पंजाब में दल-बदल का खेल शुरू! टिकट कटा तो बदली विचारधारा, UP तक दिखने लगा सियासी असर
Authored By: Rajeev Mandal
Published On: Monday, November 2, 2026
Updated On: Monday, November 2, 2026
पंजाब की राजनीति में आज जो हुआ, वो कोई नई बात नहीं है. AAP की पहली लिस्ट में 40 नाम आए और 3 नाम गायब हो गए-समाना के विधायक चेतन सिंह जौरामाजरा जो भगवंत मान कैबिनेट में मंत्री रह चुके हैं, सनौर के विधायक हरमीत सिंह पठानमाजरा और अमृतसर नॉर्थ के पूर्व IPS विधायक कुंवर विजय प्रताप सिंह. नतीजा -1 नवंबर को इस्तीफा, 2 नवंबर को दिल्ली में BJP मुख्यालय में फूल-माला. बाहर निकल कर नारा - BJP जिंदाबाद.
Authored By: Rajeev Mandal
Updated On: Monday, November 2, 2026
AAP का कहना है हमने इन्हें पहले ही सस्पेंड कर दिया था, ये तो पार्टी विरोधी गतिविधि में थे. इन तीनों का कहना है सरकार ने नशे का वादा पूरा नहीं किया, कर्ज बढ़ा दिया. ये आरोप भी जड़ दिया कि दिल्ली से पंजाब चल रहा है.
ये नया मामला नहीं
पंजाब में 2026 के 10 महीनों में यही तीसरा बड़ा झटका नहीं है. AAP के ही एक बागी विधायक ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि पहली लिस्ट जारी न होती तो 15 से 20 मौजूदा AAP विधायक अमित शाह से मिलने वाले थे. मतलब टिकट बंटते ही दल बदल का बाजार गर्म है. 2022 में AAP 92 सीटें जीत कर आई थी, आज स्थिति ये है कि हर महीने कोई न कोई विधायक – कभी कांग्रेस से AAP में, कभी अकाली से BJP में, कभी AAP से BJP में जा रहा है. 2024 से 2026 के बीच पंजाब में लगभग 18 विधायकों ने पार्टी बदली है. कारण एक ही-टिकट नहीं मिला तो विचारधारा याद आ गई.
यूपी में पुरानी है ये बीमारी
सबसे बड़े प्रदेश उप्र की बात करें तो यहां दल-बदल अब सीजनल बीमारी है. 2026 में अकेले UP में जनवरी से अक्टूबर तक 27 विधायकों/पूर्व विधायकों ने दल बदला है. सपा के 9 बागी BJP में, BJP के 7 नेता सपा और कांग्रेस में, बसपा के 6 नेता साइकिल और कमल के बीच झूल रहे हैं. पंचायत और लोकसभा उपचुनाव से पहले टिकट की दौड़ में तो रोज सुबह एक नेता दूसरे दल में मिलता है.
नैतिकता का तकाजा
कानून है – दसवीं अनुसूची, दल-बदल विरोधी कानून. विधायक अगर खुद पार्टी छोड़ दे तो सदस्यता रद्द होनी चाहिए. पर हकीकत ये है कि स्पीकर का फैसला चुनाव के बाद आता है. AAP अब स्पीकर कुलतार सिंह संधवा के पास जाकर इन दोनों की सदस्यता रद्द करने की मांग करेगी, पर तब तक वो दूसरे दल के टिकट पर प्रचार कर चुके होंगे.
नैतिकता तो 1985 में ही खत्म हो गई थी जब पहली बार कहा गया – पार्टी छोड़ना अपराध है. आज तो फॉर्मूला साफ है – जिस पार्टी में टिकट, उसी की विचारधारा. आज भगवंत मान की नशा-मुक्त पंजाब की बात करने वाला नेता कल BJP के मंच पर राष्ट्रवाद की बात करेगा, और परसों वही कांग्रेस में जाकर लोकतंत्र बचाने लगेगा.
जनता क्यों भूल जाती है
क्योंकि जनता धोखा नहीं भूलती, जनता चेहरा देखती है. गांव में लोग पार्टी नहीं, बंदे को वोट देते हैं. पठानमाजरा सनौर में काम करवाता रहा है तो लोग कहेंगे – चलो पार्टी कोई भी हो, अपना बंदा है. दूसरा, हमारे यहाँ चुनाव में मुद्दा हर 6 महीने में बदल जाता है – आज नशा, कल बेअदबी, परसों MSP. पुराना धोखा नए नारे के नीचे दब जाता है. और सबसे बड़ी बात – मीडिया का मेमोरी स्पैन 48 घंटे का है. आज दल-बदल ब्रेकिंग न्यूज है, परसों फिर नया चेहरा.
जब तक मतदाता उम्मीदवार से नहीं पूछेगा-तुमने पिछली बार किस झंडे पर वोट मांगा था और अब किस पर मांग रहे हो? तब तक ये मंडी चलती रहेगी. टिकट कटेगा, पटका बदलेगा और हम फिर कहेंगे-राजनीति में सब चलता है.
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