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Iran Kuwait Clash: ईरान नहीं, समुद्र बना कुवैत का दुश्मन, धीरे-धीरे खत्म हो रही फैलाका द्वीप की जमीन
Authored By: Nishant Singh
Published On: Saturday, June 6, 2026
Last Updated On: Saturday, June 6, 2026
Iran Kuwait Clash: कुवैत का ऐतिहासिक फैलाका द्वीप जलवायु परिवर्तन और बढ़ते समुद्री जलस्तर के कारण धीरे-धीरे सिकुड़ रहा है. पिछले तीन दशकों में इसकी जमीन कम हुई है और वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2100 तक द्वीप का बड़ा हिस्सा पानी में समा सकता है, जिससे कुवैत की चिंता बढ़ गई है.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Saturday, June 6, 2026
Iran Kuwait Clash: मध्य पूर्व में ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के कारण कुवैत भी चर्चा में बना हुआ है. कुवैत लंबे समय से अमेरिका का करीबी सहयोगी रहा है, इसलिए क्षेत्रीय राजनीतिक घटनाओं का असर उस पर भी पड़ता है. लेकिन इन दिनों कुवैत के सामने एक ऐसी समस्या खड़ी हो गई है, जिसका संबंध युद्ध या राजनीति से नहीं बल्कि प्रकृति से है. देश का ऐतिहासिक फैलाका द्वीप धीरे-धीरे समुद्र में समाता जा रहा है. वैज्ञानिकों और भूगोल विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और बढ़ते समुद्री जलस्तर के कारण इस द्वीप का बड़ा हिस्सा आने वाले दशकों में खत्म हो सकता है.
कुवैत का अनमोल द्वीप है फैलाका
फारस की खाड़ी में स्थित फैलाका द्वीप कुवैत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. लगभग 46 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला यह द्वीप हजारों वर्षों के इतिहास को अपने भीतर समेटे हुए है. माना जाता है कि यहां प्राचीन सभ्यताओं के निशान मौजूद हैं, जिसके कारण इसका ऐतिहासिक महत्व और बढ़ जाता है. इसके अलावा यह द्वीप पर्यटन के लिहाज से भी बेहद खास है. हर साल बड़ी संख्या में स्थानीय लोग और पर्यटक यहां घूमने आते हैं. यहां का प्राकृतिक वातावरण और जैव विविधता कुवैत के अन्य इलाकों से अलग मानी जाती है.
समुद्र का बढ़ता जलस्तर बना सबसे बड़ा खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार फैलाका द्वीप के आसपास समुद्र का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है. पिछले तीन दशकों में यहां पानी का स्तर करीब 9 सेंटीमीटर तक बढ़ चुका है. यह बदलाव सुनने में छोटा लग सकता है, लेकिन समुद्री तटों और द्वीपों के लिए यह बेहद गंभीर संकेत माना जाता है. बढ़ते जलस्तर के कारण तटीय क्षेत्रों की मिट्टी का कटाव तेज हो रहा है और जमीन धीरे-धीरे समुद्र में समा रही है. यही वजह है कि फैलाका द्वीप का कुल क्षेत्रफल लगातार कम होता जा रहा है.
तीन दशक में घट गई द्वीप की जमीन
जानकारों के अनुसार वर्ष 1990 में फैलाका द्वीप का क्षेत्रफल लगभग 48 वर्ग किलोमीटर था, लेकिन अब यह घटकर करीब 46 वर्ग किलोमीटर रह गया है. यानी पिछले कुछ वर्षों में लगभग 2 वर्ग किलोमीटर जमीन समुद्र के प्रभाव से खत्म हो चुकी है. यह बदलाव केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे स्थानीय पारिस्थितिकी और पर्यटन गतिविधियों पर भी असर पड़ रहा है. यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में नुकसान और तेजी से बढ़ सकता है.
2050 और 2100 के लिए चेतावनी
वैज्ञानिकों की भविष्यवाणियां कुवैत के लिए चिंता बढ़ाने वाली हैं. अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2050 तक समुद्र का जलस्तर यहां 25 सेंटीमीटर तक बढ़ सकता है. यदि ऐसा होता है तो द्वीप की लगभग 7 प्रतिशत भूमि प्रभावित हो सकती है. इससे भी अधिक चिंताजनक अनुमान वर्ष 2100 के लिए है, जब द्वीप की करीब एक-तिहाई जमीन पानी में डूब सकती है. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समुद्र का स्तर एक मीटर तक बढ़ गया तो फैलाका की लगभग 25 प्रतिशत भूमि पूरी तरह जलमग्न हो सकती है.
जलवायु परिवर्तन का बढ़ता असर
फैलाका द्वीप की स्थिति इस बात का बड़ा उदाहरण है कि जलवायु परिवर्तन केवल मौसम तक सीमित समस्या नहीं है. इसका असर देशों की भौगोलिक सीमाओं, प्राकृतिक संसाधनों और सांस्कृतिक विरासत पर भी पड़ रहा है. दुनिया के कई तटीय शहर और द्वीप इसी तरह की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. कुवैत के लिए यह केवल जमीन खोने का मामला नहीं है, बल्कि एक ऐतिहासिक धरोहर को बचाने की लड़ाई भी है.
भविष्य के लिए जरूरी होंगे बड़े कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो फैलाका द्वीप का बड़ा हिस्सा आने वाले दशकों में समुद्र की भेंट चढ़ सकता है. तटीय सुरक्षा परियोजनाएं, पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के लिए वैश्विक स्तर पर प्रयास बेहद जरूरी हैं. फिलहाल कुवैत के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने इस ऐतिहासिक द्वीप को बचाने की है, जो धीरे-धीरे समुद्र की बढ़ती लहरों के सामने कमजोर पड़ता जा रहा है.
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