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Board of Peace for Gaza: गाजा ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में ट्रंप की पहल: कौन देश शामिल, कौन विरोध में और भारत का रुख क्या?
Authored By: Nishant Singh
Published On: Thursday, January 22, 2026
Last Updated On: Thursday, January 22, 2026
Board of Peace for Gaza: गाजा संकट के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ‘बोर्ड ऑफ पीस फॉर गाजा’ का प्रस्ताव रखा है, जिसमें करीब 50 देशों को शामिल होने का न्योता दिया गया है. कुछ देशों ने समर्थन किया है, जबकि फ्रांस समेत कई यूरोपीय देशों ने दूरी बनाई है. भारत ने अभी तक कोई फैसला नहीं लिया है और कूटनीतिक व रणनीतिक पहलुओं पर विचार कर रहा है.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Thursday, January 22, 2026
Board of Peace for Gaza: गाजा पट्टी में जारी संघर्ष और हालिया युद्धविराम के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नई अंतरराष्ट्रीय पहल का प्रस्ताव रखा है, जिसे ‘बोर्ड ऑफ पीस फॉर गाजा’ नाम दिया गया है. इस बोर्ड का उद्देश्य गाजा में स्थायी शांति की राह तैयार करना और युद्ध के बाद के हालात को संभालने में वैश्विक सहयोग सुनिश्चित करना है. लेकिन ट्रंप की इस पहल पर पूरी दुनिया एकमत नजर नहीं आ रही. कुछ देश इसे शांति की दिशा में बड़ा कदम मान रहे हैं, तो कई ताकतवर देश इससे दूरी बनाए हुए हैं.
क्या है ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’ प्लान?
डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायल और हमास के बीच हुए युद्धविराम समझौते के दूसरे चरण के तहत इस बोर्ड के गठन का प्रस्ताव रखा है. व्हाइट हाउस के अनुसार, यह बोर्ड गाजा के पुनर्निर्माण, प्रशासनिक ढांचे और भविष्य की शांति प्रक्रिया को दिशा देने का काम करेगा. इसके लिए दुनियाभर के करीब 50 देशों को औपचारिक न्योता भेजा गया है. इस बोर्ड में शामिल देशों से उम्मीद की जा रही है कि वे राजनीतिक, आर्थिक और मानवीय सहायता के जरिए गाजा को स्थिर करने में भूमिका निभाएं.
भारत का रुख क्यों है सबसे ज्यादा चर्चा में?
इस पूरे घटनाक्रम में भारत का रुख सबसे ज्यादा सुर्खियों में है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी इस बोर्ड में शामिल होने का न्योता मिला है, लेकिन भारत ने अब तक कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है. पीटीआई से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, नई दिल्ली इस प्रस्ताव के हर पहलू पर गंभीरता से विचार कर रही है. गाजा मुद्दा बेहद संवेदनशील है और भारत पारंपरिक रूप से संतुलित कूटनीति अपनाता रहा है. ऐसे में भारत कोई भी फैसला जल्दबाजी में नहीं लेना चाहता.
भारत क्यों नहीं दे रहा तुरंत जवाब?
भारत के लिए यह केवल एक अंतरराष्ट्रीय मंच में शामिल होने का सवाल नहीं है, बल्कि इससे जुड़े कूटनीतिक और रणनीतिक प्रभाव भी अहम हैं. पश्चिम एशिया में भारत के कई अहम साझेदार हैं, जिनमें इजरायल और अरब देश दोनों शामिल हैं. ऐसे में भारत ऐसा कदम उठाना चाहता है, जिससे उसका संतुलन बिगड़े नहीं. यही वजह है कि सरकार की ओर से अब तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है और फैसला सोच-समझकर लिया जा रहा है.
यूरोप क्यों बना रहा दूरी?
ट्रंप के इस प्रस्ताव को लेकर यूरोप में खासा संदेह देखा जा रहा है. फ्रांस, नॉर्वे और स्वीडन ने ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने का न्योता साफ तौर पर ठुकरा दिया है. इसके अलावा ब्रिटेन, इटली और यूरोपीय यूनियन की कार्यकारी शाखा ने अभी तक अपना रुख स्पष्ट नहीं किया है. माना जा रहा है कि यूरोपीय देश इस पहल की संरचना और अमेरिका की भूमिका को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं.
कौन-कौन देश ट्रंप के साथ खड़े हैं?
कई देशों ने ट्रंप की इस पहल को समर्थन दे दिया है. अर्जेंटीना, मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात, मोरक्को, बहरीन, कजाखस्तान, हंगरी, वियतनाम और अजरबैजान जैसे देश बोर्ड में शामिल होने को तैयार हैं. पाकिस्तान ने भी इस प्रस्ताव को समर्थन देने पर सहमति जताई है. इन देशों का मानना है कि गाजा में शांति के लिए किसी न किसी अंतरराष्ट्रीय ढांचे की जरूरत है.
कितना बड़ा होगा यह शांति बोर्ड?
व्हाइट हाउस के एक अधिकारी के अनुसार, करीब 50 देशों को न्योता भेजा गया है और लगभग 30 देशों के शामिल होने की संभावना जताई जा रही है. हालांकि बोर्ड की अंतिम सूची, संरचना और कार्यप्रणाली को लेकर अभी कई सवाल बाकी हैं. यही वजह है कि कई देश फिलहाल इंतजार की नीति अपना रहे हैं.
आगे क्या करेगा भारत और दुनिया?
अब सबकी नजर भारत जैसे बड़े और प्रभावशाली देशों पर टिकी है. अगर भारत इस बोर्ड में शामिल होता है, तो यह पहल को वैश्विक विश्वसनीयता दिला सकता है. वहीं, भारत का इंकार इस योजना को कमजोर भी कर सकता है. आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि ‘बोर्ड ऑफ पीस फॉर गाजा’ वास्तव में शांति का रास्ता बनेगा या सिर्फ एक कूटनीतिक प्रयोग बनकर रह जाएगा.
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