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Yamuna Expressway Bus Fire: यमुना एक्सप्रेसवे पर स्लीपर बस में आग, 9 मौतों के बाद सुरक्षा पर बड़ा सवाल
Authored By: Galgotias Times Bureau
Published On: Thursday, September 24, 2026
Last Updated On: Thursday, September 24, 2026
ग्रेटर नोएडा में यमुना एक्सप्रेसवे पर स्लीपर बस में लगी आग ने नौ लोगों की जान ले ली. लेकिन यह कोई पहली घटना नहीं है. पिछले कुछ सालों में उत्तर प्रदेश में सड़कों पर दौड़ती स्लीपर और डबल डेकर बसें कई बार मौत का सफर बन चुकी हैं. आखिर बार बार यही हादसे क्यों होते हैं, सुरक्षा जांच कहां चूक जाती है और इसके पीछे असली जिम्मेदार कौन है, आइए पूरी पड़ताल करते हैं.
Authored By: Galgotias Times Bureau
Last Updated On: Thursday, September 24, 2026
Yamuna Expressway Bus Fire: बुधवार देर रात यमुना एक्सप्रेसवे(Yamuna Expressway) पर दिल्ली से महोबा जा रही एक स्लीपर बस में अचानक आग लग गई, जिसमें नौ यात्रियों की जान चली गई और कई लोग बुरी तरह झुलस गए. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मृतकों के परिजनों को दो दो लाख रुपये और घायलों को पचास पचास हजार रुपये की मदद का ऐलान किया है. लेकिन सिर्फ मुआवजे से यह सवाल खत्म नहीं होता कि आखिर स्लीपर बसें बार बार आग का शिकार क्यों बन रही हैं. यह घटना कोई अकेला हादसा नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश की सड़कों पर पिछले कुछ सालों से लगातार दोहराई जा रही एक खतरनाक कहानी का हिस्सा है.
स्लीपर बसों में आग लगने के पीछे की असली वजहें
विशेषज्ञों और पुराने हादसों की जांच रिपोर्ट के मुताबिक स्लीपर बसों(Sleeper Bus) में आग लगने के पीछे कई तकनीकी और प्रशासनिक खामियां सामने आती रही हैं. सबसे पहली वजह यह है कि निजी ट्रैवल कंपनियां अक्सर सामान्य सीटर बसों को गैरकानूनी तरीके से स्लीपर बस में बदल देती हैं, जिसमें मूल डिजाइन के हिसाब से जरूरी सुरक्षा मानक पूरे नहीं होते.
दूसरी बड़ी वजह डीजल टैंक की स्थिति है, जो कई पुरानी बसों में नीचे की तरफ लगा होता है और टक्कर लगने पर आसानी से आग पकड़ लेता है. तीसरी वजह बिजली की वायरिंग में शॉर्ट सर्किट है, जो खासकर एसी और चार्जिंग पॉइंट वाली बसों में आम समस्या रही है. इसके अलावा कई बार यात्रियों का सामान या प्रतिबंधित सामग्री जैसे आतिशबाजी अवैध तरीके से बस में ले जाई जाती है, जो हादसे को और भयावह बना देती है, जैसा कि मौजूदा घटना में भी आशंका जताई जा रही है.
डबल डेकर और स्लीपर बसों में इमरजेंसी गेट की कमी
पिछले कुछ बड़े हादसों की जांच में एक बेहद गंभीर बात सामने आई थी कि कई निजी डबल डेकर बसों में इमरजेंसी गेट होता ही नहीं है. आग लगने की स्थिति में यात्रियों के पास खिड़कियों के अलावा बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं बचता, जबकि सामान्य रोडवेज बसों में यह सुविधा मौजूद होती है. यही वजह है कि निजी बसों में हादसों के दौरान मौतों की संख्या कहीं ज्यादा देखी गई है.
सुरक्षा जांच किस तरह होती है और कहां होती है चूक
नियमों के मुताबिक हर व्यावसायिक बस को साल में एक बार फिटनेस प्रमाण पत्र लेना अनिवार्य होता है, जो संबंधित क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय यानी आरटीओ से जारी होता है. इस जांच में बस की ब्रेक, टायर, वायरिंग, अग्निशमन यंत्र और इमरजेंसी गेट जैसी चीजें भौतिक रूप से जांची जानी चाहिए. लेकिन पुराने मामलों में यह बात सामने आ चुकी है कि कुछ अधिकारी बिना बस का भौतिक निरीक्षण किए ही फिटनेस प्रमाण पत्र जारी कर देते हैं. लखनऊ में हुए एक ऐसे ही हादसे के बाद जांच में यह साबित हुआ था कि संबंधित निरीक्षक ने बिना जांचे परमिट दे दिया था, जिसके बाद उन्हें निलंबित किया गया था.
आखिर जिम्मेदार कौन होता है
ऐसे हादसों में जिम्मेदारी कई स्तर पर बंटी होती है. सबसे पहले बस मालिक और ट्रैवल एजेंसी की जिम्मेदारी होती है कि वे बस को तय मानकों के अनुसार ही चलाएं और उसमें अवैध बदलाव न करें. इसके बाद परिवहन विभाग और आरटीओ की जिम्मेदारी बनती है कि वे फिटनेस जांच को केवल कागजी प्रक्रिया न बनाकर वास्तव में बस का निरीक्षण करें. चालक और परिचालक की भी जिम्मेदारी होती है कि वे यात्रा के दौरान किसी भी असामान्य गंध या धुएं पर तुरंत ध्यान दें. जब इन तीनों स्तर पर लापरवाही होती है, तभी इस तरह के हादसे बड़ा रूप ले लेते हैं.
उत्तर प्रदेश में अब तक हो चुके ऐसे कई हादसे
उत्तर प्रदेश (UP) में यमुना एक्सप्रेसवे (Yamuna Expressway Accident) और आगरा लखनऊ एक्सप्रेसवे इस तरह के हादसों के लिहाज से सबसे संवेदनशील माने जाते हैं. दिसंबर दो हजार पच्चीस में मथुरा के पास यमुना एक्सप्रेसवे पर घने कोहरे के कारण कई वाहन आपस में टकरा गए थे, जिसमें छह बसों और कुछ कारों में भीषण आग लग गई थी और करीब उन्नीस लोग जिंदा जल गए थे.
जांच में सामने आया था कि हादसे का शिकार हुई निजी डबल डेकर बसों (Sleeper Bus Fire) में इमरजेंसी गेट ही नहीं था. इससे पहले मई दो हजार पच्चीस में लखनऊ के किसान पथ पर एक बस में आग लगने से पांच यात्रियों की मौत हो गई थी, जिसमें जांच के बाद पता चला कि बस को बिना भौतिक जांच के ही फिटनेस प्रमाण पत्र दे दिया गया था. वहीं अक्टूबर दो हजार पच्चीस में आगरा लखनऊ एक्सप्रेसवे पर चलती बस में आग लगी थी, जिसमें चालक की सूझबूझ से चालीस यात्रियों की जान बच गई थी. इसके अलावा भी यमुना एक्सप्रेसवे पर कोहरे और तेज रफ्तार वाहनों की टक्कर से जुड़े कई हादसे समय समय पर होते रहे हैं.
निष्कर्ष
इन तमाम घटनाओं को देखकर यह साफ है कि स्लीपर बसों में लगने वाली आग कोई अचानक होने वाली दुर्घटना नहीं, बल्कि बरसों से चली आ रही लापरवाहियों का नतीजा है. जब तक फिटनेस जांच को सख्ती से लागू नहीं किया जाता, अवैध रूप से बदली गई बसों पर रोक नहीं लगती और हर बस में इमरजेंसी गेट अनिवार्य नहीं किया जाता, तब तक इस तरह के हादसे दोहराए जाने का खतरा बना रहेगा.
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