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ट्रंप ने भारत की चुनाव व्यवस्था को क्यों बताया अमेरिकी सुधार का मॉडल
Authored By: अरुण श्रीवास्तव
Published On: Tuesday, August 18, 2026
Last Updated On: Tuesday, August 18, 2026
ट्रंप ने भारत की चुनाव व्यवस्था की तारीफ करते हुए इसे अमेरिकी चुनाव सुधार के लिए मॉडल बताया. उनके इस बयान के बाद भारत की चुनाव प्रणाली और अमेरिकी सुधार को लेकर नई बहस छिड़ गई है
Authored By: अरुण श्रीवास्तव
Last Updated On: Tuesday, August 18, 2026
Trump India Election System: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत की चुनाव व्यवस्था का उदाहरण देते हुए अमेरिका में मतदान के नियमों को और सख्त करने की अपनी मांग फिर दोहराई है. ट्रंप ने सोशल मीडिया पोस्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का जिक्र किया और 2024 के भारतीय लोकसभा चुनाव का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में मतदाताओं की पहचान सुनिश्चित करने के लिए फोटो पहचान पत्र की व्यवस्था है, जबकि अमेरिका में ऐसा कोई एक समान संघीय नियम नहीं है. ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका में नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनाव से पहले मतदान के नियमों को लेकर राजनीतिक बहस तेज है.
भारत की चुनाव व्यवस्था का ट्रंप ने क्यों दिया उदाहरण
ट्रंप के मुताबिक 2024 के लोकसभा चुनाव में करीब 64.6 करोड़ लोगों ने मतदान किया और भारत में मतदान के लिए पहचान की पुष्टि की व्यवस्था लागू है. हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है. भारत में हर मतदाता के लिए केवल वोटर कार्ड दिखाना अनिवार्य नहीं है. चुनाव आयोग मतदान केंद्र पर पहचान के लिए मतदाता पहचान पत्र के अलावा कई वैकल्पिक दस्तावेजों को भी स्वीकार करता है. 2024 के चुनाव में आयोग ने ईपीआईसी के अलावा 12 वैकल्पिक पहचान दस्तावेजों की व्यवस्था की थी. यानी ट्रंप का मूल तर्क मतदाता की पहचान सुनिश्चित करने की व्यवस्था को लेकर है, लेकिन इसे अमेरिका और भारत की पूरी चुनाव प्रणाली एक जैसी होने के तौर पर देखना सही नहीं होगा.
अमेरिका में नियम पूरे देश में एक जैसे नहीं
यही भारत और अमेरिका के बीच सबसे बड़ा अंतर है. भारत में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के संचालन की जिम्मेदारी एक केंद्रीय संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग के पास है. अमेरिका में चुनावों का संचालन मुख्य रूप से राज्यों और स्थानीय प्रशासन के स्तर पर होता है. इसलिए वहां मतदान के समय पहचान पत्र दिखाने के नियम भी राज्य के अनुसार अलग हैं. अमेरिकी सरकार की जानकारी के मुताबिक कई राज्यों में फोटो पहचान पत्र मांगा जाता है, जबकि कुछ जगह दूसरे तरीकों से मतदाता की पहचान सत्यापित की जाती है. नेशनल कॉन्फ्रेंस ऑफ स्टेट लेजिस्लेचर्स के अनुसार 36 राज्यों में मतदान केंद्र पर किसी न किसी रूप में पहचान दिखाने का नियम है और बाकी 14 राज्य तथा वॉशिंगटन डीसी अलग तरीकों से पहचान की पुष्टि करते हैं.
इसलिए अमेरिका में यह कहना कि वहां कहीं भी पहचान की व्यवस्था नहीं है, पूरी तस्वीर नहीं बताता. असली विवाद यह है कि क्या पूरे देश में एक समान और कड़े संघीय नियम लागू किए जाएं.
ट्रंप का SAVE America Act क्या चाहता है
इसी बहस के केंद्र में ट्रंप का SAVE America Act है. इस प्रस्तावित कानून का पूरा नाम Safeguard American Voter Eligibility Act है. इसके तहत संघीय चुनावों में मतदाता के रूप में पंजीकरण के समय अमेरिकी नागरिकता का दस्तावेजी प्रमाण देना और मतदान के समय निर्धारित फोटो पहचान पत्र प्रस्तुत करना जरूरी होगा. ट्रंप और उनके समर्थक इसे चुनाव की सुरक्षा मजबूत करने वाला कदम बताते हैं. उनका तर्क है कि मतदाता की पहचान और नागरिकता की सख्त जांच से चुनाव में संभावित गड़बड़ियों को रोका जा सकेगा.
लेकिन इस प्रस्ताव को लेकर अमेरिका में राजनीतिक मतभेद भी गहरे हैं. डेमोक्रेट और नागरिक अधिकार संगठनों का कहना है कि अतिरिक्त दस्तावेजों की अनिवार्यता उन पात्र मतदाताओं के लिए मुश्किल पैदा कर सकती है जिनके पास जन्म प्रमाणपत्र, पासपोर्ट या दूसरे जरूरी दस्तावेज आसानी से उपलब्ध नहीं हैं. चुनाव विशेषज्ञों ने भी कहा है कि प्रस्तावित व्यवस्था कई मौजूदा राज्य कानूनों से अधिक सख्त होगी.
चुनावी धोखाधड़ी का सवाल कितना बड़ा है
ट्रंप लंबे समय से अमेरिकी चुनावों में धोखाधड़ी और गैर नागरिकों के मतदान को लेकर सवाल उठाते रहे हैं. लेकिन इस मुद्दे पर अमेरिका में उपलब्ध जांच और विश्लेषण भी महत्वपूर्ण हैं. रॉयटर्स ने जुलाई में रिपोर्ट किया था कि गैर नागरिकों के बड़े पैमाने पर मतदान के दावों के समर्थन में व्यापक प्रमाण नहीं मिले हैं और ऐसे मामले बेहद दुर्लभ पाए गए हैं. यही वजह है कि विरोधी दल सवाल उठा रहे हैं कि यदि समस्या व्यापक नहीं है तो इतने कठोर नियमों की आवश्यकता क्यों है.
भारत का उदाहरण अमेरिका के लिए कितना उपयोगी
ट्रंप द्वारा भारत का उदाहरण देना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन दोनों देशों की चुनाव व्यवस्था की तुलना करते समय उनकी अलग संरचना को ध्यान में रखना होगा. भारत में मतदाता सूची, मतदान केंद्र, पहचान और चुनाव संचालन की व्यवस्था केंद्रीय चुनाव आयोग के नेतृत्व में चलती है. अमेरिका में चुनाव प्रशासन राज्यों के अधिकार क्षेत्र में बंटा हुआ है. इसलिए भारत की पहचान व्यवस्था से प्रेरणा लेना एक बात है और उसे उसी रूप में पूरे अमेरिका में लागू करना दूसरी.
इस पूरे विवाद में भारत का नाम इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि दुनिया के दो बड़े लोकतंत्र चुनावों में पहचान, नागरिकता और मतदान की विश्वसनीयता को लेकर अलग अलग रास्तों पर खड़े हैं. ट्रंप भारत की व्यवस्था को अपने राजनीतिक अभियान के समर्थन में उदाहरण बना रहे हैं, जबकि अमेरिका में विरोधी इसे मतदान के अधिकार पर संभावित असर के नजरिए से देख रहे हैं. नवंबर के मध्यावधि चुनाव से पहले यह बहस कितनी आगे जाती है, इसका असर सिर्फ अमेरिकी राजनीति पर नहीं बल्कि वहां की चुनाव व्यवस्था के भविष्य पर भी पड़ सकता है.
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