शहीद होना है. यदि जिंदा रहना है, तो भागना होगा. अधिकांश आम नागरिकों ने अपने परिवार के साथ अपने घर, अपनी भूमि को छोड़ने का मन बनाया.
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़ी त्रासदी
रूसी हमले के बाद यूक्रेन मानवीय त्रासदी में फंस गया. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शायद ही किसी यूरोपियन लोगों ने ऐसी त्रासदी की कल्पना की होगी. ऐसी त्रासदी यूरोप ने सिर्फ दूसरे विश्व युद्ध के दौर में देखी थी. दूसरे विश्व युद्ध के समय भी यूरोप में बड़े स्तर पर पलायन हुआ था.
यूक्रेन की स्थिति उससे कम भयावह भी नहीं है. फर्क सिर्फ इतना है कि दूसरे विश्व युद्ध के दौर में विस्थापन कई वर्षों में हुआ था, वहीं यूक्रेन में कुछ ही महीनों में हो गया.
आज हालात ये हैं कि यूक्रेन से विस्थापित लोगों की संख्या दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोप के किसी भी संघर्ष से कहीं ज्यादा बताई जा रही है.
हर चौथा यूक्रेनी बना शरणार्थी
यूक्रेन सरकार के आंकड़ों के मुताबिक युद्ध शुरू होने से पहले वहां की आबादी करीब 4.2 करोड़ थी. संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के आंकड़े बताते हैं कि रूस संघर्ष के बाद यूक्रेन के करीब एक करोड़ लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हो चुके हैं.
यानी हर चार में से एक यूक्रेनी अब अपने ही देश में या देश के बाहर शरणार्थी की ज़िंदगी जी रहा है.
दूसरे विश्व युद्ध के शरणार्थी
द्वितीय विश्व युद्ध की शुरूआत 1939 में हुआ था. यह करीब सात साल (1945) तक चला था. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान यूरोप में अनुमानित 3 से 4 करोड़ लोग विस्थापित हुए थे. बताया जाता है कि तब यह पलायन लगभग सात साल तक चली थी. यूक्रेन में पलायन की भयावह तस्वीर कुछ महीनों में ही सामने आ गई. यही वजह है कि इस संकट को आधुनिक यूरोप का सबसे बड़ा पलायन कहा जा रहा है.
यूक्रेन के भीतर भी उजड़ रही ज़िंदगी
पलायन सिर्फ सीमाओं के पार नहीं हुआ है. लाखों लोग यूक्रेन के अंदर ही सुरक्षित माने जाने वाले इलाकों की ओर पलायन किए हैं. राजधानी कीव समेत कई शहरों में स्कूल, खेल स्टेडियम, सामुदायिक भवन और खाली फैक्ट्रियां अस्थायी राहत शिविरों में बदल दी गईं.
इन कैंपों में खाने-पीने का सामान, कंबल, दवाइयां और प्राथमिक इलाज उपलब्ध कराया जा रहा है. फिर भी सामान्य दिनों की तुलना में जरूरत के मुकाबले ये इंतज़ाम बेहद कम बताए जाते हैं. बमबारी वाले इलाकों में लोग बेसमेंट, मेट्रो स्टेशनों और अंडरग्राउंड शेल्टर में रहने को मजबूर हैं.
बीमार हो रहे बच्चे
यूक्रेन में सर्दियों के दौरान तापमान माइनस 18 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है. लगातार हमलों के कारण बिजली कटौती आम हो गई है. इससे बिजली पर चलने वाले हीटिंग सिस्टम ठप हो चुके हैं. ठंड से बचने के लिए लोग खिड़कियों की दरारों में कपड़े और खिलौनों की स्टफिंग भर रहे हैं. कहीं आग जलाई जा रही है. ब्लैकआउट के चलते रातें अंधेरे में गुजर रही हैं.
यूनिसेफ के मुताबिक, इस संकट का सबसे गंभीर असर पांच साल से कम उम्र के बच्चों पर पड़ रहा है. इन बच्चों में कुपोषण, बीमारियां और मानसिक तनाव तेजी से बढ़ रहे हैं.
पोलैंड: सबसे अधिक शरणार्थी
जंग शुरू होते ही यूक्रेनी नागरिकों का सबसे बड़ा रुख पोलैंड की ओर रहा. दोनों देशों के बीच करीब 530 किलोमीटर लंबी सीमा है. पोलैंड ने शुरुआत में बिना वीज़ा लाखों शरणार्थियों को प्रवेश दिया. जबकि पोलैंड अपने सख्त शरणार्थी रुख के लिए जाना जाता था. यूक्रेनी शरणार्थियों के लिए पोलैंड में रेलवे स्टेशनों, स्कूलों और सामुदायिक भवनों को राहत केंद्र बनाया गया है.
स्थानीय लोगों का विरोध
पोलिश सरकार की ओर से शरणार्थियों को मुफ्त इलाज, रहने की जगह और अस्थायी तौर पर काम करने की अनुमति भी दी गई है. लेकिन जल्द ही पोलैंड में इसका दबाव दिखने लगा. शरणार्थियों के कारण वहां घरों के किराए बढ़ने लगे. स्कूलों और अस्पतालों में भीड़ बढ़ गई.
कुछ इलाकों में स्थानीय लोगों का विरोध प्रदर्शन भी सामने आया. इसके बाद संयुक्त राष्ट्र की पहल पर अन्य देशों ने जिम्मेदारी बांटनी शुरू की.
यूरोप और अमेरिका ने भी खोले दरवाज़े
यूएनएचसीआर के अनुसार, करीब 53 लाख यूक्रेनी नागरिक पूरे यूरोप में शरणार्थी के रूप में फैल चुके हैं. जर्मनी ने बड़ी संख्या में शरणार्थियों को रहने, काम करने और सामाजिक सहायता दी. चेक रिपब्लिक छोटा देश होने के बावजूद, हजारों यूक्रेनियों के लिए अहम शरणस्थली बना है.
इसके अलावा रोमानिया ने सीमावर्ती इलाकों में राहत कैंप और ट्रांजिट सुविधाएं दीं हैं. इटली और स्पेन ने खासतौर पर महिलाओं और बच्चों को संरक्षण दिया है. यूरोप से बाहर भी यूक्रेनी शरणार्थियों को मदद दी गई. अमेरिका ने यूक्रेनियों के लिए विशेष वीज़ा कार्यक्रम शुरू किया, जबकि कनाडा ने तेज़ ट्रैक शरण योजना लागू की.
युद्ध से कहीं बड़ा मानवीय संकट
बेशक रूस-यूक्रेन युद्ध को अब खत्म कराने के प्रयास हो रहे हैं लेकिन इसकी मानवीय संकट लगातार बढ़ रही है. यह युद्ध दो देशों की सीमाओं का संघर्ष नहीं है. इसने कई पीढ़ियों की ज़िंदगी उजाड़ दिया है. इतिहासकारों का मानना है कि युद्ध खत्म हो सकता है, लेकिन विस्थापन के घाव भरने में दशकों लग जाते हैं. यूक्रेन के लाखों नागरिक आज भी यही उम्मीद लगाए बैठे हैं कि कभी वे फिर अपने घर लौट पाएंगे.
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