Dhanteras 2026: धनतेरस पर क्यों खरीदे जाते हैं धनिया और झाड़ू? जानिए धार्मिक मान्यता और इसका महत्व

Authored By: Rajeev Mandal

Published On: Thursday, November 5, 2026

Last Updated On: Thursday, November 5, 2026

धनतेरस पर पूजा के लिए रखे धनिया के बीज और नई झाड़ू
धनतेरस पर पूजा के लिए रखे धनिया के बीज और नई झाड़ू

धनतेरस आते ही हर किसी के दिल में ये कसक जरूर रहती है कि काश वो सोना और चांदी खरीद सकते। टीवी पर बड़ी-बड़ी कंपनियों के आकर्षक और लुभावने विज्ञापन लगातार टीवी स्क्रीन पर चमक बिखेरते रहते हैं। लेकिन अगर आप किसी पुराने मोहल्ले में चले जाएं, किसी गांव की हाट में चले जाएं, तो वहां सोने की दुकान पर नहीं, धनिया और झाड़ू की दुकान पर लाइन लगी मिलेगी। बुजुर्ग महिलाएं सुबह से ही कहती फिरेंगी - "बेटा, आज कुछ खरीदो ना खरीदो, धनिया और झाड़ू जरूर खरीद लेना।"

Authored By: Rajeev Mandal

Last Updated On: Thursday, November 5, 2026

धनतेरस पर धनिया खरीदने की परंपरा कोई फैशन नहीं, हजारों साल पुरानी मान्यता है। धनिया को धन का बीज कहा जाता है। संस्कृत में धनिया को ‘धनक’ भी कहते हैं। धनतेरस के दिन भगवान धन्वंतरि समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। उनके साथ ही मां लक्ष्मी भी आई थीं। उसी दिन से धनिया को समृद्धि का प्रतीक मान लिया गया।

इस विधि से करें पूजा

इस दिन पूजा करने का तरीका सीधा और सहज है। शाम को थोड़ा सा साबुत धनिया मां लक्ष्मी, कुबेर और धन्वंतरि को चढ़ाते हैं। फिर उसी धनिये को तीन जगह रखते हैं। थोड़ा सा तिजोरी में, थोड़ा सा पर्स में और थोड़ा सा घर के आंगन या गमले में बो देते हैं। मान्यता है कि जैसे धनिया उगता है, फैलता है, वैसे ही घर में धन भी बढ़ता है। सबसे बड़ी बात, ये धनिया अगले साल तक संभालकर रखते हैं। अगली धनतेरस पर उसी में से कुछ दाने निकालकर फिर बो देते हैं। मतलब धन का चक्र अबाध गति से चलता रहता है।

इसीलिए धनतेरस पर धनिया भले सामान्य दिनों की अपेक्षा दोगुने-तिगुने दामों पर मिले, लोग इसके बावजूद इसे खरीदते हैं। ज्यादा नहीं, थोड़ा सा ही सही…पुड़िया में। किसान भाई कहते हैं, धनिया सिर्फ मसाला नहीं, उम्मीद है। कि आने वाला साल हरा-भरा रहेगा।

झाड़ू – लक्ष्मी का दूसरा रूप

हमारे घरों में झाड़ू को कभी पैर नहीं लगाते। उसे लक्ष्मी का रूप कहते हैं। कहते हैं जहां झाड़ू का अपमान, वहां लक्ष्मी नहीं टिकती। धनतेरस पर पुरानी झाड़ू को घर से बाहर निकालने और नई झाड़ू लाने की परंपरा है। मान्यता है कि इस दिन नई झाड़ू खरीदने से घर की दरिद्रता, कंगाली और नकारात्मकता बाहर चली जाती है। शाम को सूर्यास्त से पहले झाड़ू खरीदी जाती है। उसे घर के किसी कोने में लिटाकर रखते हैं, खड़ा करके नहीं। दिवाली की रात उसी नई झाड़ू से पूरे घर की सफाई होती है, फिर लक्ष्मी का स्वागत होता है।

सोना नहीं तो क्या हुआ

असल में धनिया और झाड़ू की परंपरा आर्थिक असमानता की खाई को पाट देती है। जों गरीब है और सोना नहीं खरीदने की हैसियत रखता है, वो भी मामूली रकम से धनिया-झाड़ू खरीदकर धनतेरस मना सकता है।

बूढ़े-बुजुर्ग की ये बात मायने रखती है कि सोना खरीदना दिखावा है। तो इस धनतेरस पर पीली धातु भले न खरीदें, थोड़ा सा धनिया और झाड़ू खरीदना न भूलें। इसी में बरकत भी है, खुशहाली भी है और समृद्धि भी।

About the Author: Rajeev Mandal
वरिष्ठ पत्रकार राजीव मंडल पिछले 25 वर्षों से मीडिया इंडस्ट्री में सक्रिय हैं। दैनिक जागरण (लखनऊ) से बतौर कॅरियर की शुरुआत हुई। गलगोटिया टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से जुड़ने से पहले राजीव ने टीवी इंडस्ट्री-ईटीवी और नेपाल वन न्यूज चैनल- में भी काम किया। इसके अलावा राष्ट्रीय सहारा अखबार के साथ 19 वर्षों तक इनका साथ रहा। इस अखबार के संपादकीय पृष्ठ और साप्ताहिक परिशिष्ट 'हस्तक्षेप" अंक का बतौर प्रभारी लंबे समय तक नेतृत्व किया। राजीव ने पत्रकारिता से मास्टर डिग्री (2000-2001) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से हासिल किया। फिलहाल राजीव गलगोटिया टाइम्स के लिए राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय और समसामयिक विषयों पर कलम चलाते हैं।
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