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Trump Tariffs War: वाशिंगटन में बढ़ती नीतिगत अनिश्चितता, कैसे बीजिंग के दरवाजे खोल रही है?
Authored By: गुंजन शांडिल्य
Published On: Wednesday, January 28, 2026
Last Updated On: Wednesday, January 28, 2026
ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति ने वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता बढ़ाई है. चीन इसी अनिश्चितता को अपने लिए अवसर में बदल रहा है. शायद यही वजह है कि दुनिया के कई देश चाहे वे अमेरिका के पुराने सहयोगी हों या उभरती अर्थव्यवस्थाएं, सभी बीजिंग की ओर देख रहे हैं.
Authored By: गुंजन शांडिल्य
Last Updated On: Wednesday, January 28, 2026
Trumps Tariffs War: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जब एक साल पहले दोबारा व्हाइट हाउस में कदम रखा और अपने ‘अमेरिका फर्स्ट’ एजेंडे को और सख़्ती से लागू करना शुरू किया, तब वैश्विक बाज़ारों में एक ही सवाल गूंज रहा था कि क्या चीन की सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था इस दबाव को झेल पाएगी?
लेकिन पिछले साल (2025) के आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं. बीजिंग ने न सिर्फ़ दबाव झेला, बल्कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था में अपनी भूमिका को और मज़बूत भी किया. यही कारण रहा कि पिछले साल चीन ने $1.2 ट्रिलियन का ऐतिहासिक व्यापार अधिशेष हासिल कर लिया. यह अब तक का सबसे ज्यादा है.
टैरिफ वॉर पर चीनी पलटवार
ट्रंप प्रशासन ने अप्रैल 2025 में चीन पर टैरिफ को 100 प्रतिशत से अधिक तक बढ़ाकर सीधे टकराव का रास्ता चुना. इसी रणनीति के तहत ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में अमेरिका-चीन संबंधों को निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया था.
हालांकि इस बार बीजिंग की प्रतिक्रिया केवल जवाबी टैरिफ तक सीमित नहीं रही. चीन ने चुपचाप अपने निर्यात का भूगोल बदलना शुरू किया. उसने अमेरिका पर अपनी निर्भरता घटाई. साथ ही नए व पुराने साझेदारों के साथ रिश्तों को पुनर्गठित किया.
चीनी रणनीति का सकारात्मक प्रभाव
2025 में अमेरिका को चीनी शिपमेंट्स में 20 प्रतिशत की गिरावट आई. वहीं अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, दक्षिण-पूर्व एशिया और यूरोपीय संघ को निर्यात में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज हुई.
ट्रंप पुराने साथी से दूर
अंतर्राष्ट्रीय मामलों खासकर अमेरिका के जानकारों का मानना है कि ट्रंप की नीतियों ने अमेरिका के पारंपरिक सहयोगियों जैसे यूरोप, कनाडा और एशिया-प्रशांत क्षेत्र के साथ रिश्तों में असहजता पैदा की है. इसी खाली जगह को चीन ने तेज़ी से भरा है.
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की हालिया बीजिंग यात्रा इसका उदाहरण है. 2017 के बाद पहली बार किसी कनाडाई प्रधानमंत्री ने चीन का दौरा किया था. दोनों देशों ने व्यापार बाधाएं हटाने व नए रणनीतिक रिश्ते की दिशा में समझौता किया.
दौरे में कार्नी ने चीन को ‘अधिक अनुमानित और विश्वसनीय भागीदार’ बताया. उनका यह बयान मौजूदा वैश्विक संदर्भ में बहुत कुछ कहता है.
स्टारमर की चीन यात्रा
इसी पृष्ठभूमि में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर की चार-दिवसीय चीन यात्रा हो रही है. 2018 के बाद यह किसी ब्रिटिश प्रधानमंत्री की पहली चीन यात्रा है. यह दौरा केवल रिश्ते सुधारने की औपचारिक कोशिश नहीं. इसका एक स्पष्ट संकेत है कि लंदन भी वॉशिंगटन की अनिश्चितता के बीच विकल्प तलाश रहा है.
बोस्टन कॉलेज के अर्थशास्त्री अलेक्जेंडर टॉमिक कहते हैं, “$20 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था और $45 ट्रिलियन के स्टॉक-बॉन्ड बाज़ारों के साथ चीन कई देशों के लिए ‘स्थिर भागीदार’ बनता जा रहा है.”
चीन की लचीली अर्थव्यवस्था
अमेरिका के साथ बढ़ते तनाव, घरेलू खपत में कमी और लंबे समय से जूझ रहे प्रॉपर्टी सेक्टर के बावजूद चीन ने 2025 में 5 प्रतिशत के आधिकारिक विकास लक्ष्य को हासिल कर लिया है. यह उपलब्धि बताती है कि बीजिंग की नीति-निर्माण मशीनरी केवल निर्यात पर नहीं, बल्कि आंतरिक स्थिरता पर भी ध्यान दे रही है.
सरकार ने विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए दूरसंचार, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में बाज़ार पहुंच बढ़ाने के पायलट प्रोग्राम शुरू किए हैं. दिसंबर 2025 में देश में $100.1 बिलियन का रिकॉर्ड मासिक फॉरेक्स इनफ्लो दर्ज हुआ. जबकि विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर $3.36 ट्रिलियन पर पहुंच गया है. यह दस साल का उच्चतम स्तर है.
युआन का उभार और डॉलर की चुनौती
चीन की सबसे सटीक रणनीतिक चाल अपनी मुद्रा युआन का अंतरराष्ट्रीयकरण करना रहा. ट्रंप की अनियमित व्यापार और कूटनीतिक शैली के कारण डॉलर निवेशकों के लिए कम आकर्षक होता दिख रहा है. इस खाली जगह को युआन भरने की कोशिश में है.
आज चीन के आधे से अधिक क्रॉस-बॉर्डर लेन-देन युआन में सेटल होते हैं. जबकि 15 साल पहले यह लगभग शून्य था. शंघाई इंडेक्स में 27 प्रतिशत की सालाना बढ़त, रिकॉर्ड मार्केट टर्नओवर और युआन आधारित बैंक लोन इस बदलाव के संकेत हैं.
एक वैश्विक बैंक के वरिष्ठ बैंकर ने कहा कि चीन पहले भी युआन को अंतरराष्ट्रीय बनाने की कोशिश करता रहा था, लेकिन इस बार हालात अलग हैं. ट्रंप की नीतियां अनजाने में युआन के लिए अवसर बना रही हैं.
नई वैश्विक व्यापार व्यवस्था
दिलचस्प यह है कि अमेरिका से जोखिम घटाने की कोशिश सिर्फ़ चीन तक सीमित नहीं है. भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुआ नया व्यापार समझौता भी इसी प्रवृत्ति का हिस्सा है. यह सौदा 2032 तक यूरोपीय निर्यात को लगभग दोगुना कर सकता है. यह सब वैश्विक व्यापार में मल्टी-पोलर व्यवस्था की ओर इशारा कर रहा है.
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