Vande Mataram: अब क्यों राजनीति के केंद्र में आया वंदे मातरम? BJP-कांग्रेस टकराव के बीच उठे विवाद की पूरी कहानी
Authored By: Nishant Singh
Published On: Tuesday, December 9, 2025
Updated On: Tuesday, December 9, 2025
Vande Mataram: वंदे मातरम- एक गीत, जिसने आज़ादी की लड़ाई को आवाज दी, आज राजनीति के अखाड़े में फिर सुर्खियों में है. संसद में इसकी 150वीं वर्षगांठ पर शुरू हुई गर्मागर्म बहस ने पुराने विवादों, नए आरोपों और इतिहास के अनगिनत पन्नों को फिर खोल दिया है. आखिर पीएम मोदी और कांग्रेस आमने-सामने क्यों हैं? किन छंदों पर सबसे ज्यादा विवाद हुआ? और यह मुद्दा चुनावी मौसम में कैसे केंद्र बन गया, यही कहानी उजागर करता है यह लेख.
Authored By: Nishant Singh
Updated On: Tuesday, December 9, 2025
Vande Mataram: हाल के दिनों में देश की राजनीति का केंद्र एक बार फिर वही गीत बना है, जिसने आज़ादी के संघर्ष में करोड़ों लोगों के भीतर क्रांति की आग जगाई थी वंदे मातरम. लोकसभा में शुरू हुई विशेष चर्चा ने इस बहस को और तेज कर दिया है कि आखिर यह मुद्दा अचानक संसद तक कैसे पहुंचा? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर क्या आरोप लगाए? विपक्ष ने कैसे जवाब दिया? और वे कौन-सी ऐतिहासिक परतें हैं, जिनके कारण यह गीत बार-बार विवादों में घिर जाता है? यह लेख इन्हीं सवालों की परतें खोलता है.
संसद में क्यों पहुंचा वंदे मातरम का मुद्दा?
2025 में वंदे मातरम की रचना के 150 वर्ष पूरे हुए. बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 1875 में प्रकाशित यह गीत वर्षगांठ के कारण राष्ट्रीय मंचों पर छाया हुआ है. इसी उत्सव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक कार्यक्रम में दावा किया कि 1937 के कांग्रेस अधिवेशन में गीत के कुछ हिस्से हटा दिए गए थे और इसे मुस्लिम लीग के दबाव में “कमज़ोर” किया गया. प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद मामला और राजनीतिक हो गया. सरकार ने निर्णय लिया कि संसद में 150वीं वर्षगांठ पर विशेष चर्चा होगी, जिसका नेतृत्व स्वयं पीएम करेंगे. सरकार का तर्क है कि यह चर्चा राष्ट्रगीत के इतिहास और आज़ादी में उसके योगदान को सम्मान देने के लिए है, लेकिन विपक्ष का आरोप है कि बंगाल चुनाव से पहले इस मुद्दे को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है.
प्रधानमंत्री ने कांग्रेस को कैसे घेरा?
लोकसभा में अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने आरोप लगाया कि 1930 के दशक में मोहम्मद अली जिन्ना की अगुवाई में मुस्लिम लीग के विरोध के चलते कांग्रेस ने वंदे मातरम के कुछ छंद हटा दिए और राष्ट्रीय भावनाओं से समझौता किया. पीएम मोदी ने कहा कि “कांग्रेस ने राष्ट्रगीत को दो हिस्सों में बांट दिया और उसकी आत्मा को कमजोर कर दिया.” उन्होंने कांग्रेस के नेतृत्व, विशेषकर जवाहरलाल नेहरू की भूमिका पर सवाल उठाए और कहा कि इस समझौते ने बंटवारे के बीज बोए.
विपक्ष का पलटवार: गांधी, पटेल, बोस की समिति का सहारा
कांग्रेस ने पीएम के आरोपों को नकारते हुए ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला दिया. पार्टी ने ‘द कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी’ का संदर्भ देते हुए कहा कि 1937 में जो निर्णय हुआ, वह किसी दबाव में नहीं बल्कि कांग्रेस वर्किंग कमेटी की सर्वसम्मति से लिया गया था. इस समिति में गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाष बोस, राजेंद्र प्रसाद, अबुल कलाम आज़ाद जैसे बड़े नेता शामिल थे.
कांग्रेस का कहना है कि वंदे मातरम के शुरुआती दो छंद सर्वाधिक लोकप्रिय थे और बाकी छंदों में धार्मिक रूपांकन था, जिससे कुछ समुदायों में असहजता थी. रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा दी गई सलाह के बाद ही दो छंदों को प्राथमिकता देने का फैसला हुआ था. विपक्ष का दावा है कि सरकार आज के महत्वपूर्ण मुद्दों बेरोजगारी, महंगाई, असमानता से ध्यान भटकाने के लिए इतिहास को तोड़-मरोड़ रही है.
वंदे मातरम का इतिहास: एक उपन्यास से जन्मा राष्ट्रीय स्वर
वंदे मातरम की रचना 1870 के दशक में बंकिमचंद्र चटर्जी ने की थी और 1875 में यह उनके उपन्यास ‘आनंद मठ’ में प्रकाशित हुआ. उपन्यास का केंद्रीय विषय मातृभूमि को देवी के रूप में पूजने वाले संन्यासियों का संघर्ष था. गीत का उद्देश्य मातृभूमि के प्रति समर्पण जगाना था, यह भावना धीरे-धीरे पूरे देश की राजनीति का हिस्सा बन गई. 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने जब इसे गाया, तो यह पहली बार राष्ट्रीय मंच पर पहुंचा.
क्रांति का संदेश: कैसे बना आज़ादी की लड़ाई का प्रतीक?
1905 के बंगाल विभाजन के विरोध में जब हजारों छात्र कलकत्ता की सड़कों पर ‘वंदे मातरम’ के नारे लगाते हुए उतरे, तब इसे राजनीतिक शक्ति मिली. इसके बाद यह गीत केवल एक रचना नहीं, बल्कि आंदोलन का हथियार बन गया. 1905 से 1908 के बीच देशभर में जुलूस, सभाएं, हड़तालें हर जगह वंदे मातरम के नारों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ एकजुटता दिखाई. रंगपुर में छात्रों पर जुर्माना लगाया गया, बारीसाल में सम्मेलन पर रोक लगी, लाहौर में प्रदर्शनकारियों पर लाठियां बरसीं लेकिन नारे नहीं रुके. यही वह दौर था, जब वंदे मातरम राष्ट्रीय प्रतिरोध का पर्याय बन गया.
छंद हटाने पर विवाद: राजनीति की परतें कहां से शुरू हुईं?
1930 के दशक में जब जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग धार्मिक राजनीति को बढ़ावा दे रही थी, तब गीत के अंतिम चार छंदों को हिंदू धार्मिक प्रतीकों से जोड़कर आपत्ति जताई गई. कांग्रेस को डर था कि इससे स्वतंत्रता संघर्ष में मुस्लिमों की भागीदारी कमजोर होगी, इसलिए 1937 में केवल दो छंदों को प्राथमिकता देने का निर्णय लिया गया. इतिहासकार सब्यसाची भट्टाचार्य भी लिखते हैं कि नेहरू की अध्यक्षता वाली समिति ने उन्हीं अंशों को हटाया था जिनमें मूर्ति पूजा के स्पष्ट संदर्भ थे. बाद में संविधान सभा ने भी इसी प्रारूप को स्वीकार किया.
संविधान सभा का निर्णय: राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत का सम्मान
24 जनवरी 1950 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि ‘जन गण मन’ राष्ट्रगान होगा और ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगीत का समान सम्मान दिया जाएगा. इस निर्णय पर संविधान सभा में किसी ने आपत्ति नहीं जताई. यह स्पष्ट किया गया कि दोनों गीतों का सम्मान समान है और वंदे मातरम की ऐतिहासिक भूमिका अमिट है.
निष्कर्ष: इतिहास, राजनीति और भावनाओं के बीच अटका एक गीत
वंदे मातरम सिर्फ एक गीत नहीं रहा; यह स्वतंत्रता संग्राम का स्वर, सांस्कृतिक पहचान का आधार और राजनीतिक बहस का केंद्र रहा है. आज फिर जब इस गीत का नाम संसद में गूंजा, तो इतिहास की वही परतें सामने आने लगीं- कौन सही, कौन गलत, यह विमर्श शायद आगे भी जारी रहेगा. लेकिन इतना ज़रूर है कि वंदे मातरम की गूंज ने एक बार फिर देश की राजनीति को नई दिशा दे दी है.
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