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30 बार तख्तापलट झेलने वाला बांग्लादेश
Authored By: अरुण श्रीवास्तव
Published On: Tuesday, August 6, 2024
Last Updated On: Tuesday, August 6, 2024
वजूद में आने के बाद बांग्लादेश में तख्तापलट की संस्कृति पनपी। आपको यह थोड़ा अजीब लग सकता है कि तख्तापलट की कहानी तो पाकिस्तान के साथ जुड़ी है, लेकिन सच यह भी है कि बांग्लादेश तो इस मामले में पाकिस्तान से भी आगे रहा है। वहां आज तक 30 बार तख्तापलट की साजिश रची जा चुकी है। आइए जानें कुछ प्रमुख तख्तापलट के बारे में...
Authored By: अरुण श्रीवास्तव
Last Updated On: Tuesday, August 6, 2024
बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार गिर चुकी है या यूं कहें कि गिरा दी गई है। वह भी अपने खास के हाथों…। दरअसल शेख हसीना को बांग्लादेश के पीएम का पद छोड़ने के लिए वहां की सेना ने कहा था और उन्हें कुछ घंटे की मोहलत दी थी। यह अल्टीमेटम देने वाली सेना के प्रमुख इस समय ले. जनरल वकार उज जमां हैं और रोचक यह है कि वह शेख हसीना की कजिन के पति हैं। जिन शेख हसीना को पद से हटाने की घोषणा वकार उज जमां ने कही, उन्हीं की सरकार ने 11 जून को उन्हें सेना प्रमुख के पद के लिए चुना था और 24 जून को तीन वर्ष के लिए सेना की कमान सौंपी थी। शेख हसीना को तो इस समय वह मशहूर शेर याद आ रहा होगा-हमें तो गैरों ने लूटा, अपनों में कहां दम था…
खैर हसीना फिलहाल अतीत हैं और वकार व सेना बांग्लादेश का भविष्य, लेकिन यह भविष्य कैसा होगा, इस बारे में आशंकाओं के बादल गहरे हैं जो भारत को भी चिंतित कर रहे हैं। तख्तापलट के बाद ढाका से विमान से भारत के हिंडन एयरपोर्ट पहुंचीं हसीना आगे की रणनीति तय कर रही होंगी और हो सकता है कि जब तक आप यह लेख पढ़ें वह लंदन की उड़ान भी भर चुकी हों, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर आर्थिक तरक्की के पथ पर कुलांचे भर रहे बांग्लादेश को अचानक हुआ क्या? क्यों इस कदर विरोध हुआ कि उन्हें अपनी पीएम की कुर्सी छोड़नी पड़ी। तमाम कारण सामने आएंगे, लेकिन एक कारण तो आंकड़ों के साथ सामने ही है। वह है वजूद में आने के बाद बांग्लादेश में पनपी तख्तापलट की संस्कृति।
आपको यह थोड़ा अजीब लग सकता है कि तख्तापलट की कहानी तो पाकिस्तान के साथ जुड़ी है, लेकिन सच तो यह भी है कि बांग्लादेश तो इस मामले में पाकिस्तान से भी आगे रहा है। बांग्लादेश के इतिहास में झांकें तो 1971 में अस्तित्व में आने के बाद से वहां आज तक यानी 5 अगस्त 2024 तक कुल 30 बार तख्तापलट की साजिश रची जा चुकी है। कुछ कोशिशें कामयाब रही हैं और कुछ नाकाम, लेकिन 53 वर्ष के आजाद देशकाल में वहां तख्तापलट एक आदत सा बना दिखाई देता है। आइए जानें कुछ प्रमुख तख्तापलट के बारे में।
15 अगस्त 1975 को पहली बार बांग्लादेशी सेना के मिडिल लेवल के अधिकारियों ने तख्तापलट की कोशिश की थी। देश में धर्मनिरपेक्ष सरकार चला रहे मुजीबुर्रहमान को परिवार सहित कत्ल कर दिया गया और मुश्ताक अहमद के नेतृत्व में इस्लामिक सरकार बनी। करीब तीन महीने बाद ही नए नवेले देश बांग्लादेश ने दूसरा तख्तापलट भी देख लिया जब तीन नवंबर 1975 को मुश्ताक को भी पीएम पद से हटा दिया गया। इस बार तख्तापलट किया 1971 में बांग्लादेश के स्वाधीनता युद्ध के जांबाज सैन्य अफसर ब्रिगेडियर खालिद मुशर्रफ ने। मुजीब के करीबी रहे मुशर्रफ ने तब के सेना प्रमुख जनरल जियाउर रहमान को मारा नहीं, बल्कि कैद कर लिया। वजह दोनों के बीच की पुरानी दोस्ती बताई जाती है, लेकिन जियाउर रहमान की कैद अधिक दिन नहीं चली और सात नवंबर 1975 को यानी केवल चार दिन बाद ही एक और तख्तापलट में मुशर्रफ मारे गए और जियाउर रहमान को मिली बांग्लादेश की कमान।
जियाउर रहमान की कहानी भी पूरी फिल्मी रही। 1971 के युद्ध से लेकर 30 मई 1981 को मारे जाने तक उन पर 31 जानलेवा हमले हुए। जब वह बांग्लादेश के प्रमुख थे तो 1977 में सितंबर-अक्टूबर में उन्हें सत्ता से हटाने के कई प्रयास हुए। दो अक्टूबर के इसी तरह के असफल प्रयास के बाद बड़ी संख्या में सैन्य अफसरों का कोर्ट मार्शल हुआ और मौत दी गई। जियाउर रहमान लोकप्रिय हो चुके थे और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की सरकार चला रहे थे। 1981 में एक विवाद सुलझाने चटगांव गए और वहीं सर्किट हाउस में उनकी निर्ममता से हत्या कर दी गई। कहा जाता है कि यह सब तब सेना प्रमुख रहे ले. जनरल हुसैन मोहम्मद इरशाद के इशारे पर हुआ। हालांकि इरशाद ने खुद सत्ता नहीं संभाली और वाइस प्रेसीडेंट अब्दुस सत्तार को बांग्लादेश के प्रमुख के रूप में स्वीकार कर लिया, लेकिन तख्तापलट वाला खून तो इस देश की सेना को लग ही चुका था सो 24 मार्च 1982 को ले. जनरल इरशाद ने राष्ट्रपति आवास में घुसकर अब्दुस सत्तार को रक्तहीन तख्तापलट में सत्ता से बेदखल कर खुद को बांग्लादेश का शासक घोषित कर दिया। इसके साथ ही इरशाद ने संविधान भी निलंबित कर दिया।

इसके बाद करीब 14 साल सत्ता अपेक्षाकृत शांति से चलती रही, लेकिन 1996 में ले. जनरल अबु सालेह मो. नासिम ने तख्तापलट की असफल कोशिश की। तब के राष्ट्रपति ने उन्हें कुछ सैन्य अफसरों को बर्खास्त करने को कहा जो उन्होंने नहीं किया। इस पर राष्ट्रपति अब्दुर रहमान विश्वास ने नासिम को बर्खास्त कर सेना को रेडियो स्टेशन आदि पर कब्जा के आदेश दिए। जवाब में नासिम ने अपने विश्वास वाली सैन्य टुकड़ियों को ढाका मार्च का आदेश दिया, लेकिन तभी एक और सैन्य अधिकारी ने नासिम की टुकड़ियों के खिलाफ सैन्य मूवमेंट का एलान कर दिया। कुल मिलाकर यह तख्तापलट असफल रहा।
एक बार फिर लंबे अरसे तक शांति रही। 2007 में 11 जनवरी को सेना प्रमुख ले. जनरल मोईन अहमद ने तख्तापलट की कोशिश की। राष्ट्रपति लाजुद्दीन अहमद की जगह फखरुद्दीन अहमद को अंतरिम सरकार का प्रमुख बनाया गया। 2008 में संसदीय चुनाव के बाद नई सरकार चुनी गई और 300 में से 230 सीट जीतने वाली अवामी लीग की सरकार बनी।
2009 में एक बार फिर सैन्य विद्रोह हुआ। कार्यालयों पर कब्जे हुए, नागरिकों को मारा गया, लेकिन सरकार के साथ बातचीत में विद्रोहियों ने समर्पण कर दिया। 2011 में एक बार फिर तख्तापलट की कोशिश हुई जब कुछ रिटायर्ड सैन्यकर्मियों ने देश में इस्लामिक शासन के लिए प्रयास किया। हालांकि इस बार सेना ने ही उन्हें रोक दिया। तब शेख हसीना ही पीएम थीं और अब 5 अगस्त 2024 को फिर तख्तापलट हुआ है और उन्हें देश छोड़ना पड़ा है।













