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Bihar Politics: लालू परिवार में महाभारत, भाई से बगावत, तेजस्वी ने रचा चक्रव्यूह, तेजप्रताप फंसे महुआ के मैदान में
Authored By: Nishant Singh
Published On: Thursday, October 30, 2025
Last Updated On: Thursday, October 30, 2025
Bihar Politics: बिहार की सियासत में इस वक्त सबसे दिलचस्प और पारिवारिक जंग छिड़ी है - तेजस्वी बनाम तेजप्रताप की. महुआ सीट पर लालू यादव के दोनों बेटे आमने-सामने हैं. तेजस्वी ने अपने बड़े भाई के खिलाफ चक्रव्यूह रच दिया है और अपने करीबी मुकेश रोशन को मैदान में उतारकर खेल पलट दिया है. अब सवाल ये है कि क्या तेजप्रताप “परिवार से निकाले गए बेटे” की सहानुभूति से वापसी करेंगे या तेजस्वी की चाल उन्हें मात दे देगी?
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Thursday, October 30, 2025
Bihar Politics: बिहार की राजनीति इस वक्त सबसे दिलचस्प मोड़ पर है, क्योंकि इस बार लड़ाई सिर्फ सियासी नहीं, बल्कि पारिवारिक भी है. लालू प्रसाद यादव के दो बेटे तेजस्वी और तेजप्रताप अब आमने-सामने खड़े हैं. तेजस्वी यादव ने अपने बड़े भाई तेज प्रताप के खिलाफ महुआ सीट पर ऐसा चक्रव्यूह रच दिया है, जिससे निकलना उनके लिए आसान नहीं दिख रहा. तेजस्वी भले मंच पर तेजप्रताप के खिलाफ कुछ न बोले हों, लेकिन टिकट वितरण और रणनीति से उन्होंने सब कुछ साफ कर दिया है.
महुआ की सियासी गर्मी: लालू परिवार की विरासत दांव पर
महुआ विधानसभा सीट, वैशाली जिले की वो धरती है, जहां से तेजप्रताप यादव ने 2015 में अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की थी. उसी सीट पर आज वे फिर लौटे हैं – लेकिन इस बार लालू परिवार से अलग अपनी नई पार्टी जनशक्ति जनता दल (JJD) के बैनर तले. दिलचस्प ये है कि जब उन्होंने नामांकन दाखिल किया, तो परिवार का कोई सदस्य उनके साथ नहीं था. वहीं तेजस्वी ने उसी सीट पर अपने खास करीबी मुकेश रोशन को टिकट देकर अपने इरादे जाहिर कर दिए- कि वे महुआ की गद्दी किसी भी कीमत पर तेजप्रताप को नहीं सौंपेंगे.
आरजेडी का गढ़ और इतिहास की पटकथा
महुआ सीट का आरजेडी से पुराना रिश्ता रहा है. 2015 में तेज प्रताप ने यहीं से जीत हासिल कर लालू की विरासत को आगे बढ़ाया था. लेकिन 2020 में उन्हें हसनपुर भेज दिया गया, जहां वे 21,000 वोटों से जीते. उसी चुनाव में महुआ से तेजस्वी के करीबी मुकेश रोशन ने जीत दर्ज की. अब 2025 में मुकाबला है – तेजप्रताप यादव (जेजेडी), मुकेश रोशन (आरजेडी), संजय कुमार सिंह (लोजपा), और जन सुराज पार्टी के इंद्रजीत प्रधान के बीच. इस सीट पर कुल 2.86 लाख मतदाता हैं- जिसमें 25–30% यादव, 21% दलित, 15% मुस्लिम और 20% कोइरी–कुर्मी समुदाय के मतदाता हैं. यही समीकरण इस बार का खेल तय करेगा.
तेजस्वी का चक्रव्यूह: यादव वोटों में सेंध की रणनीति
तेजस्वी यादव की रणनीति बेहद साफ है कि यादव वोटों को अपने खेमे में रखना और तेजप्रताप को कमजोर करना. मुकेश रोशन यादव समुदाय से हैं, और तेजस्वी के करीबी माने जाते हैं. पिछले चुनाव में उन्होंने स्थानीय मुद्दों – सड़कों, बिजली, और पानी पर जोर दिया था, जिससे ग्रामीण इलाकों में पकड़ मजबूत हुई. तेजस्वी का पूरा प्रचार तंत्र अब रोशन के पीछे है, ताकि यादव वोट का बड़ा हिस्सा (लगभग 60%) उन्हीं को मिले.
तेजप्रताप की छवि “बागी बेटे” की है, और आरजेडी से निष्कासन ने इस छवि को और उभारा है. वहीं एनडीए के उम्मीदवार संजय कुमार सिंह दलित–पासवान वोटों को एकजुट करने में लगे हैं. अगर यादव वोट बंट गया और दलित एनडीए की ओर झुके, तो तेजप्रताप की लड़ाई मुश्किल में पड़ सकती है.
जातीय समीकरण और सियासी संतुलन का खेल
महुआ का चुनाव पूरी तरह जातीय गणित पर टिका है. यादव समुदाय का झुकाव तेजप्रताप की ओर भावनात्मक रूप से है कि आखिर वे “लालू के बड़े बेटे” हैं. लेकिन तेजस्वी के संगठन और आरजेडी ब्रांड की पकड़ मजबूत है. मुस्लिम वोटर परंपरागत रूप से आरजेडी के साथ रहते हैं, हालांकि तेजप्रताप का “लालू टैग” उन्हें कुछ हद तक वोट दिला सकता है.
दलित समुदाय (21%) पासवान समाज से जुड़ा है, जो चिराग पासवान के एनडीए उम्मीदवार संजय सिंह के साथ जा सकता है. वहीं महिलाएं विकास और रोजगार के मुद्दे पर वोट करेंगी और तेजप्रताप का “मेडिकल कॉलेज प्रोजेक्ट” यहां निर्णायक भूमिका निभा सकता है.
तेज प्रताप की उम्मीदें: विरासत और विकास का दांव
तेज प्रताप के पास अभी भी दो बड़े हथियार हैं कि लालू यादव की विरासत और मेडिकल कॉलेज का काम. 2015–2020 के बीच स्वास्थ्य मंत्री रहते हुए उन्होंने महुआ में 465 करोड़ के मेडिकल कॉलेज की नींव रखी थी. आज वह कॉलेज पूरा होने की कगार पर है, और ग्रामीण इसे तेजप्रताप की उपलब्धि मानते हैं.
सोशल मीडिया पर तेजप्रताप की लोकप्रियता भी बढ़ रही है. लोग उन्हें “परिवार से निकाला गया बेटा” कहकर सहानुभूति जता रहे हैं. अगर यादव वोटों का 70% और मुस्लिम वोटों का 40% हिस्सा उन्हें मिलता है, तो वे 70,000 से अधिक वोट हासिल कर सकते हैं कि जो 2020 के रोशन के स्कोर से ज्यादा है.
अंतिम मुकाबला: लालू की विरासत बनाम तेजस्वी की चाल
महुआ की लड़ाई अब “सत्ता” बनाम “संबंध” की हो चुकी है. तेजस्वी यादव के लिए ये सीट उनके राजनीतिक नियंत्रण की परीक्षा है, तो तेजप्रताप के लिए अपनी पहचान की जंग. अगर तेजप्रताप भावनाओं और विकास के मुद्दों को जोड़कर वोटरों के दिल जीत लेते हैं, तो वे सिर्फ महुआ ही नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में अपनी अलग पहचान कायम कर सकते हैं. पर अगर तेजस्वी का “चक्रव्यूह” काम कर गया, तो लालू परिवार की ये जंग एक भाई की राजनीतिक समाप्ति का संकेत भी बन सकती है. महुआ का मैदान तय करेगा – लालू की गद्दी किस बेटे को मिलेगी.
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