अल-नीनो नहीं, PDO बना गुजरात की मूसलाधार बारिश का बड़ा कारण! जानिए क्या है यह जलवायु पैटर्न

Authored By: Nikita Singh

Published On: Friday, July 24, 2026

Updated On: Friday, July 24, 2026

PDO Gujarat Rain. गुजरात में भारी बारिश के पीछे PDO क्लाइमेट पैटर्न का प्रभाव दिखाती सांकेतिक तस्वीर

गुजरात में हुई रिकॉर्ड बारिश के पीछे केवल अल-नीनो नहीं, बल्कि नेगेटिव पैसिफिक डिकेडल ऑसीलेशन (PDO) भी बड़ी वजह माना जा रहा है. वैज्ञानिकों के अनुसार इस जलवायु पैटर्न ने मानसून को मजबूत किया, जिससे कई इलाकों में बेहद भारी वर्षा और बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो गई.

Authored By: Nikita Singh

Updated On: Friday, July 24, 2026

PDO Gujarat Rain: गुजरात में इस बार मानसून ने ऐसा रौद्र रूप दिखाया कि कई जिलों में कुछ ही घंटों में 400 से 450 मिमी तक बारिश दर्ज की गई. नवसारी के चिखली, अहमदाबाद के ढोलका, सूरत के उमरपाड़ा और वलसाड के उमरगांव जैसे इलाकों में बाढ़ जैसे हालात बन गए. सड़कों पर पानी भर गया, नदियां उफान पर आ गईं और जनजीवन पूरी तरह प्रभावित हुआ. दिलचस्प बात यह है कि कुछ महीने पहले कई मौसम विशेषज्ञों ने अल-नीनो के प्रभाव के कारण सामान्य से कम बारिश और सूखे की आशंका जताई थी, लेकिन नतीजे इसके बिल्कुल उलट रहे. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस बार पैसिफिक डिकेडल ऑसीलेशन (PDO) ने अल-नीनो के असर को काफी हद तक कमजोर कर दिया और मानसून को अपेक्षा से अधिक ताकत दी.

क्या है PDO और कैसे करता है असर?

पैसिफिक डिकेडल ऑसीलेशन (PDO) प्रशांत महासागर के सतही तापमान में होने वाला एक दीर्घकालिक बदलाव है, जिसका प्रभाव कई वर्षों तक बना रहता है. यह अल-नीनो और ला-नीना की तरह ही समुद्री तापमान से जुड़ा पैटर्न है, लेकिन इसका चक्र 20 से 30 वर्षों तक चल सकता है. इसके दो चरण होते हैं—पॉजिटिव और नेगेटिव. वर्ष 2026 में PDO मजबूत नेगेटिव फेज में है. इस स्थिति में समुद्री तापमान और वायुमंडलीय दबाव ऐसे बदलाव पैदा करते हैं, जिससे भारत की ओर नमी वाली हवाओं का प्रवाह बढ़ जाता है. परिणामस्वरूप मानसून अधिक सक्रिय हो जाता है और कई क्षेत्रों में सामान्य से कहीं ज्यादा बारिश होती है.

गुजरात में क्यों बरसी रिकॉर्ड बारिश?

विशेषज्ञों के अनुसार गुजरात में हुई भारी बारिश किसी एक मौसम प्रणाली का परिणाम नहीं थी. नेगेटिव PDO ने अरब सागर से आने वाली नमी को लगातार मजबूत बनाए रखा, जिससे मानसूनी बादलों को भरपूर ऊर्जा मिली. इसके साथ स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियां, समुद्र की निकटता और पहाड़ी इलाके भी भारी वर्षा का कारण बने. कई मौसम मॉडल मुख्य रूप से अल-नीनो और ला-नीना पर आधारित पूर्वानुमान तैयार करते हैं, जबकि इस बार PDO की भूमिका को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया. यही वजह रही कि बारिश के अनुमान वास्तविक स्थिति से काफी अलग साबित हुए.

भविष्य के लिए क्यों अहम है यह संकेत?

मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि अब केवल अल-नीनो या ला-नीना के आधार पर मानसून का अनुमान लगाना पर्याप्त नहीं है. PDO, इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) और अन्य वैश्विक जलवायु पैटर्न को भी समान महत्व देना होगा. जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र का तापमान लगातार बदल रहा है, जिससे अत्यधिक बारिश जैसी घटनाएं पहले की तुलना में अधिक देखने को मिल रही हैं. ऐसे में मौसम पूर्वानुमान प्रणाली को और सटीक बनाने के साथ-साथ किसानों, प्रशासन और आम लोगों को भी इन बड़े जलवायु संकेतों के प्रति जागरूक करना जरूरी है, ताकि भविष्य में प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके.

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About the Author: Nikita Singh
करीब 10 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय प्रीति बिजनेस, लाइफस्टाइल और एंटरटेनमेंट से जुड़ी स्टोरी लिखने में दक्ष हैं. खासतौर से एंटरटेनमेंट से संबंधी विषयों पर लिखने में माहिर हैं. लेखक का लंबा अनुभव उनके लेखन में साफ दिखता है. इसके अलावा वह फिल्मों का सही और सटीक रिव्यू करने में भी माहिर हैं. मनोरंजन से जुड़े विषय पर उनके लेख सटीक जानकारी प्रदान करते हैं. इनकी लेखनी गहराई से शोध पर आधारित होती है. इनकी खूबी यह है कि पाठक इनके लेखों से खुद को जुड़ा महसूस करते हैं.
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