Trinetra Ganesh Mandir: त्रिनेत्र गणेशजी से भक्तगण सभी कामना पूर्ण करने की देते हैं अर्जी

Authored By: स्मिता

Published On: Wednesday, September 3, 2025

Last Updated On: Saturday, September 6, 2025

Trinetra Ganesh Mandir रणथंभौर में भक्तगण त्रिनेत्र गणेशजी से कामना पूर्ण करने की अर्जी लगाते हुए.
Trinetra Ganesh Mandir रणथंभौर में भक्तगण त्रिनेत्र गणेशजी से कामना पूर्ण करने की अर्जी लगाते हुए.

Trinetra Ganesh Mandir : राजस्थान के रणथंभौर दुर्ग में अरावली विंध्याचल की पहाड़ियों के बीच विराजमान त्रिनेत्र गणेश मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहां गणेश जी स्वयं प्रकट हुए हैं. पत्नी रिद्धि-सिद्धि और पुत्र शुभ-लाभ के साथ इस मंदिर में विराजमान गणेशजी अपने भक्तों की सभी कामना पूर्ण करते हैं.

Authored By: स्मिता

Last Updated On: Saturday, September 6, 2025

Trinetra Ganesh Mandir: 6 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के अवसर गणेश विसर्जन के साथ ही गणेश चतुर्थी महापर्व समाप्त हो जाएगा. इस 10 दिनी उत्सव के अवसर पर भक्तगण महत्वपूर्ण गणेश मंदिरों की भी यात्रा करते हैं. भक्तगण मानते हैं कि गणेश चतुर्थी उत्सव मनाये जाने के दौरान मंदिर में गणेशजी का दर्शन करने पर सभी मनोकामना पूर्ण होती है. राजस्थान के रणथंभौर दुर्ग में अरावली विंध्याचल की पहाड़ियों के बीच विराजमान त्रिनेत्र गणेश मंदिर (Trinetra Ganesh Mandir) भी भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने वाले मंदिर के रूप में विख्यात है.

स्वयंभू रूप में गणेशजी के प्रकट होने की मान्यता

राजस्थान में अरावली विंध्याचल पहाड़ियों के बीच स्थित है विश्व धरोहर रणथंभौर दुर्ग. इस दुर्ग स्थित त्रिनेत्र गणेश मंदिर में विराजते हैं बुद्धि और विवेक के देवता गणेशजी. गणेशजी अपनी अनूठी मान्यता के लिए प्रसिद्ध हैं. यह एकमात्र मंदिर है, जिसके बारे में मान्यता है कि लगभग एक हजार साल पहले दुर्ग की दीवार से स्वयंभू रूप में स्वयं प्रकट हुए थे त्रिनेत्र गणेश जी. वे यहां अपनी पत्नी ऋद्धि-सिद्धि, पुत्र शुभ-लाभ और वाहन मूषक के साथ विराजमान हैं.

लड्डू और फलों के साथ भक्त देते हैं अपनी अर्जी

भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को यहां प्रतिवर्ष लक्खी मेला लगता है. इस अवसर पर 10 लाख से अधिक श्रद्धालु दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं. विशेषता यह है कि यहां गणेश प्रतिमा का विसर्जन नहीं किया जाता है. भक्तगण लड्डू, दूर्वा, फलों के साथ अर्जी लिखकर भी अपनी मनोकामना पूरी करते हैं. यहां भगवान को विवाह के निमंत्रण और अन्य शुभ पत्र भेजने की भी परंपरा है. इसे पुजारी पढ़कर सुनाते हैं.

मंदिर का इतिहास

मंदिर का इतिहास रामायण-महाभारत काल से जुड़ा है. कथा है कि भगवान राम ने लंका पर चढ़ाई करने से पहले इसी स्वरूप की पूजा की थी. श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह का पहला निमंत्रण भी यहीं आया था. विक्रमादित्य, खिलजी और अकबर तक ने यहां शीश नवाया था. राजा हम्मीर ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था. इस प्रसिद्ध मंदिर का इतिहास 1299 से जुड़ा है, जब रणथंभौर किले के अंदर राजा हम्मीर और अलाउद्दीन खिलजी के बीच युद्ध चल रहा था. राजा हम्मीर भगवान गणेश के परम भक्त थे. युद्ध के दौरान भी भगवान गणेश की पूजा करना नहीं भूलते थे.शिव ने गणपति को दिया अपना तीसरा नेत्र

मूर्ति स्वयंभू है. त्रिनेत्र स्वरूप को ज्ञान का प्रतीक माना जाता है. मान्यता है कि शिव ने गणपति को अपना तीसरा नेत्र प्रदान किया था. सवाई माधोपुर से 14 किलोमीटर दूर 1579 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर 7 किलोमीटर परिक्रमा पथ पर स्थित है. इसे धरती का पहला स्वयंभू गणेश मंदिर माना जाता है. आज भी यह ‘रणथंभौर के लाडले गौरीपुत्र’ के उद्घोष के साथ लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है.

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स्मिता धर्म-अध्यात्म, संस्कृति-साहित्य, और स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर शोधपरक और प्रभावशाली पत्रकारिता में एक विशिष्ट नाम हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में उनका लंबा अनुभव समसामयिक और जटिल विषयों को सरल और नए दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत करने में उनकी दक्षता को उजागर करता है। धर्म और आध्यात्मिकता के साथ-साथ भारतीय संस्कृति और साहित्य के विविध पहलुओं को समझने और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने में उन्होंने विशेषज्ञता हासिल की है। स्वास्थ्य, जीवनशैली, और समाज से जुड़े मुद्दों पर उनके लेख सटीक और उपयोगी जानकारी प्रदान करते हैं। उनकी लेखनी गहराई से शोध पर आधारित होती है और पाठकों से सहजता से जुड़ने का अनोखा कौशल रखती है।
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