ओलंपिक में भारत के बढ़ते कदमः अटलांटा से पेरिस तक

Authored By: अनुराग श्रीवास्तव

Published On: Tuesday, August 13, 2024

Last Updated On: Tuesday, August 13, 2024

performance of india in olympics
performance of india in olympics

पेरिस ओलंपिक (Paris Olympics) का समापन हो गया है। भारत में ओलंपिक दल के प्रदर्शन को लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया है। पदक विजेताओं को सराहा तो जा रहा है, लेकिन एक भी स्वर्ण पदक न मिलने और टोक्यो की टैली को बेहतर न पाने की कसक भी दिख रही है। सोशल मीडिया मंच इस तरह की प्रतिक्रियाओं से भरे पड़े हैं। तो आखिर क्या माना जाए? क्या भारत अब भी वहीं है या बदलते समय के साथ हम ओलंपिक जैसे वैश्विक और प्रतिष्ठित आयोजनों में बेहतर हो रहे हैं? सवाल कई हैं, लेकिन जवाब एक ही है-हम निश्चित ही बेहतर हो रहे हैं। अब आप पूछेंगे कैसे? मेडल तो पिछली बार कम आए हैं। एक भी सोने का पदक तक नहीं मिला, फिर भला यह बात कैसे गले के नीचे उतरे कि हम बेहतर हो रहे हैं? 1996 अटलांटा से व्यक्तिगत पदक जीतने का सिलसिला पेरिस तक जारी है। यही सबसे बड़ा बदलाव है। कैसे?...आइए समझते हैं...

Authored By: अनुराग श्रीवास्तव

Last Updated On: Tuesday, August 13, 2024

याद कीजिए 1960 का रोम ओलंपिक…याद कीजिए 1984 का लास एंजिल्स ओलंपिक (Angeles Olympics)। तब हमें कोई पदक नहीं मिले, लेकिन दो नेशनल स्टार मिले। उड़नसिख मिल्खा सिंह जी (Flying Sikh Milkha Singh) और उड़नपरी पीटी ऊषा जी (Flying Fairy PT Usha Ji)। मिल्खा सिंह जी 400 मीटर स्पर्धा में सेकेंड के दसवें हिस्से से ओलंपिक कांस्य पदक से दूर रह गए थे, लेकिन रोम से स्टार बनकर लौटे और साथ ही देश के लाखों खिलाड़ियों और अभिभावकों के लिए प्रेरणापुंज भी। इसके 24 साल बाद पीटी ऊषा जी ने भी यही इतिहास दोहराया। लास एंजिल्स ओलंपिक में 400 मीटर हर्डल्स स्पर्धा में सेकेंड के सौवें हिस्से से कांस्य पदक से दूर रह गई थीं। ये दो ‘नियर मिस’ तब के भारत में किसी ओलंपिक पदक से कम नहीं थे। 1952 में हेलसिंकी ओलंपिक में कुश्ती में कसाबा जाधव जी के कांस्य पदक जीतने के बाद से हम 1996 के अटलांटा ओलंपिक में लिएंडर पेस के टेनिस में कांस्य पदक पाने तक भारत व्यक्तिगत स्पधार्ओं में ओलंपिक में पदक विहीन ही रहा था। आप समझ सकते हैं कि इस बीच में दो ‘नियर मिस’ का क्या अहमियत रही होगी…भावनाओं को मजबूत रखने और संकल्प दृढ़ रखने को मिल्खा सिंह जी और पीटी ऊषा जी के प्रयास प्रेरक रहे। यहीं से खेल में थोड़ी सुधार की आस जागी जो सही साबित हुई।

1996 में पेस के बाद 2000 में कर्णम मल्लेश्वरी और 2004 में राज्यवर्धन राठौर के एक-एक पदक से भारत ओलंपिक से खाली हाथ नहीं लौटा। 2008 में अभिनव बिंद्रा भारत का पहला सोना बीजिंग ओलंपिक से लेकर आए, लेकिन साथ ही सुखद यह कि भारत ने तीन मेडल जीते। विजेंदर सिंह ने बाक्सिंग और सुशील कुमार ने कुश्ती में कांस्य पदक पाया। इसके बाद से तो हम बढ़ते ही रहे और टोक्यो में एक स्वर्ण सहित कुल सात पदक के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन तक पहुंचे। पेरिस में पदकों की दहाई संख्या तक पहुंचने की पूरी आस थी, लेकिन हम छह पदकों पर ही रह गए। यह आत्मचिंतन की बात तो है, लेकिन निराश होने की कतई नहीं। पेरिस में भारत के छह खिलाड़ी विभिन्न स्पर्धाओं में नजदीकी चौथे स्थान पर रहे यानी कांस्य पदक से बस थोड़ी दूर। यह बहुत बड़ी बात है।

पेरिस में विनेश फोगाट (Vinesh Phogat) की तो बात ही अलग रही। वह एक पदक पक्का कर ले गई थीं जिसके स्वर्ण होने की पूरी संभावना थी, लेकिन 100 ग्राम वजन अधिक होने से सपना टूट गया। भालाफेंक में रजत पदक जीतकर इतिहास रचने वाले नीरज चोपड़ा (Neeraj Chopra) से भी निराश होने की जरूरत नहीं है। पाकिस्तान के अरशद नदीम ने स्वर्ण पाया, लेकिन नीरज ने चोट के बावजूद सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया और लगातार दूसरे ओलंपिक में पदक जीता। दो ओलंपिक में स्वर्ण और रजत की जोड़ी जीतने वाले भारतीय खेल इतिहास के पहले खिलाड़ी हैं। भारत में खेल अब अपरिचित और संशय से देखा जाने वाला क्षेत्र नहीं है। यह शानदार संभावनाओं वाला क्षेत्र बन चुका है। अभिभावक अब बच्चों को खिलाड़ी बनाना चाहते हैं, किशोर खेल को एक आप्शन के तौर पर चुन रहे हैं। अभी ओलंपिक में हमारे खाते में कुल 10 स्वर्ण, 10 रजत और 21 कांस्य हैं, लेकिन यह संख्या बढ़ेगी और बेहतर बनेगी। सरकार भी खूब ध्यान दे रही है। कई योजनाएं चल रही हैं। विदेश में प्रशिक्षण और विदेशी कोच सामान्य बात है। अटलांटा से जो सफर शुरू हुआ था, वह पेरिस तक बदस्तूर जारी है और यकीन मानिए बढ़ता ही रहेगा…

अनुराग श्रीवास्तव ने विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों को कवर करते हुए अपने करियर में उल्लेखनीय योगदान दिया है। क्रिकेट, फुटबॉल, हॉकी, और अन्य खेलों पर उनके लेख और रिपोर्ट्स न केवल तथ्यपूर्ण होती हैं, बल्कि पाठकों को खेल की दुनिया में गहराई तक ले जाती हैं। उनकी विश्लेषणात्मक क्षमता और घटनाओं को रोचक अंदाज में प्रस्तुत करने का कौशल उन्हें खेल पत्रकारिता के क्षेत्र में विशिष्ट बनाता है। उनकी लेखनी खेलप्रेमियों को सूचनात्मक और प्रेरक अनुभव प्रदान करती है।
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