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BRICS बना दुनिया की नई आर्थिक ताकत, भारत-रूस साझेदारी से बदल रहा वैश्विक शक्ति संतुलन
Authored By: Nishant Singh
Published On: Friday, May 15, 2026
Last Updated On: Friday, May 15, 2026
BRICS अब आर्थिक ताकत के मामले में G7 से आगे निकल चुका है. भारत-रूस की बढ़ती साझेदारी, सस्ते रूसी तेल, ऊर्जा सुरक्षा और स्थानीय मुद्रा में व्यापार जैसे मुद्दे वैश्विक राजनीति को नई दिशा दे रहे हैं. आने वाला BRICS शिखर सम्मेलन दुनिया के बदलते आर्थिक और रणनीतिक शक्ति संतुलन का बड़ा संकेत माना जा रहा है.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Friday, May 15, 2026
दुनिया की अर्थव्यवस्था में अब बड़ा बदलाव दिखाई देने लगा है. कभी वैश्विक ताकत का केंद्र माने जाने वाले G7 देशों को अब BRICS समूह कड़ी चुनौती दे रहा है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी IMF की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, क्रय शक्ति समता यानी PPP के आधार पर BRICS देशों की संयुक्त अर्थव्यवस्था 88 खरब डॉलर तक पहुंच चुकी है, जबकि G7 की अर्थव्यवस्था करीब 62 खरब डॉलर पर सिमट गई है. इसका मतलब साफ है कि अब दुनिया का आर्थिक संतुलन धीरे-धीरे पश्चिमी देशों से निकलकर एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की ओर बढ़ रहा है. BRICS में भारत, रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के साथ अब मिस्र, ईरान, यूएई, इथियोपिया और इंडोनेशिया जैसे देश भी शामिल हो चुके हैं, जिससे इसकी ताकत और बढ़ गई है.
सिर्फ आंकड़े नहीं, आबादी और बाजार भी BRICS की ताकत
BRICS की असली ताकत केवल उसकी अर्थव्यवस्था नहीं बल्कि उसकी विशाल आबादी भी है. इस समूह के सदस्य देशों में दुनिया की लगभग आधी आबादी रहती है. यानी दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार अब BRICS देशों के पास है. यही वजह है कि वैश्विक व्यापार और उत्पादन में इन देशों की भूमिका लगातार बढ़ रही है. चीन का बढ़ता निर्यात, भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और रूस की ऊर्जा शक्ति इस गठबंधन को बेहद मजबूत बना रही है. दूसरी ओर अमेरिका और कई पश्चिमी देश लगातार व्यापार घाटे और महंगाई जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं. यही कारण है कि अब BRICS केवल एक संगठन नहीं बल्कि पश्चिमी आर्थिक व्यवस्था के विकल्प के रूप में देखा जाने लगा है.
भारत-रूस की दोस्ती क्यों बन रही नई ताकत?
यूक्रेन युद्ध के बाद दुनिया की राजनीति और ऊर्जा बाजार पूरी तरह बदल गए. पहले भारत रूस से बहुत कम तेल खरीदता था, लेकिन अब स्थिति बिल्कुल अलग है. भारत के कुल तेल आयात का बड़ा हिस्सा अब रूस से आने लगा है. रूस से सस्ता कच्चा तेल मिलने के कारण भारत को महंगाई नियंत्रित रखने में मदद मिली है. यही वजह है कि दोनों देशों की साझेदारी अब सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं रही, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक स्तर पर भी मजबूत हो रही है. रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की भारत यात्रा भी इसी बढ़ती साझेदारी का संकेत मानी जा रही है. पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए रूस के साथ ऊर्जा सहयोग जारी रखा है.
होर्मुज संकट और BRICS की बड़ी रणनीति
इस समय दुनिया की सबसे बड़ी चिंता ऊर्जा सुरक्षा को लेकर है. होर्मुज स्ट्रेट से दुनिया का बड़ा तेल व्यापार गुजरता है और वहां बढ़ता तनाव कई देशों के लिए खतरा बन गया है. भारत का भी बड़ा तेल आयात इसी समुद्री रास्ते पर निर्भर करता है. ऐसे में BRICS देशों के बीच इस बात पर चर्चा हो रही है कि तेल व्यापार को कैसे सुरक्षित और स्थिर बनाया जाए. खबरें हैं कि सदस्य देश आपसी व्यापार में तय मूल्य सीमा और स्थानीय मुद्रा में भुगतान जैसे विकल्पों पर विचार कर रहे हैं. भारत और रूस के बीच रुपये में तेल भुगतान की व्यवस्था भी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है. अगर यह मॉडल सफल होता है, तो डॉलर पर निर्भरता कम हो सकती है और वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है.
क्या BRICS सच में बदल देगा दुनिया का पावर बैलेंस?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या BRICS वास्तव में G7 का विकल्प बन पाएगा? आर्थिक आंकड़े तो BRICS के पक्ष में दिख रहे हैं, लेकिन असली चुनौती सदस्य देशों के बीच तालमेल और ठोस नीतियों की है. भारत इस पूरे समीकरण में बेहद अहम भूमिका निभा रहा है, क्योंकि वह पश्चिम और रूस दोनों के साथ संतुलन बनाकर चल रहा है. आने वाले BRICS शिखर सम्मेलन पर पूरी दुनिया की नजर है. अगर ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और भुगतान प्रणाली जैसे मुद्दों पर ठोस फैसले होते हैं, तो BRICS भविष्य की नई वैश्विक ताकत बन सकता है. लेकिन अगर केवल बयानबाजी तक बात सीमित रही, तो यह बढ़त सिर्फ आंकड़ों में ही दिखाई देगी.













