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म्यांमार में सेना का चुनावी नाटक: बंदूक की साया में वोट, सैन्य तानाशाह जंटा की पार्टी ने मारी बाज़ी
Authored By: गुंजन शांडिल्य
Published On: Saturday, January 3, 2026
Last Updated On: Saturday, January 3, 2026
म्यांमार में बंदूक की निगरानी में कराए जा रहे चुनावों के पहले दौर में लोकतंत्र की नहीं, सेना ने जीत दर्ज की है. विपक्ष के बिना, डर का माहौल और कम मतदान के बीच सैन्य तानाशाह जंटा समर्थित पार्टी की एकतरफा बढ़त ने ‘जनादेश’ की सच्चाई पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
Authored By: गुंजन शांडिल्य
Last Updated On: Saturday, January 3, 2026
Myanmars Military Election: म्यांमार में 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद कराए जा रहे पहले आम चुनावों के शुरुआती नतीजों ने वही तस्वीर उभर कर आई है, जिसकी आशंका पहले से जताई जा रही थी. सेना समर्थित यूनियन सॉलिडेरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी (USDP) ने चुनाव के पहले चरण में एकतरफा बढ़त बना ली है. सरकारी मीडिया और चुनाव आयोग द्वारा जारी आंशिक आंकड़ों के मुताबिक, कम मतदान और सीमित प्रतिस्पर्धा के बीच USDP अधिकांश सीटों पर विजयी रही है.
सत्तारूढ़ सैन्य जंटा इसे राजनीतिक स्थिरता की दिशा में कदम बता रही है. वहीं विपक्ष की अनुपस्थिति, लोकतांत्रिक आवाजों के दमन और व्यापक हिंसा के बीच कराए जा रहे, इन चुनावों की वैधता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं.
पहले चरण में एकतरफा जीत
यूनियन इलेक्शन कमीशन (UEC) द्वारा घोषित आंशिक नतीजों के अनुसार, निचले सदन यानी प्यिथु ह्लुटाव की 40 सीटों के परिणाम सामने आए हैं. इनमें से 38 पर सैन्य समर्थित USDP ने जीत दर्ज की है. केवल दो सीटें अन्य दलों के खाते में गई हैं. शान नेशनलिटीज़ डेमोक्रेटिक पार्टी (व्हाइट टाइगर पार्टी) और मोन यूनिटी पार्टी को एक-एक सीट मिली है.
राज्य और क्षेत्रीय विधानसभाओं में भी तस्वीर लगभग यही रही. जिन 15 सीटों के नतीजे घोषित किए गए, उनमें से 14 पर USDP ने कब्जा जमाया. ऊपरी सदन, एम्योथा ह्लुटाव के लिए अब तक केवल एक सीट का परिणाम घोषित किया गया है. इसमें वा नेशनल पार्टी ने जीत दर्ज की है. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह परिणाम किसी वास्तविक जनादेश से अधिक, नियंत्रित चुनावी प्रक्रिया का नतीजा है.
कम मतदान से नतीजों पर संदेह
जंटा का दावा है कि पहले चरण में 52 प्रतिशत मतदान हुआ. यानी आधे से कुछ अधिक मतदाताओं ने वोट डाले. हालांकि यह आंकड़ा 2015 और 2020 के आम चुनावों में दर्ज लगभग 70 प्रतिशत मतदान से काफी कम है.
अंतरराष्ट्रीय चुनाव निगरानी संगठनों के मुताबिक यह गिरावट केवल राजनीतिक निराशा का संकेत नहीं है, बल्कि भय, हिंसा और अस्थिरता का भी परिणाम है. देश के कई हिस्सों में सशस्त्र संघर्ष जारी है. इससे आम नागरिकों के लिए मतदान केंद्र तक पहुंचना जोखिम भरा बना हुआ है.
विपक्ष का बहिष्कार, लोकतंत्र पर ताला
न चुनावों की सबसे बड़ी कमी यह रही है कि इनमें वास्तविक विपक्षी पार्टी को हिस्सा ही नहीं लेने दिया गया है. नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और देश की पूर्व नेता आंग सान सू की, अब भी हिरासत में हैं. उनकी पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) को भंग कर दिया गया है. इनकी पार्टी के अलावा जंटा विरोधी दलों को चुनाव में हिस्सा लेने की अनुमति नहीं दी गई.
इतना ही नहीं, चुनावों की आलोचना करना भी कानूनन अपराध घोषित किया गया है. ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या इन चुनावों को स्वतंत्र और निष्पक्ष कहा जा सकता है?
- म्यांमार की सेना समर्थित पार्टी चुनावों के पहले चरण में बनी बढ़त.
- सैन्य तानाशाह जंटा का कहना है कि मतदान 52 प्रतिशत रहा. यह पिछले चुनावों की तुलना में बहुत कम है.
- चुनाव में विपक्षी नेताओं को शामिल नहीं किया गया है.
- नोबेल पुरस्कार विजेता एवं पूर्व नेता आंग सान सू की लंबे समय से कैद में हैं. उनकी पार्टी भंग कर दी गई है.
तीन चरणों में चुनाव
हां चुनाव तीन चरणों में कराए जा रहे हैं. पहले चरण के बाद अब 11 जनवरी और 25 जनवरी को चुनाव के दो और राउंड होने हैं. इनमें 330 में से 265 टाउनशिप को शामिल किया जाएगा. हालांकि इनमें से कई इलाके ऐसे हैं, जहां जंटा का पूरा नियंत्रण नहीं है और विद्रोही समूह सक्रिय हैं.
पिछले एक साल में म्यांमार प्राकृतिक आपदाओं से भी जूझता रहा है. भूकंप, भारी बारिश जंगल की आग और कुछ क्षेत्रों में असामान्य बर्फबारी ने हालात और बदतर किए हैं. इन परिस्थितियों में चुनाव कराना जंटा के लिए एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती भी है.
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और आगे की राह
संयुक्त राष्ट्र, पश्चिमी देश और कई मानवाधिकार संगठन पहले ही इन चुनावों की आलोचना कर चुके हैं. उनका कहना है कि विपक्ष को बाहर रखकर और दमन के माहौल में कराए गए चुनावों से किसी स्थिर और वैध सरकार की स्थापना संभव नहीं है.
विश्लेषकों के मुताबिक, जंटा की यह कोशिश एक नागरिक चेहरे वाला सैन्य शासन खड़ा करने की है, लेकिन उसे व्यापक अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलना मुश्किल है. युद्ध, आर्थिक संकट और राजनीतिक अलगाव के बीच म्यांमार का भविष्य अभी भी गहरे अनिश्चितता के साए में है.
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