Mahakumbh 2025 : महाकुंभ स्नान के बाद नागवासुकी मंदिर के दर्शन मात्र से होते हैं सभी दुख दूर

Authored By: स्मिता

Published On: Thursday, December 12, 2024

Last Updated On: Thursday, December 12, 2024

Nagavasuki Temple
Nagavasuki Temple

नागवासुकी कथा का वर्णन स्कंद पुराण, पद्म पुराण, भागवत पुराण और महाभारत में भी मिलता है। समुद्र मंथन की कथा के अनुसार, जब देव और असुर, भगवान विष्णु के कहने पर सागर मथने के लिए तैयार हुए तो मंदराचल पर्वत मथानी और नागवासुकी को रस्सी बनाया गया था।

Authored By: स्मिता

Last Updated On: Thursday, December 12, 2024

प्रयागराज को तीर्थराज कहा जाता है, क्योंकि इसे सभी तीर्थों में श्रेष्ठ होने का दर्जा प्राप्त है। यहां समुद्र मंथन हुआ था और रस्सी बने थे नागवासुकी। नागवासुकी ने जहां आराम किया, वह आज नागवासुकी मंदिर है। पौराणिक मंदिरों में नागवासुकी मंदिर का विशेष स्थान है। सनातन आस्था में नागों या सर्प की पूजा प्राचीन काल से की जाती रही है। पुराणों में कई नागों की कथाओं का वर्णन है, जिनमें से नागवासुकी को सर्पराज (Mahakumbh 2025) माना जाता है।

नागवासुकी के दर्शन से फल की प्राप्ति (Nagvasuki Temple)

नागवासुकी भगवान शिव के कण्ठहार हैं। समुद्र मंथन की पौराणिक कथा के अनुसार, नागवासुकी सागर को मथने के लिए रस्सी के रूप में प्रयुक्त हुए थे। समुद्र मंथन के बाद भगवान विष्णु के कहने पर नागवासुकी ने प्रयाग में विश्राम किया। देवताओं के आग्रह पर वे यहां स्थापित हो गए। मान्यता है कि प्रयागराज में संगम स्नान के बाद नागवासुकी का दर्शन करने से ही पूर्ण फल की प्राप्ति होती है। नागवासुकी का मंदिर वर्तमान काल में प्रयागराज (Nagvasuki Temple, Prayagraj) के दारागंज मोहल्ले में गंगा नदी के तट पर स्थित है।

नागवासुकी ने किया त्रिवेणी संगम में स्नान (Prayagraj Sangam)

नागवासुकी कथा का वर्णन स्कंद पुराण, पद्म पुराण, भागवत पुराण और महाभारत में भी मिलता है। समुद्र मंथन की कथा के अनुसार, जब देव और असुर, भगवान विष्णु के कहने पर सागर मथने के लिए तैयार हुए तो मंदराचल पर्वत मथानी और नागवासुकी को रस्सी बनाया गया था। मंदराचल पर्वत की रगड़ से नागवासुकी जी का शरीर छिल गया था। तब भगवान विष्णु के कहने पर उन्होंने प्रयाग में विश्राम किया और त्रिवेणी संगम में स्नान कर घावों से मुक्ति प्राप्त की।

संगम स्नान के बाद दर्शन अनिवार्य (Sangam Snan 2025)

वाराणसी के राजा दिवोदास ने तपस्या कर उनसे भगवान शिव की नगरी काशी चलने का वरदान मांगा। दिवोदास की तपस्या से प्रसन्न होकर जब नागवासुकी प्रयाग से जाने लगे तो देवताओं ने उनसे प्रयाग में रहने का आग्रह किया। तब नागवासुकी ने कहा कि यदि मैं प्रयागराज में रुकूंगा तो संगम स्नान के बाद श्रद्धालुओं के लिए मेरा दर्शन करना अनिवार्य होगा। सावन मास की पंचमी के दिन तीनों लोकों में मेरी पूजा होनी चाहिए। देवताओं ने उनकी इन मांगों को स्वीकार कर लिया। तब ब्रह्माजी के मानस पुत्र ने मंदिर बना दिया। नागवासुकि को प्रयागराज के उत्तर पश्चिम में संगम तट पर स्थापित किया गया।

नागवासुकि मंदिर में भोगवती तीर्थ (Bhogwati Teerth)

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, देव नदी गंगा जी का धरती पर अवतरण हुआ। भगवान शिव की जटा से उतर कर मां गंगा का वेग अत्यंत तीव्र था। वे सीधे पाताल में प्रवेश कर रहीं थी। तब नागवासुकि ने ही अपने फन से भोगवती तीर्थ का निर्माण किया। नागवासुकी मंदिर के पुजारी श्याम लाल त्रिपाठी ने बताया कि प्राचीन काल में मंदिर के पश्चिमी भाग में भोगवती तीर्थ कुंड था, जो वर्तमान में कालकवलित हो गया है। मान्यता है बाढ़ के समय जब मां गंगा मंदिर की सीढ़ियों को स्पर्श करती हैं, उस समय इस घाट पर गंगा स्नान से भोगवती तीर्थ के स्नान का पुण्य मिलता है।

नागपंचमी पर सर्पों का पूजन पर्व (Nagpanchami Puja)

मंदिर के पुजारी ने बताया कि नागपंचमी पर्व की शुरुआत भगवान नागवासुकी जी की शर्तों के कारण हुई। नाग पंचमी के दिन मंदिर में प्रत्येक वर्ष मेला लगता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान वासुकी का दर्शन कर चांदी के नाग-नागिन का जोड़ा अर्पित करने मात्र से कालसर्प दोष से मुक्ति मिलती है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक मास की पंचमी तिथि को नागवासुकी के विशेष पूजन का विधान है। इस मंदिर में कालसर्प दोष और रूद्राभिषेक करने से जातक के जीवन में आने वाली सभी तरह की बाधाएं समाप्त हो जाती हैं।

महाकुम्भ में मंदिर का जीर्णोद्धार

पौराणिक वर्णन के अनुसार, प्रयागराज के द्वादश माधवों में से असि माधव का स्थान भी मंदिर में ही था। इस वर्ष देवोत्थान एकादशी के दिन असि माधव जी के नये मंदिर में उन्हें पुनः प्रतिष्ठित किया गया है। उन्होंने बताया कि इस महाकुम्भ में नागवासुकी मंदिर और उनके प्रांगण का जीर्णोंद्धार और सौंदर्यीकरण का कार्य हुआ है। मंदिर की महत्ता से नई पीढ़ी को भी परिचित कराया जा रहा है। संगम स्नान, कल्पवास और कुम्भ स्नान के बाद नागवासुकी के दर्शन के बाद ही पूर्ण फल की प्राप्ति होती है और जीवन में आने वाली सभी बाधांए दूर होती हैं।

(हिन्दुस्थान समाचार के इनपुट के साथ) 

यह भी पढ़ें : Mahakumbh 2025 : धर्म ध्वज का है धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

About the Author: स्मिता
स्मिता धर्म-अध्यात्म, संस्कृति-साहित्य, और स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर शोधपरक और प्रभावशाली पत्रकारिता में एक विशिष्ट नाम हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में उनका लंबा अनुभव समसामयिक और जटिल विषयों को सरल और नए दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत करने में उनकी दक्षता को उजागर करता है। धर्म और आध्यात्मिकता के साथ-साथ भारतीय संस्कृति और साहित्य के विविध पहलुओं को समझने और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने में उन्होंने विशेषज्ञता हासिल की है। स्वास्थ्य, जीवनशैली, और समाज से जुड़े मुद्दों पर उनके लेख सटीक और उपयोगी जानकारी प्रदान करते हैं। उनकी लेखनी गहराई से शोध पर आधारित होती है और पाठकों से सहजता से जुड़ने का अनोखा कौशल रखती है।
Leave A Comment

अन्य लाइफस्टाइल खबरें