बांकीपुर से बंटी बाहर, दतिया में नरोत्तम आउट, जानिए क्यों हॉट बनीं ये दो सीटें
Authored By: Nishant Singh
Published On: Wednesday, July 15, 2026
Updated On: Wednesday, July 15, 2026
Bankipur-Datia: बांकीपुर और दतिया उपचुनाव साधारण चुनाव नहीं, बल्कि भाजपा की प्रतिष्ठा की बड़ी परीक्षा बन गए हैं. बांकीपुर में उम्मीदवार बदलने और दतिया में नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने से सियासी समीकरण बदल गए हैं. विपक्ष इसे मुद्दा बना रहा है, जबकि भाजपा दोनों सीटों पर संगठन और साख बचाने की चुनौती से जूझ रही है.
Authored By: Nishant Singh
Updated On: Wednesday, July 15, 2026
Bankipur-Datia: बिहार की बांकीपुर और मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव अचानक राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बन गए हैं. आमतौर पर उपचुनाव स्थानीय मुद्दों तक सीमित रहते हैं, लेकिन इस बार उम्मीदवारों में अंतिम समय पर हुए बदलाव, भाजपा के भीतर की हलचल और विपक्ष की आक्रामक रणनीति ने इन दोनों सीटों को सबसे चर्चित बना दिया है. एक तरफ बांकीपुर में भाजपा को अपना घोषित उम्मीदवार बदलना पड़ा, तो दूसरी ओर दतिया में पार्टी के बड़े चेहरे नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने से सियासी हलचल तेज हो गई. ऐसे में दोनों सीटों पर मुकाबला केवल जीत-हार का नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिष्ठा का भी बन गया है.
बांकीपुर क्यों बन गई सबसे हॉट सीट?
बांकीपुर विधानसभा सीट लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ रही है. इस सीट से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन लगातार विधायक रहे हैं और उनके राज्यसभा जाने के बाद यहां उपचुनाव की नौबत आई. इसलिए यह चुनाव पार्टी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है. इस बार मुकाबला और भी दिलचस्प इसलिए हो गया क्योंकि जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर पहली बार खुद चुनाव मैदान में उतरे हैं. वहीं राष्ट्रीय जनता दल ने भी पूरी ताकत झोंक दी है. ऐसे में भाजपा के सामने अपनी पारंपरिक सीट बचाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है.
अभिषेक बंटी ने क्यों वापस लिया नाम?
भाजपा ने पहले भारतीय जनता युवा मोर्चा के नेता अभिषेक कुमार सिन्हा उर्फ बंटी को उम्मीदवार बनाया था. उन्होंने नामांकन भी दाखिल कर दिया, लेकिन अगले ही दिन अचानक अपना नाम वापस ले लिया. आधिकारिक तौर पर उन्होंने पारिवारिक कारणों का हवाला दिया और कहा कि वे चुनाव नहीं लड़ पाएंगे.
हालांकि राजनीतिक गलियारों में इसकी अलग चर्चा रही. अभिषेक बंटी के माता-पिता का नाम बहुचर्चित चारा घोटाले से जुड़े मामलों में सामने आ चुका था. माना गया कि विपक्ष इस मुद्दे को चुनाव प्रचार में बड़ा हथियार बना सकता था. भाजपा, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी छवि को प्रमुखता से पेश करती रही है, किसी भी विवाद से बचना चाहती थी. इसी कारण पार्टी ने समय रहते रणनीति बदलते हुए अभिषेक बंटी का नाम वापस कराया और उनकी जगह युवा नेता नीरज कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बना दिया. इस फैसले को भाजपा का डैमेज कंट्रोल माना जा रहा है.
नीरज कुमार सिन्हा पर क्यों लगाया दांव?
अभिषेक बंटी के हटने के बाद भाजपा ने संगठन से जुड़े युवा कार्यकर्ता नीरज कुमार सिन्हा को टिकट दिया. वे लंबे समय से पार्टी में सक्रिय रहे हैं और बूथ स्तर से लेकर युवा मोर्चा तक कई जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. भाजपा ने इस फैसले के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की कि संगठन में वर्षों तक काम करने वाले कार्यकर्ताओं को भी बड़ा अवसर दिया जाएगा. हालांकि अब उनके सामने प्रशांत किशोर और राजद की चुनौती के बीच भाजपा का गढ़ बचाने की जिम्मेदारी होगी.
दतिया में नरोत्तम मिश्रा को क्यों लगा बड़ा झटका?
मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर भाजपा का फैसला और भी ज्यादा चर्चा में रहा. पार्टी ने पूर्व गृह मंत्री और दिग्गज नेता नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बना दिया. यह फैसला सामने आते ही मिश्रा समर्थकों में नाराजगी फैल गई. कई जगह विरोध प्रदर्शन हुए, सड़कें जाम की गईं और कुछ स्थानीय पदाधिकारियों ने इस्तीफा तक दे दिया.
नरोत्तम मिश्रा लंबे समय से दतिया की राजनीति का प्रमुख चेहरा रहे हैं. 2023 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद माना जा रहा था कि उपचुनाव उनके लिए वापसी का मौका बनेगा, लेकिन पार्टी ने नया चेहरा उतारकर साफ संकेत दिया कि अब वह नेतृत्व में बदलाव और नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है.
आशुतोष तिवारी पर क्यों जताया भरोसा?
भाजपा ने दतिया से आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया है, जिन्हें संगठन का मजबूत और जमीनी नेता माना जाता है. वे लंबे समय से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा संगठन से जुड़े रहे हैं तथा मध्य प्रदेश हाउसिंग बोर्ड के अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं. पार्टी को उम्मीद है कि उनकी साफ छवि और संगठनात्मक अनुभव दतिया में भाजपा को फायदा पहुंचाएंगे. हालांकि नरोत्तम मिश्रा समर्थकों की नाराजगी को शांत करना पार्टी के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है.
भाजपा के सामने दोहरी परीक्षा
बांकीपुर और दतिया दोनों सीटों पर भाजपा की चुनौती केवल विपक्ष से नहीं, बल्कि अपने संगठन को एकजुट रखने की भी है. बांकीपुर में उम्मीदवार बदलने का फैसला और दतिया में टिकट कटने से उपजा असंतोष यह दिखाता है कि उम्मीदवार चयन इस बार सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है. दूसरी ओर विपक्ष इन फैसलों को भाजपा की अंदरूनी कमजोरी बताकर चुनावी लाभ लेने की कोशिश कर रहा है.
प्रतिष्ठा से जुड़ी लड़ाई
इन दोनों उपचुनावों का असर सिर्फ दो विधानसभा सीटों तक सीमित नहीं रहेगा. बांकीपुर में भाजपा की जीत या हार को राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के नेतृत्व से जोड़कर देखा जाएगा, जबकि दतिया का परिणाम यह तय करेगा कि नए नेतृत्व पर पार्टी का दांव कितना सफल रहा. यही वजह है कि दोनों सीटें इस समय देश की सबसे चर्चित और हाई-प्रोफाइल चुनावी लड़ाइयों में शामिल हो चुकी हैं.
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