पहले नेता प्रतिपक्ष, फिर पार्टी दफ्तर और अब बैंक खाता… क्या ममता बनर्जी के हाथ से फिसल रही है TMC की कमान?
Authored By: Nishant Singh
Published On: Thursday, July 9, 2026
Last Updated On: Thursday, July 9, 2026
Mamata Banerjee: पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी सियासी संकट गहराता जा रहा है. नेता प्रतिपक्ष का पद, विधायकों और सांसदों का समर्थन, पार्टी संगठन और अब बैंक खाते तक विवादों में घिर गए हैं. इन घटनाक्रमों ने ममता बनर्जी के नेतृत्व और टीएमसी के भविष्य को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Thursday, July 9, 2026
Mamata Banerjee: पश्चिम बंगाल की राजनीति में कभी अजेय मानी जाने वाली ममता बनर्जी इन दिनों अपने सबसे कठिन राजनीतिक दौर से गुजरती दिखाई दे रही हैं. विधानसभा चुनाव में हार के बाद शुरू हुआ संकट अब केवल विपक्ष की राजनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पार्टी के अंदर भी बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. जिस तृणमूल कांग्रेस को ममता बनर्जी ने 1998 में खड़ा किया था, उसी पार्टी में अब नेतृत्व को लेकर खुली चुनौती सामने आ गई है. लगातार हो रहे घटनाक्रम यह संकेत दे रहे हैं कि पार्टी पर उनका नियंत्रण पहले जैसा मजबूत नहीं रह गया है.
नेता प्रतिपक्ष के पद पर पहला बड़ा झटका
चुनाव के बाद टीएमसी ने विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के लिए शोभन देव चट्टोपाध्याय के नाम का प्रस्ताव रखा था. लेकिन पार्टी के भीतर ही इस फैसले का विरोध शुरू हो गया. विधायक ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन शाह ने आरोप लगाया कि समर्थन पत्र में फर्जी हस्ताक्षर किए गए हैं. इसके बाद दोनों नेताओं को पार्टी से बाहर कर दिया गया, लेकिन मामला यहीं नहीं रुका. ऋतब्रत बनर्जी ने बड़ी संख्या में विधायकों का समर्थन जुटाकर विधानसभा अध्यक्ष को नया दावा पेश किया. अंततः उन्हें नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता मिल गई. इस फैसले ने ममता बनर्जी को पहला बड़ा राजनीतिक झटका दिया.
विधायकों और सांसदों की बगावत ने बढ़ाई मुश्किलें
टीएमसी के भीतर असंतोष धीरे-धीरे बड़े विद्रोह में बदल गया. बताया जा रहा है कि पार्टी के अधिकांश विधायक अब बागी गुट के साथ खड़े हैं. लोकसभा में भी बड़ी संख्या में सांसदों ने ममता बनर्जी का साथ छोड़ दिया, जिससे दिल्ली की राजनीति में पार्टी की ताकत कमजोर पड़ गई. राज्यसभा में भी कुछ सांसदों के इस्तीफे ने नेतृत्व पर सवाल खड़े कर दिए. इससे साफ दिखाई देने लगा कि पार्टी अब कई हिस्सों में बंट चुकी है और नेतृत्व को लेकर संघर्ष लगातार तेज हो रहा है.
संगठन और पार्टी दफ्तर पर भी बदला नियंत्रण
राजनीतिक विवाद केवल विधानसभा या संसद तक सीमित नहीं रहा. संगठन के भीतर भी बड़ा बदलाव देखने को मिला. बागी नेताओं की बैठक में ममता बनर्जी को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाकर अरूप रॉय को नई जिम्मेदारी सौंप दी गई. अभिषेक बनर्जी को भी महासचिव पद से हटाने का फैसला लिया गया. इतना ही नहीं, पार्टी कार्यालयों में नेतृत्व बदलने के साथ नए चेहरों को जिम्मेदारी दी गई और संगठन की कमान बागी गुट के हाथों में जाती दिखाई दी. हालांकि ममता बनर्जी को सलाहकार की भूमिका देने की बात कही गई, लेकिन सक्रिय नेतृत्व से उन्हें अलग कर दिया गया.
बैंक खाते फ्रीज होने से बढ़ा आर्थिक संकट
संगठनात्मक और राजनीतिक संकट के बीच आर्थिक मोर्चे पर भी टीएमसी को बड़ा झटका लगा. बागी गुट की शिकायत के बाद केंद्रीय एजेंसियों ने कथित वित्तीय अनियमितताओं और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों की जांच शुरू की. जांच के दौरान पार्टी के तीन प्रमुख बैंक खातों को फ्रीज कर दिया गया, जिनमें करीब 440 करोड़ रुपये जमा बताए गए हैं. आरोप है कि चुनाव के दौरान चार्टर्ड फ्लाइट और अन्य सेवाओं के लिए बड़ी रकम का भुगतान किया गया था. खाते फ्रीज होने के बाद पार्टी के खर्च और कानूनी लड़ाई को लेकर नई चुनौतियां सामने आ गई हैं.
बंगाल की राजनीति नए मोड़ पर
पश्चिम बंगाल की राजनीति फिलहाल तेज उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है. नेता प्रतिपक्ष का पद, विधायकों और सांसदों का समर्थन, संगठन की कमान और अब आर्थिक संसाधनों पर भी विवाद ने तृणमूल कांग्रेस को गहरे संकट में ला खड़ा किया है. आने वाले दिनों में अदालतों, चुनाव आयोग और राजनीतिक घटनाक्रमों पर सभी की नजर रहेगी. सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ममता बनर्जी दोबारा पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत कर पाएंगी, या फिर बंगाल की राजनीति में एक नए नेतृत्व का दौर शुरू होने वाला है.
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