States News
यूपी की सत्ता का जातीय खेल: 75 साल में किसका राज, कौन बना किंगमेकर और कौन आज भी सत्ता से दूर? जानिए किस जाति के कितने CM
Authored By: Nishant Singh
Published On: Tuesday, December 30, 2025
Last Updated On: Tuesday, December 30, 2025
उत्तर प्रदेश की राजनीति सिर्फ सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं, बल्कि जातियों, वर्चस्व और सियासी उतार-चढ़ाव का लंबा इतिहास है. कभी कोई समाज सत्ता के केंद्र में रहा, तो कभी किसी को हाशिए पर जाना पड़ा. मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने वालों के पीछे छुपे ये सामाजिक समीकरण आज भी सियासत की दिशा तय करते हैं. इस बदलते सत्ता-सफर की असली कहानी जानें…..
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Tuesday, December 30, 2025
UP Caste Politics: उत्तर प्रदेश की राजनीति सिर्फ सरकारें बदलने की कहानी नहीं है, बल्कि यह जातियों, सामाजिक समीकरणों और सत्ता के संतुलन की भी गाथा है. आजादी के बाद से अब तक यूपी ने कई राजनीतिक दौर देखे हैं- कभी कांग्रेस का दबदबा, कभी मंडल की आंधी, तो कभी हिंदुत्व की राजनीति. इन तमाम बदलावों के बीच मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कौन बैठा, किस जाति से आया और कितने समय तक शासन किया, यह सवाल आज फिर से चर्चा के केंद्र में है. खासकर तब, जब ब्राह्मण समाज पिछले तीन दशकों से सत्ता के शिखर से दूर है और अपनी राजनीतिक भूमिका को लेकर बेचैन नजर आ रहा है.
75 साल, 21 मुख्यमंत्री और सत्ता का गणित
अगर आजादी के बाद से यूपी की सियासत पर नजर डालें, तो अब तक प्रदेश को कुल 21 मुख्यमंत्री मिल चुके हैं. इन मुख्यमंत्रियों की जातीय पृष्ठभूमि देखें, तो साफ हो जाता है कि सत्ता कुछ खास सामाजिक समूहों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है. सबसे ज्यादा मुख्यमंत्री ब्राह्मण समाज से बने हैं, उसके बाद ठाकुर, फिर यादव और वैश्य समाज का नंबर आता है. इसके अलावा कुछ जातियां ऐसी भी रहीं, जिन्हें सत्ता का स्वाद सिर्फ एक बार ही मिला.
ब्राह्मण काल: जब सत्ता का केंद्र यही समाज था
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक लंबा दौर ऐसा रहा, जिसे अक्सर “ब्राह्मण काल” कहा जाता है. यह समय आजादी के बाद से लेकर 1989 तक फैला हुआ था. इस दौरान ब्राह्मण समाज के छह नेता मुख्यमंत्री बने और करीब 23 वर्षों तक प्रदेश की सत्ता उन्हीं के हाथों में रही. गोविंद वल्लभ पंत से लेकर नारायण दत्त तिवारी तक, कांग्रेस के दिग्गज ब्राह्मण नेताओं ने यूपी की राजनीति की दिशा तय की.
गोविंद वल्लभ पंत से शुरुआत
ब्राह्मण नेतृत्व की नींव गोविंद वल्लभ पंत ने रखी. वह न सिर्फ यूपी के पहले प्रभावशाली मुख्यमंत्रियों में गिने जाते हैं, बल्कि उन्होंने प्रशासनिक मजबूती और राजनीतिक स्थिरता की मिसाल भी पेश की. दो बार मुख्यमंत्री रहने वाले पंत ने यूपी को शुरुआती वर्षों में दिशा देने का काम किया. उनके बाद यह साफ हो गया था कि कांग्रेस और ब्राह्मण नेतृत्व यूपी की राजनीति में साथ-साथ चलेंगे.
महिला नेतृत्व और ब्राह्मण समाज
ब्राह्मण काल की एक खास बात यह भी रही कि देश की पहली महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी भी इसी समाज से आईं. उन्होंने यह साबित किया कि यूपी की राजनीति में ब्राह्मण नेतृत्व सिर्फ संख्या में नहीं, बल्कि विविधता में भी आगे था. इसके बाद कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा और श्रीपति मिश्र जैसे नेताओं ने सत्ता संभाली और कांग्रेस की पकड़ को मजबूत बनाए रखा.
नारायण दत्त तिवारी: ब्राह्मण राजनीति का आखिरी बड़ा चेहरा
नारायण दत्त तिवारी को ब्राह्मण राजनीति का आखिरी बड़ा स्तंभ माना जाता है. वह तीन बार यूपी के मुख्यमंत्री बने और लंबे समय तक सत्ता में रहे. उनके कार्यकाल के बाद यूपी की राजनीति ने करवट बदली और ब्राह्मण समाज धीरे-धीरे सत्ता के केंद्र से बाहर होता चला गया. 1989 के बाद ऐसा कोई मौका नहीं आया, जब ब्राह्मण समाज का कोई नेता मुख्यमंत्री बन सका.
ठाकुर समाज का उभार
ब्राह्मण काल के बाद यूपी की राजनीति में ठाकुर समाज का असर बढ़ता गया. अब तक पांच मुख्यमंत्री इस समाज से बन चुके हैं. त्रिभुवन नारायण सिंह और विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे नेता कांग्रेस से मुख्यमंत्री बने, जबकि वीर बहादुर सिंह ने भी सत्ता संभाली. बाद के वर्षों में बीजेपी के उदय के साथ राजनाथ सिंह और योगी आदित्यनाथ ने ठाकुर नेतृत्व को नई पहचान दी.
योगी आदित्यनाथ और मौजूदा दौर
योगी आदित्यनाथ का मुख्यमंत्री बनना यूपी की राजनीति में एक बड़ा मोड़ माना जाता है. वह न सिर्फ दो बार मुख्यमंत्री बने, बल्कि उन्होंने लंबे समय तक सत्ता में टिककर यह दिखाया कि ठाकुर समाज अब सिर्फ विकल्प नहीं, बल्कि केंद्र में है. कुल मिलाकर करीब 17 वर्षों तक ठाकुर समाज के मुख्यमंत्री यूपी की सत्ता पर काबिज रहे हैं.
यादव राजनीति और मंडल का असर
मंडल आयोग की सिफारिशों के बाद यूपी की राजनीति पूरी तरह बदल गई. इसी दौर में यादव समाज सत्ता के केंद्र में आया. राम नरेश यादव जनता पार्टी की सरकार में मुख्यमंत्री बने और उन्होंने ओबीसी राजनीति की नींव रखी. इसके बाद मुलायम सिंह यादव और फिर अखिलेश यादव ने समाजवादी राजनीति को मजबूत किया.
यादव समाज का 13 साल का शासन
यूपी में यादव समाज के मुख्यमंत्री कुल मिलाकर लगभग 13 वर्षों तक सत्ता में रहे. मुलायम सिंह यादव का दौर खास तौर पर पिछड़े वर्गों की राजनीति को स्थापित करने वाला माना जाता है. वहीं अखिलेश यादव ने युवा नेतृत्व और विकास की बात करके अपनी अलग पहचान बनाई. यादव राजनीति ने ब्राह्मण वर्चस्व को सीधी चुनौती दी.
वैश्य समाज की भूमिका
वैश्य समाज से भी यूपी को तीन मुख्यमंत्री मिले. चंद्रभान गुप्ता, बाबू बनारसी दास और राम प्रकाश गुप्ता ने अलग-अलग दौर में सत्ता संभाली. चंद्रभान गुप्ता दो बार मुख्यमंत्री बने और प्रशासनिक अनुभव के लिए जाने गए. राम प्रकाश गुप्ता बीजेपी सरकार में मुख्यमंत्री बने, जिससे यह साफ हुआ कि वैश्य समाज भी सत्ता की राजनीति में अपनी जगह रखता है.
एक-एक बार सत्ता तक पहुंचने वाली जातियां
यूपी की राजनीति में कुछ समाज ऐसे भी रहे, जिन्हें मुख्यमंत्री पद तक पहुंचने का मौका सिर्फ एक बार मिला. कायस्थ समाज से डॉ. सम्पूर्णानंद दो बार मुख्यमंत्री जरूर बने, लेकिन वह अकेले प्रतिनिधि थे. जाट समाज से चौधरी चरण सिंह दो बार मुख्यमंत्री बने और किसान राजनीति को मजबूती दी.
दलित राजनीति और मायावती का दौर
दलित समाज से यूपी की राजनीति में सिर्फ एक ही चेहरा मुख्यमंत्री बन सका और वो है. मायावती. लेकिन उनका राजनीतिक कद इतना बड़ा रहा कि उन्होंने चार बार मुख्यमंत्री पद संभाला. करीब पौने सात साल के शासनकाल में मायावती ने दलित राजनीति को नई पहचान दी और सत्ता में भागीदारी का सवाल मजबूती से उठाया.
लोध समाज और कल्याण सिंह
लोध समाज से कल्याण सिंह दो बार मुख्यमंत्री बने. उनका नाम राम मंदिर आंदोलन और बीजेपी के उभार से जुड़ा रहा. उन्होंने यह साबित किया कि यूपी की राजनीति में गैर-परंपरागत जातियां भी सत्ता के शीर्ष तक पहुंच सकती हैं.
32 साल का ब्राह्मण वनवास
1989 के बाद यूपी की राजनीति में जो सबसे बड़ा बदलाव आया, वह था ब्राह्मण समाज का सत्ता से बाहर होना. मंडल की राजनीति ने ओबीसी और पिछड़े वर्गों को केंद्र में ला दिया. कांग्रेस कमजोर पड़ी और नई पार्टियों ने जातीय समीकरणों को अपने पक्ष में मोड़ा. नतीजा यह हुआ कि पिछले 32 वर्षों में यूपी को कोई ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं मिला.
वोटबैंक बनकर रह गया ब्राह्मण समाज?
आज की राजनीति में ब्राह्मण समाज को अक्सर सिर्फ एक प्रभावशाली वोटबैंक के रूप में देखा जाता है. बीजेपी से लेकर सपा और बसपा तक, सभी दल चुनाव के समय ब्राह्मण समाज को साधने की कोशिश करते हैं, लेकिन सत्ता की कमान सौंपने से बचते नजर आते हैं. यही वजह है कि हाल के दिनों में ब्राह्मण विधायकों की बैठकों और बयानों ने सियासी हलचल बढ़ा दी है.
आने वाले समय में क्या बदलेगा समीकरण?
यूपी की राजनीति हमेशा बदलते समीकरणों की कहानी रही है. जातीय संतुलन, सामाजिक दबाव और चुनावी गणित तीनों मिलकर तय करते हैं कि अगला मुख्यमंत्री कौन होगा. सवाल यही है कि क्या आने वाले वर्षों में ब्राह्मण समाज का वनवास खत्म होगा, या सत्ता की राजनीति नए सामाजिक समीकरणों के साथ आगे बढ़ती रहेगी.
यह भी पढ़ें :- New Year 2026 Party के लिए दिल्ली की इन 5 जगहों को करें एक्सप्लोर, DJ, क्लब और ग्रैंड सेलिब्रेशन का परफेक्ट प्लान















