ममता, ऋतब्रत और हुमायूं पर शुभेंदु सरकार का शिकंजा, तीन गुटों में बंटी टीएमसी की बढ़ीं सियासी मुश्किलें
Authored By: Nishant Singh
Published On: Wednesday, July 1, 2026
Last Updated On: Wednesday, July 1, 2026
पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद टीएमसी तीन गुटों में बंट चुकी है. ममता बनर्जी, ऋतब्रत बनर्जी और हुमायूं कबीर अलग-अलग राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. वहीं मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की सरकार जांच, कानूनी कार्रवाई और प्रशासनिक फैसलों के जरिए तीनों धड़ों पर सख्त रुख अपनाए हुए है.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Wednesday, July 1, 2026
TMC Internal Rift: पश्चिम बंगाल की राजनीति में सत्ता परिवर्तन के बाद राजनीतिक माहौल लगातार बदल रहा है. लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) इस समय अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है. चुनाव में हार के बाद पार्टी न सिर्फ विपक्ष में पहुंची, बल्कि उसके भीतर भी बड़ा विभाजन देखने को मिला. कभी एकजुट नजर आने वाली टीएमसी अब अलग-अलग गुटों में बंट चुकी है. दूसरी ओर मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की अगुवाई वाली सरकार इन सभी धड़ों पर अलग-अलग रणनीति के साथ नजर बनाए हुए है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में बंगाल की राजनीति और भी ज्यादा दिलचस्प हो सकती है.
तीन हिस्सों में बंटी टीएमसी, बदली राजनीतिक तस्वीर
विधानसभा चुनाव के बाद टीएमसी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आया. पार्टी के एक बड़े वर्ग ने ममता बनर्जी से दूरी बना ली. ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायकों ने अलग रास्ता चुना, जबकि कुछ सांसदों ने भी उनका साथ दिया. दूसरी ओर ममता बनर्जी के साथ वफादार नेताओं का एक छोटा लेकिन सक्रिय समूह बना हुआ है. वहीं पहले ही पार्टी से अलग होकर अपनी नई राजनीतिक पार्टी बनाने वाले हुमायूं कबीर भी अब अलग पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं. इस तरह टीएमसी तीन अलग-अलग राजनीतिक धड़ों में बंट चुकी है, जिससे बंगाल की राजनीति पूरी तरह बदल गई है.
ममता बनर्जी के गुट पर सरकार का फोकस
चुनावी हार और पार्टी में बड़ी टूट के बाद ममता बनर्जी अपने समर्थकों के साथ राजनीतिक जमीन बचाने की कोशिश कर रही हैं. हालांकि राज्य सरकार लगातार उनके कार्यकाल के दौरान हुए कथित भ्रष्टाचार, भर्ती घोटाले, राशन घोटाले और अन्य मामलों की जांच को आगे बढ़ा रही है. इसके साथ ही ममता के करीबी माने जाने वाले कई नेताओं पर भी कानूनी कार्रवाई तेज हुई है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इन कदमों का असर सीधे ममता गुट की संगठनात्मक ताकत पर पड़ सकता है.
शहीद दिवस की रैली पर भी लगा ब्रेक
TMC के लिए 21 जुलाई का शहीद दिवस सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं बल्कि उसकी राजनीतिक पहचान का अहम हिस्सा माना जाता है. इस बार ममता बनर्जी गुट ने बड़े शक्ति प्रदर्शन की तैयारी की थी, लेकिन प्रशासन ने संबंधित इलाके में धारा 163 लागू करते हुए रैली की अनुमति नहीं दी. इससे टीएमसी के कार्यक्रम पर रोक लग गई. माना जा रहा है कि इस फैसले से विपक्ष को अपनी ताकत दिखाने का बड़ा मौका नहीं मिल पाया.
ऋतब्रत बनर्जी गुट भी सरकार के निशाने पर
शुरुआत में माना जा रहा था कि ऋतब्रत बनर्जी की बगावत से सत्तारूढ़ भाजपा को राजनीतिक फायदा मिलेगा, लेकिन अब उनका गुट भी सरकार के साथ टकराव की स्थिति में नजर आ रहा है. विधानसभा में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) से जुड़े प्रस्ताव का विरोध करने के बाद दोनों पक्षों के बीच दूरी और बढ़ गई. इतना ही नहीं, ऋतब्रत गुट भी शहीद दिवस के मौके पर अपनी अलग रैली करना चाहता था, लेकिन उसे भी अनुमति नहीं मिली. इससे साफ संकेत मिला कि सरकार किसी भी ऐसे राजनीतिक प्रदर्शन को लेकर सख्त रुख अपना रही है, जो उसके एजेंडे के खिलाफ माना जाए.
हुमायूं कबीर पर कानूनी कार्रवाई तेज
टीएमसी से अलग होकर अपनी पार्टी बनाने वाले विधायक हुमायूं कबीर भी इन दिनों सरकार के निशाने पर हैं. हाल ही में दिए गए उनके विवादित और भड़काऊ बयान के बाद राज्य सरकार ने कड़ा रुख अपनाया. उनके खिलाफ अलग-अलग थानों में गंभीर आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं. मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने विधानसभा में भी स्पष्ट किया कि कानून व्यवस्था से समझौता नहीं किया जाएगा और किसी भी भड़काऊ बयान पर सख्त कार्रवाई होगी. सरकार का कहना है कि राज्य में कानून का शासन सर्वोच्च रहेगा.
बंगाल की राजनीति किस ओर बढ़ रही है?
फिलहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां विपक्ष खुद कई हिस्सों में बंटा हुआ है और सरकार लगातार आक्रामक रणनीति अपनाए हुए है. ममता बनर्जी अपने संगठन को दोबारा मजबूत करने की चुनौती का सामना कर रही हैं, ऋतब्रत बनर्जी अपनी राजनीतिक पहचान स्थापित करने में जुटे हैं, जबकि हुमायूं कबीर कानूनी चुनौतियों से घिरे हुए हैं. आने वाले समय में इन तीनों धड़ों की रणनीति और सरकार के अगले कदम बंगाल की राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे.
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