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स्पाइनल इंजरी से पैरालिसिस तक: लापरवाही बनती है खतरा, डॉ. सुदीप जैन से जानें सही जीवनशैली, जागरूकता, बचाव और लक्षण
Authored By: Galgotias Times Bureau
Published On: Tuesday, February 24, 2026
Last Updated On: Tuesday, February 24, 2026
स्पाइन यानी रीढ़ की हड्डी पर न केवल हमारा पूरा शरीर टिका होता है, बल्कि इसमें यानी स्पाइनल कार्ड के भीतर ऑप्टिकल फाइबर की तरह असंख्य नर्व्स होते हैं, जो हमारे दिमाग द्वारा भेजे गए सिग्नल के माध्यम से शरीर की गतिविधियों को संचालित करते हैं. गलत लाइफस्टाइल या फिर किसी तरह की चोट के कारण जब स्पाइन कम या ज्यादा डैमेज होता है, तो हमारी शारीरिक गतिविधियां भी प्रभावित होती हैं. कमर के पास चोट से पैराप्लेजिया गर्दन के पास चोट से टेट्राप्लेजिया या क्वाड्रीप्लेजिया की स्थिति पैदा हो जाती है, जिसमें संबंधित व्यक्ति कमर या गर्दन के नीचे पैरालाइज्ड या संज्ञा शून्य हो जाता है. इस आलेख में विशेषज्ञ लेखक स्पाइनल इंजरी से संबंधित वह सारी जानकारी दे रहे हैं, जिससे इस रोग के बारे में आपकी जानकारी बढ़ सकती है और कहीं अधिक जागरूक नागरिक बन सकेंगे…
Authored By: Galgotias Times Bureau
Last Updated On: Tuesday, February 24, 2026
Paralysis From Spinal Injury: स्पाइन यानी रीढ़ हमारे शरीर की वह केंद्रीय धुरी है, जिस पर पूरी शारीरिक संरचना टिकी होती है. चलना, बैठना, झुकना, उठना- हर छोटी-बड़ी गतिविधि रीढ़ की सेहत से जुड़ी है. लेकिन बदलती जीवनशैली, बढ़ता स्क्रीन टाइम और शारीरिक निष्क्रियता ने आज स्पाइन से जुड़ी समस्याओं को आम बना दिया है. स्पाइन सर्जरी और उपचार को लेकर विशेषज्ञों का अनुभव हमें न केवल बीमारी की गंभीरता समझाता है, बल्कि समाधान की दिशा भी दिखाता है.
बढ़ते कमर व गर्दन दर्द के पीछे की असली वजह
आज सर्वाइकल और लोअर बैक पेन से पीड़ित लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और विशेषज्ञ इसे साफ तौर पर लाइफस्टाइल डिजीज मानते हैं. चिंता की बात यह है कि कामकाज के सिलसिले में लंबी सिटिंग करने वाले युवाओं में यह समस्या तेजी से बढ़ रही है.
मुख्य कारणों में शामिल हैं:
- लंबे समय तक लगातार बैठकर काम करना
- अत्यधिक स्क्रीन टाइम
- शारीरिक गतिविधि की कमी
- घंटों बाइक या कार चलाना
- व्यायाम, योग या खेलकूद से दूरी
मानव शरीर की बनावट लंबे समय तक बैठने के लिए नहीं बनी है. विकासवादी दृष्टि से देखें तो हमारा शरीर चलने-फिरने के लिए बना है, न कि घंटों कुर्सी पर टिके रहने के लिए. जब हम इस प्राकृतिक संरचना के विपरीत जीवन जीते हैं, तो रीढ़ पर दबाव बढ़ता है और दर्द की शुरुआत होती है.
इसलिए स्पाइन हेल्थ का पहला नियम है-एक्टिव लाइफस्टाइल. नियमित व्यायाम, स्ट्रेचिंग, योग और सही बैठने-उठने की आदतें ही सबसे बड़ा बचाव हैं.
शुरुआती संकेत कैसे पहचानें?
अक्सर लोग शुरुआती दर्द को नजरअंदाज कर देते हैं और यही सबसे बड़ी गलती साबित होती है. शुरुआत में ये लक्षण सामने आ सकते हैं:
- गर्दन या कमर में लगातार दर्द
- अकड़न या जकड़न
- झुकने, उठने या चलने में परेशानी
- मूवमेंट के साथ दर्द बढ़ना
- सूजन या इंफ्लेमेशन
ये संकेत बताते हैं कि रीढ़ के भीतर कोई समस्या शुरू हो चुकी है. समय रहते डॉक्टर से परामर्श लेने पर कई गंभीर स्थितियों को रोका जा सकता है. लेकिन लापरवाही से स्थिति इतनी बिगड़ सकती है कि नसों पर असर पड़े और व्यक्ति चलने-फिरने में असमर्थ हो जाए.
रीढ़ केवल हड्डियों का ढांचा नहीं है. इसके अंदर स्थित स्पाइनल कार्ड हमारे नर्वस सिस्टम से सीधे जुड़ा है. इसलिए स्पाइन की समस्या को हल्के में लेना भविष्य के लिए खतरनाक हो सकता है.
स्पाइनल इंजरी: कितनी प्रकार की और कितनी गंभीर?
स्पाइनल कॉर्ड इंजरी को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में समझा जा सकता है:
1. रिवर्सेबल (ठीक हो सकने वाली) इंजरी
ऐसी स्थिति में स्पाइनल कॉर्ड दबता है लेकिन पूरी तरह नष्ट नहीं होता.
इसके कारण हो सकते हैं:
- फ्रैक्चर या डिसलोकेशन
- टीबी
- ट्यूमर या कैंसर
- हड्डी का दबाव
समय पर इलाज मिलने पर रिकवरी की संभावना काफी अच्छी होती है. कई मरीज पूरी तरह सामान्य न भी हों, तो भी स्वतंत्र जीवन जीने लायक सुधार संभव है, जैसे-खुद चलना-फिरना, बैठना-उठना और दैनिक काम करना.
2. इर्रिवर्सेबल (अपरिवर्तनीय) इंजरी
इस स्थिति में स्पाइनल कॉर्ड को गंभीर नुकसान पहुंचता है या वह कट जाता है.
ऐसे मामलों में रिकवरी की संभावना सीमित होती है और स्थायी दिव्यांगता का खतरा बढ़ जाता है.
हालांकि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान यहां भी उम्मीद तलाश रहा है.
पैराप्लेजिया और टेट्रोप्लेजिया: आसान भाषा में समझें
स्पाइनल कॉर्ड इंजरी के बाद मरीजों में सबसे गंभीर स्थितियों में पैराप्लेजिया और टेट्रोप्लेजिया देखा जाता है.
पैराप्लेजिया वह अवस्था है जिसमें शरीर के निचले हिस्से- यानी दोनों पैरों और कमर के नीचे के भाग की ताकत और संवेदना प्रभावित हो जाती है। ऐसे मरीज चल-फिर नहीं पाते, लेकिन कई मामलों में उनके हाथ सामान्य रूप से काम करते हैं। सही समय पर इलाज, सर्जरी और रिहैबिलिटेशन मिलने पर कुछ हद तक स्वतंत्र जीवन संभव हो सकता है।
वहीं टेट्रोप्लेजिया (जिसे क्वाड्रिप्लेजिया भी कहा जाता है) ज्यादा गंभीर स्थिति होती है। इसमें गर्दन के ऊपरी हिस्से में स्पाइनल कॉर्ड को चोट लगती है, जिससे हाथ-पैर दोनों प्रभावित हो सकते हैं। कई बार सांस लेने की क्षमता भी कमजोर पड़ जाती है और मरीज को लंबे समय तक विशेष देखभाल की जरूरत होती है।
भविष्य की उम्मीद: स्टेम सेल, रोबोटिक्स और नई रिसर्च
स्पाइनल इंजरी के इलाज पर दुनिया भर में तेज़ी से शोध चल रहा है.
कुछ प्रमुख उपलब्धियों की दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं:
- स्टेम सेल थेरेपी
- न्यूरोनल रीजनरेशन
- रोबोटिक रिहैबिलिटेशन
- AI आधारित रिकवरी तकनीक
अभी ये उपचार पूरी तरह सफल नहीं हुए हैं और कई ट्रायल चरण में हैं, लेकिन उम्मीद की किरण मजबूत है. आने वाले वर्षों में गंभीर स्पाइनल इंजरी वाले मरीजों के लिए भी बेहतर जीवन संभव हो सकता है.
अच्छी जीवनशैली से स्पाइन रहेगी हेल्दी
विशेषज्ञों के अनुसार कुछ सरल आदतें रीढ़ की बड़ी समस्याओं से बचा सकती हैं:
- हर 30-40 मिनट में बैठने से ब्रेक लें
- रोज कम से कम 30 मिनट वॉक या एक्सरसाइज करें
- सही पोश्चर में बैठें
- मोबाइल को आंखों की ऊंचाई पर रखें
- वजन नियंत्रित रखें
- योग और स्ट्रेचिंग को दिनचर्या में शामिल करें
छोटी-छोटी सावधानियां ही लंबे समय तक स्पाइन को स्वस्थ रखती हैं.
स्पाइनल केयर की दिशा में भारत
भारत में स्पाइनल केयर तेजी से विकसित हो रही है. एक ओर AIIMS जैसे संस्थान जटिलतम मामलों का इलाज और शोध कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर नए AIIMS और आधुनिक तकनीक स्वास्थ्य सेवाओं को आम लोगों के करीब ला रहे हैं. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी हमारी खुद की है-सही जीवनशैली अपनाना और शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज न करना. रीढ़ स्वस्थ होगी तो जीवन सक्रिय रहेगा. और सक्रिय जीवन ही असली स्वास्थ्य की पहचान है.
AIIMS दिल्ली का “महाकुंभ” क्यों?
भारत में कई बड़े अस्पताल और मेडिकल कॉलेज मौजूद हैं, लेकिन गंभीर और जटिल मामलों के इलाज के लिए आज भी AIIMS दिल्ली को सर्वोच्च माना जाता है. देश-विदेश से आने वाले कठिनतम केस यहां पहुंचते हैं, जहां न केवल इलाज होता है बल्कि शोध और नई तकनीकों पर भी लगातार काम चलता रहता है.
किसी भी सर्जन के लिए ऐसे संस्थान में काम करना असाधारण अनुभव देता है. अलग-अलग तरह के जटिल केस, सीमित समय में सही निर्णय लेने की चुनौती और लगातार सीखने का माहौल- ये सब मिलकर सर्जिकल सोच को पूरी तरह बदल देते हैं. यही वजह है कि AIIMS में अनुभव हासिल करने को कई विशेषज्ञ “कुंभ स्नान” जैसा मानते हैं-एक ऐसा पड़ाव जो पेशेवर दृष्टि को नई ऊंचाई देता है.
नए AIIMS बनने के बाद भी दिल्ली पर दबाव क्यों?
सरकार ने देश के विभिन्न राज्यों में कई नए AIIMS संस्थान स्थापित किए हैं, ताकि बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं लोगों के नजदीक उपलब्ध हो सकें. इन संस्थानों में नियुक्त कई डॉक्टर AIIMS दिल्ली से प्रशिक्षित हैं और वहां की गुणवत्ता को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. बजट, फंडिंग और सुविधाओं के स्तर पर भी सरकार लगातार निवेश कर रही है.
फिर भी आम लोगों की धारणा में “AIIMS” का मतलब आज भी दिल्ली ही है. किसी भी संस्थान की प्रतिष्ठा बनने में समय लगता है-नई मशीनें, आधुनिक तकनीक, बेहतर डायग्नोस्टिक सुविधाएं और अनुभवी टीम धीरे-धीरे भरोसा पैदा करती हैं.
स्वास्थ्य सेवाओं का विकेंद्रीकरण बेहद जरूरी है. जिस तरह IIT और IIM पूरे देश में फैले हैं, उसी तरह हर राज्य में पूरी तरह सक्षम AIIMS होना चाहिए. इससे मरीजों को महीनों की लंबी प्रतीक्षा और दूर-दराज़ यात्रा से राहत मिलेगी, और AIIMS दिल्ली पर भी अत्यधिक दबाव कम होगा.

















