Special Coverage
दशकों तक भारत पर निर्भर, अब नेपाल की करेंसी पर क्यों लगा ‘मेड इन चाइना’?
Authored By: Nishant Singh
Published On: Saturday, November 15, 2025
Last Updated On: Saturday, November 15, 2025
कभी नेपाल की मुद्रा पर भारत की तकनीक, भारत की सुरक्षा इंक और भारत की छाप होती थी. लेकिन आज हालात उलट चुके हैं. नेपाल के नए नोटों पर लिखा हुआ है-“Made in China”. सवाल सिर्फ नोट छपने का नहीं है, बल्कि बदलते रिश्तों, कूटनीति और पड़ोस की राजनीति का है. आखिर ऐसा क्या हुआ कि जो नेपाल कभी पूरी तरह भारत पर निर्भर था, उसने अचानक चीन की गोद में बैठना ज्यादा सही समझा?
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Saturday, November 15, 2025
Nepal Currency Made in China Issue: यह कहानी सिर्फ नोट छापने की नहीं, बल्कि बदलते रिश्तों और पड़ोस की राजनीति की है. कभी नेपाल की मुद्रा पर भारतीय स्याही की खुशबू होती थी, और भारत उसके लिए सबसे भरोसेमंद प्रिंटिंग पार्टनर था. लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. नेपाल के नए नोटों पर साफ लिखा है-“Made in China”. आखिर क्यों नेपाल ने भारत से मुंह मोड़ा और चीन का हाथ थाम लिया? क्या वजह सिर्फ कम कीमत है या इसके पीछे कहीं बड़ी भू-रणनीति और तनाव छिपा है? आइए, इस पूरी कहानी को समझते हैं…
भारत पर दशकों की निर्भरता
नेपाल के पास लंबे समय तक अपनी करेंसी छापने की क्षमता नहीं थी. इसलिए 1945 से लेकर लगभग 70 सालों तक उसकी मुद्रा भारत में ही छपती रही. नासिक सिक्योरिटी प्रेस वह स्थान था जहां नेपाल के नोटों की डिजाइनिंग, सिक्योरिटी फीचर और प्रिंटिंग सब कुछ होता था. भारत न केवल तकनीकी मदद करता था बल्कि भरोसेमंद साझेदार भी था. नेपाल के लिए यह व्यवस्था सस्ती और सुरक्षित दोनों थी, इसलिए वह 2015 तक भारत पर निर्भर रहा.
अचानक बदलाव क्यों आया?
2015 के बाद नेपाल ने करेंसी प्रिंटिंग के लिए ओपन टेंडर जारी किया. इस टेंडर में चीन की सरकारी कंपनी ने सबसे कम बोली लगाई, जिससे वह आर्थिक रूप से आकर्षक विकल्प बन गई. लेकिन बदलाव का असली कारण सिर्फ पैसा नहीं था. असली टकराव तब शुरू हुआ जब नेपाल ने अपनी नई करेंसी डिज़ाइन में भारत के कुछ हिस्सों- लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को अपने नक्शे में शामिल दिखा दिया. भारत ने इसे गंभीर आपत्ति के रूप में देखा और साफ़ मना कर दिया कि वो इन विवादित नक्शों वाले नोट नहीं छापेगा. इसके बाद नेपाल को नया विकल्प ढूंढना पड़ा और यह विकल्प था- चीन.
नेपाल चीन के पास क्यों पहुंचा?
नेपाल के चीन की ओर झुकने की कई वजहें हैं. पहली, चीन ने नोट छापने के लिए कम लागत और आधुनिक सुरक्षा तकनीक देने का वादा किया. दूसरी, नकली नोट रोकने वाली फीचर्स जैसे माइक्रो-प्रिंटिंग, सिक्योरिटी थ्रेड और होलोग्राम टेक्नोलॉजी में चीन पहले से ही काफी आगे है. तीसरा, नेपाल भारत के साथ विवाद के बाद एक राजनीतिक दूरी महसूस कर रहा था और चीन उससे यह दूरी भरने के लिए तैयार था. चीन ने तेज़ डिलीवरी और लंबी अवधि के कॉन्ट्रैक्ट की पेशकश की, जिसमें नेपाल को आर्थिक और राजनीतिक दोनों फायदा दिखा.
चीन कैसे बना करेंसी प्रिंटिंग हब?
चीन का सफर अचानक नहीं बदला, बल्कि रणनीति के तहत आगे बढ़ा. उसने दुनिया की सबसे बड़ी ब्रिटिश करेंसी प्रिंटिंग कंपनी की यूनिट को खरीद लिया, जो कभी 100 से ज्यादा देशों की मुद्रा छापा करती थी. इस सौदे के बाद चीन को ना सिर्फ एडवांस डिजाइनिंग और सिक्योरिटी टेक्नोलॉजी मिली बल्कि पुराने ग्राहक भी मिल गए. अब स्थिति यह है कि नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, मलेशिया और कई अफ्रीकी देश अपनी करेंसी छपवाने के लिए चीन पर निर्भर हैं.
भारत और चीन: तुलना कैसी है?
भारत के पास आज भी दुनिया की सबसे सुरक्षित सिक्योरिटी प्रिंटिंग व्यवस्था है, लेकिन उसकी प्रक्रिया तुलना में थोड़ी धीमी और महंगी मानी जाती है. वहीं चीन तेज़, सस्ता और बड़े स्तर पर उत्पादन करने की क्षमता रखता है. छोटे और आर्थिक रूप से सीमित देशों के लिए चीन एक आसान और आकर्षक विकल्प बन चुका है.
| पहलू | भारत बनाम चीन |
|---|---|
| पहलू | भारत |
| पहलू | चीन |
| कीमत | अपेक्षाकृत ज्यादा |
| कीमत | कम |
| तकनीक | पुरानी और आधुनिक दोनों |
| तकनीक | अधिक आधुनिक |
| प्रिंटिंग गति | मध्यम |
| प्रिंटिंग गति | तेज |
| राजनीतिक हस्तक्षेप | सीमित |
| राजनीतिक हस्तक्षेप | हाई-लेवल सरकारी कंट्रोल |
निष्कर्ष: नोट के पीछे छिपी भू-राजनीति
नेपाल का चीन की ओर झुकना सिर्फ करेंसी प्रिंटिंग का मामला नहीं है. यह उस बड़े भू-राजनीतिक खेल का हिस्सा है, जहां छोटे मुल्क आर्थिक आकर्षण और राजनीतिक सुरक्षा के बीच संतुलन खोजने की कोशिश कर रहे हैं.
कभी नेपाल की करेंसी पर भारत की स्याही होती थी, आज उस पर चीन की मुहर है. सवाल ये है—क्या नेपाल ने आर्थिक समझदारी दिखाई है या वह धीरे-धीरे चीन की रणनीतिक पकड़ में फंस रहा है?
यह भी पढ़ें :- NSA अजित डोभाल ने क्यों भेजा, बांग्लादेश के सुरक्षा सलाहकार को निमंत्रण?














