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सियासत की ‘माया’ : क्या मायावती नए सिरे से प्राण फूंक सकेंगी बसपा में!
Authored By: अरुण श्रीवास्तव
Published On: Thursday, August 29, 2024
Last Updated On: Thursday, August 29, 2024
मायावती ने एक बार फिर बसपा की कमान संभाल कर हुंकार भर दी है। ऐसे में नई ऊर्जा से लैस मायावती के अगले पैंतरे का इंतजार सियासी गलियारों में रहेगा। अब देखना होगा कि क्या वह बसपा को पुनर्जीवन देकर उप्र की राजनीति को नया रूप दे पाएंगी...
Authored By: अरुण श्रीवास्तव
Last Updated On: Thursday, August 29, 2024
- पार्टी ने लंबे समय बाद साफ कर दिया है कि वह विधानसभा उपचुनाव में सभी दस सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारेगी।
- मायावती जानती हैं कि उनका कैडर जब तक फिर से सक्रिय नहीं होगा, बसपा का रिवाइवल बेहद मुश्किल होगा।
देश की सियासत में उत्तर प्रदेश की बेहद अहम पोजीशन है। उसे देश को पीएम देने वाला प्रदेश माना जाता है। पहले पीएम से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक यह सूची लंबी है, किंतु अब तस्वीर बदली है। फिर भी उत्तर प्रदेश की सियासी अहमियत को कम करने नहीं आंका जा सकता है। हाल का लोकसभा चुनाव ही ले लीजिए। इसी प्रदेश के परिणाम ने पूरे देश की राजनीति को प्रभावित किया है। केंद्र में राजग की गठबंधन सरकार है। खैर हमारी बात लोकसभा चुनाव पर नहीं है, बल्कि प्रदेश की राजनीति को प्रभावित करने वाले कारकों और अहम दलों पर हो रहे असर पर है। उसमें भी खासतौर पर बहुजन समाज पार्टी यानी बसपा पर।
अस्सी के दशक में जन्म लेने वाली पार्टी 2012 तक उत्तर प्रदेश की सत्ता का एक अहम स्तंभ तो रही ही, केंद्र की सरकारों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण रही है। पंजाब से आए कांशीराम ने जिस उत्तर प्रदेश को अपनी राजनीतिक कर्मभूमि बनाया था, उसे उनकी उत्तराधिकारी मायावती ने बड़ी मजबूती से आगे बढ़ाया। तीन बार उत्तर प्रदेश की सीएम रहीं मायावती की छवि एक सख्त प्रशासक की बनी। उत्तर प्रदेश में तो लोग यह भी कहते थे कि मायावती के शासनकाल में कानून व्यवस्था दुरुस्त रहती है। उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरे देश में मायावती (Mayawati) को एक स्टेट्समैन जैसा रुतबा हासिल हो गया था। फिर आया 2012 के बाद का दौर जब मुलायम सिंह यादव ने पहली बार अपने बेटे अखिलेश को उप्र की सत्ता सौंपी। पांच साल अखिलेश रहे और फिर 2017 और 2022 में भाजपा की सरकार के मुखिया योगी आदित्यनाथ बने।
बीते 12 साल की अवधि में बसपा की ‘माया’ (Maya) फीकी पड़ी है। इतनी फीकी पड़ी है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में कभी उत्तर प्रदेश की सत्ता में रही बसपा एक सीट पर सिमट गई। 403 सदस्यों वाली विधानसभा में मायावती की पार्टी का केवल एक विधायक…यही आंकड़ा यह बताने के लिए काफी है कि बसपा(BSP) उप्र में रसातल में जाती दिख रही है। तभी शायद मायावती ने अब रुख बदला है। कैडर की सुध ली है। हुंकार भरी है। भाजपा, कांग्रेस और सपा पर लगातार निशाना साध रही हैं। यदि थोड़ा ध्यान दिया जाए तो बीते एक-डेढ़ वर्ष में मायावती ने अपनी डिजिटल प्रजेंस बढ़ाई है। हर राष्ट्रीय व प्रदेशीय अहम मुद्दे पर मायावती ने लगातार ट्विटर और एक्स पर पोस्ट की हैं, कर रही हैं, लेकिन जो एक बेहद अहम बात है कि उन्होंने एक दिन पहले सियासत से अपने संन्यास को सिरे से खारिज किया है। बसपा के राष्ट्रीय सम्मेलन में उन्हें फिर से निर्विरोध राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया है। यह स्वाभाविक भी था। फिलहाल मायावती को बसपा में चुनौती देने वाला कोई नहीं है। बड़ी बात यह नहीं है कि उन्हें फिर से राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया है, अहम बात यह है कि अब माया अपने पुरानी विचारधारा पर लौटती दिख रही हैं। सबसे पहले तो उन्होंने मजबूती से संदेश दिया है कि मैं अभी राजनीति में हूं, औऱ मजबूती से हूं। इसके अलावा उन्होंने स्पष्ट किया कि आकाश आनंद उनके सियासी उत्तराधिकारी हैं, लेकिन बसपा की कमान अभी उन्हीं के हाथ में है।
जाहिर है कि माया का पूरा ध्यान अब अपनी पार्टी के कैडर पर है। मायावती जानती हैं कि उनका कैडर जब तक फिर से सक्रिय नहीं होगा, बसपा का रिवाइवल बेहद मुश्किल होगा। यह सत्य भी है क्योंकि बसपा हमेशा से कैडर बेस्ट पार्टी रही है और बीते तीन चुनाव में उसे अपेक्षित सफलता न मिलना कैडर की कमी की ओर इशारा करता है। अब शायद मायावती ने इसे समझ लिया है और एकेडमिक उपस्थिति से आगे निकलकर प्रैक्टिकल पहुंच बनाने पर काम शुरू कर दिया है। देखना होगा कि कैसे आगे की राह निकलती है और अनमना कैडर कैसे फिर से बहनजी को सियासत में मजबूत करने पर काम करता है। यह जरूर मान लीजिए कि अगर कैडर सक्रिय हो गया तो इसका असर आने वाले उपचुनाव में दिखेगा। यहीं से बसपा का रणनीतिक शिफ्ट दिख भी रहा है।
पार्टी ने लंबे समय बाद साफ कर दिया है कि वह उपचुनाव में सभी दस सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारेगी। इससे साफ है कि मायावती ने अब सब चुनाव लड़ने का मन बना लिया है। यह राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण फैसला है क्योंकि जब आप मैदान में होंगे, तभी कैडर भी उत्साहित महसूस करेगा और पार्टी का कोर वोटर भी। इसी बात को भांपकर मायावती ने रुख बदला है जो उत्तर प्रदेश में आने वाले उपचुनाव को तो दिलचस्प बनाएगा ही, आगामी विधानसभा चुनाव के लिए भी नई बिसात बिछा सकता है। अभी उप्र के चुनाव में भाजपा (BJP) के सामने सपा ही चुनौती ही तरह दिखती है। बसपा अदृश्य सी हो गई थी, अब शायद मुकाबला फिर से त्रिकोणीय हो। यदि इस बीच कांग्रेस (Congress) पुनर्जीवन पा जाती है तो बेहद दिलचस्प हो जाएगी उप्र की लड़ाई। खैर, अभी तो नई ऊर्जा से लैस मायावती के अगले पैंतरे का इंतजार सियासी गलियारों में रहेगा। क्या वह बसपा को पुनर्जीवन देकर उप्र की राजनीति को नया रूप दे पाएंगी…









