छठ से पहले यमुना के पानी पर बड़ा सवाल, UPPCB की रिपोर्ट में नहाने योग्य नहीं मिला जल
Authored By: Galgotias Times Bureau
Published On: Saturday, October 31, 2026
Updated On: Saturday, October 31, 2026
एक तरफ यमुना की सफाई को लेकर तमाम दावे किए जा रहे हैं, तो दूसरी ओर उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) की जांच रिपोर्ट इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है. रिपोर्ट के अनुसार, यमुना का जल न केवल पीने, बल्कि नहाने योग्य भी नहीं मिला है. यह स्थिति तब सामने आई है, जब छठ का पर्व नजदीक है. आखिर अरबों की रकम खर्च करने के बावजूद यमुना स्वच्छ क्यों नहीं हो पा रही है और इसमें दुशवारियां क्या हैं, जानते हैं इस रिपोर्ट में…
Authored By: Galgotias Times Bureau
Updated On: Saturday, October 31, 2026
नोएडा और आसपास के क्षेत्रों में नदी का जल न केवल बदबू मार रहा है, बल्कि यूपीपीसीबी के आंकड़ों में भी प्रदूषण के स्तर में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है. यूपीपीसीबी के आंकड़ों के अनुसार, 21 से 28 सितंबर के बीच तिलवाड़ा गांव के पास जैविक प्रदूषण यानी बीओडी का स्तर 14.2 से बढ़कर 18 मिलीग्राम प्रति लीटर पहुंच गया, जो करीब 27 फीसदी का उछाल है. इसी अवधि में यहां रासायनिक ऑक्सीजन की मांग यानी सीओडी भी 73.6 से बढ़कर 84.8 मिलीग्राम प्रति लीटर दर्ज की गई.
नदी में टोटल अपशिष्ट यानी ‘टोटल सस्पेंडेड सालिड्स’ (टीएसएस) की मात्रा 114 से बढ़कर 126 मिलीग्राम प्रति लीटर हो गई है, वहीं, टर्बिडिटी यानी गंदापन भी 27 से बढ़कर 29 एनटीयू पर पहुंच गया है. हालांकि, तिलवाड़ा में घुलित ऑक्सीजन का स्तर 1.7 से मामूली रूप से सुधरकर 2.2 मिलीग्राम प्रति लीटर हुआ है, लेकिन यह स्तर अब भी जलीय जीवों के लिए बेहद खतरनाक है. प्रदूषण की ऐसी ही स्थिति ओखला बैराज के आसपास भी है.
नहीं सुधर रहे हालात
एक सप्ताह के भीतर ओखला बैराज के पास बीओडी का स्तर 12 से बढ़कर 15 मिलीग्राम प्रति लीटर दर्ज किया गया, जो 25 फीसदी की वृद्धि है. वहीं, सीओडी 60 से बढ़कर 76 मिलीग्राम प्रति लीटर पहुंच गई, जिसमें 27 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई. टीएसएस भी 99 से बढ़कर 104 मिलीग्राम प्रति लीटर हो गया.
चिंता की बात यह है कि ओखला क्षेत्र में घुलित ऑक्सीजन का स्तर 4.1 से घटकर 3.7 मिलीग्राम प्रति लीटर रह गया है. हालांकि, पिछले वर्ष के आंकड़ों से तुलना करें तो अक्टूबर 2025 में सितंबर-11 के पास बीओडी 70 से 72 और सीओडी 348 से 336 मिलीग्राम प्रति लीटर के बीच रही थी. इसके मुकाबले मौजूदा आंकड़े थोड़े कम हैं, लेकिन स्थिति अब भी गंभीर बनी हुई है.
अब तलक अरबों रुपये हो चुके हैं खर्च
यमुना सफाई पर अब तक ₹10,000 करोड़ से अधिक की राशि खर्च हो चुकी है, और इसके अतिरिक्त सीवर नेटवर्क व नए एसटीपी (STP) निर्माण के लिए लगभग ₹8,941 करोड़ की नई परियोजनाएं प्रगति पर हैं.
परेशानियों की ये हैं अहम वजह
1993 से शुरू हुए ‘यमुना एक्शन प्लान’ (YAP-I, II, III), नमामि गंगे और दिल्ली जल बोर्ड के विभिन्न प्रोजेक्ट्स के तहत भारी भरकम बजट के बावजूद मुख्य रूप से निम्नलिखित दिक्कतें आती हैं:
अनुपचारित सीवेज (Untreated Sewage): दिल्ली में प्रतिदिन 3,500 से 4,000 मिलियन लीटर से अधिक सीवेज उत्पन्न होता है. सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (STP) की कुल क्षमता और वर्तमान उपयोग दर इस भार से कम होने के कारण गंदा पानी सीधे नदी में गिरता है.
नालों का अनियंत्रित बहाव: दिल्ली में नजफगढ़, शाहदरा और सप्लीमेंट्री ड्रेन समेत 18 से 22 बड़े नाले यमुना के लगभग 75–80% प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं. कई नालों की टैपिंग और इंटरसेप्टर परियोजनाएं अधूरी या असक्षम रही हैं.
प्राकृतिक जल प्रवाह (Ecological Flow) की कमी: हथनीकुंड बैराज से पानी नहरों (पश्चिमी और पूर्वी यमुना नहर) में मोड़ दिए जाने के कारण दिल्ली में यमुना के पास स्वयं को साफ करने (Self-purification) के लिए ताजे पानी का प्राकृतिक बहाव लगभग शून्य हो जाता है.
अनाधिकृत कॉलोनियां और सेप्टिक वेस्ट: दिल्ली की सैकड़ों गैर-स्वीकृत कॉलोनियों और झुग्गियों में भूमिगत सीवर लाइनें नहीं हैं. निजी टैंकर अक्सर सेप्टिक टैंकों का मल-मूत्र सीधे नालों में खाली कर देते हैं.
औद्योगिक कचरा व डिटर्जेंट (सफेद झाग): अनधिकृत फैक्ट्रियों और आवासीय नालों से आने वाले फॉस्फेट व अमोनिया की अधिकता के कारण पानी में ऑक्सीजन (DO) का स्तर शून्य हो जाता है और ओखला/कालिंदी कुंज जैसे बैराजों पर जहरीला झाग बनता है.
एजेंसियों में समन्वय का अभाव: दिल्ली जल बोर्ड, एमसीडी, डीडीए, सिंचाई विभाग और पड़ोसी राज्यों (हरियाणा व यूपी) के बीच प्रभावी तालमेल की कमी कार्यों की गति और निगरानी को प्रभावित करती है.
Written By: Rajiv Mandal
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