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Iran-US Tensions: ईरान की सरहदों पर जंग की साया और भीतर सुलगता विद्रोह
Authored By: गुंजन शांडिल्य
Published On: Thursday, January 29, 2026
Last Updated On: Thursday, January 29, 2026
ईरान आज एक साथ तीन संकट झेल रहा है. पहला, अंतरराष्ट्रीय सैन्य दबाव. दूसरा, क्षेत्रीय कूटनीतिक घेराबंदी और तीसरा, अंदरूनी विद्रोह. ईरान के हालात गंभीर हैं. ईरानी सरकार का अगला कदम किस दिशा में जाएगा, किसी को नहीं पता. लेकिन उनका एक गलत कदम ईरान सहित पूरे मध्य पूर्व को युद्ध में झोंक सकता है. फिलहाल, मध्य पूर्व सांस रोके हुए है.
Authored By: गुंजन शांडिल्य
Last Updated On: Thursday, January 29, 2026
Iran-US Tensions: मध्य पूर्व एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर खड़ा है. यहां एक गलत फैसला पूरे इलाके को युद्ध की आग में झोंक सकता है. ईरान पर संभावित अमेरिकी सैन्य हमले की आशंका के बीच तेहरान ने पूरे क्षेत्र में कूटनीतिक फोन घुमाने शुरू कर दिए हैं.
हालात बदतर होते जा रहे हैं. एक तरफ अमेरिकी युद्धपोत फारस की खाड़ी में तैनात हैं, दूसरी तरफ ईरान के भीतर सड़कों पर बहा खून और ढहती अर्थव्यवस्था सत्ता की नींव हिला रही है.
समुद्र से हमला संभव
अमेरिका ने USS अब्राहम लिंकन एयरक्राफ्ट कैरियर और कई गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर इस क्षेत्र में भेज दिए हैं. साफ है कि अगर हमला हुआ, तो वह समुद्र से शुरू हो सकता है. हालांकि, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे दो अहम अमेरिकी साझेदार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई के लिए अपने हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं होने देंगे.
ईरानी अधिकारियों ने कतर से भी संपर्क साधा है. कतर में अमेरिका का एक बड़ा सैन्य अड्डा मौजूद है. यह रुख बताता है कि अरब देश किसी भी कीमत पर एक और क्षेत्रीय युद्ध में शामिल नहीं होना चाहता है. लेकिन सवाल यह है कि क्या अमेरिका को हवाई रास्तों की सच में जरूरत भी पड़ेगी?
रियाल की ऐतिहासिक गिरावट और सड़कों पर गुस्सा
ईरान की अर्थव्यवस्था इस संकट का सबसे कमजोर मोर्चा बन चुकी है. स्थानीय मुद्रा रियाल गिरकर एक डॉलर के मुकाबले 16 लाख तक पहुंच गई है. यह एक ऐतिहासिक निचला स्तर है. एक दशक पहले यही दर करीब 32,000 थी. महंगाई, बेरोजगारी और मुद्रा अवमूल्यन ने लोगों के सब्र का बांध तोड़ दिया.
28 दिसंबर को शुरू हुए विरोध प्रदर्शन अब सिर्फ आर्थिक नाराजगी तक सीमित नहीं हैं. वे सीधे-सीधे धर्मशासित सत्ता को चुनौती देते दिख रहे हैं. आंदोलनकारियों पर सरकार की ओर से सख्त कार्रवाई हुई. इंटरनेट लगभग तीन हफ्तों से बंद है और सरकारी मीडिया प्रदर्शनकारियों को ‘आतंकवादी’ बता रहा है.
खूनी दमन और आंकड़ों की जंग
मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक, अब तक कम से कम 6,373 लोगों की मौत हो चुकी है. इनमें हजारों प्रदर्शनकारी, सैकड़ों सुरक्षा बल, 113 बच्चे और दर्जनों ऐसे नागरिक शामिल हैं, जो प्रदर्शनों में शामिल भी नहीं थे. 42,000 से ज्यादा गिरफ्तारियों का दावा किया जा रहा है.
सरकार इन आंकड़ों को खारिज करती है और मरने वालों की संख्या लगभग आधी बताती है. लेकिन यह साफ है कि यह दमन दशकों में सबसे बड़ा है. यहां तक कि 1979 की इस्लामिक क्रांति की अराजकता की यादें भी ताजा हो रही हैं.
ट्रंप की धमकी और डील की पेशकश एक साथ
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रुख विरोधाभासी के साथ-साथ खतरनाक भी है. एक ओर वे शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की हत्या और संभावित सामूहिक फांसियों के जवाब में बल प्रयोग की धमकी देते हैं. दूसरी ओर वे ईरान को बातचीत की मेज पर आने का न्योता भी देते हैं.
क्या कहा ट्रंप ने?
ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर साफ लिखा है, ‘कोई परमाणु हथियार नहीं, एक निष्पक्ष समझौता चाहिए.’ लेकिन उन्होंने साथ में यह चेतावनी भी दी कि अगर हालात बिगड़े तो अगला हमला कहीं ज्यादा बुरा होगा. यह भाषा कूटनीति से ज्यादा दबाव और डर की रणनीति लगती है.
तेहरान बातचीत को तैयार लेकिन धमकी नहीं
- संयुक्त राष्ट्र में ईरान के मिशन ने पलटवार करते हुए कहा कि तेहरान आपसी सम्मान पर आधारित बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन अगर मजबूर किया गया तो वह ‘पहले कभी नहीं की तरह’ जवाब देगा. विदेश मंत्री अब्बास अराघची का कहना है कि सैन्य धमकियों के साए में कोई भी डिप्लोमेसी कारगर नहीं हो सकती.
- ईरान का यह रुख दिखाता है कि वह बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं करना चाहता, लेकिन दबाव में झुकने को भी तैयार नहीं है.
अमेरिकी विदेश मंत्री ने कांग्रेस में दिया बयान
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने कांग्रेस में कहा कि क्षेत्र में बढ़ी सैन्य मौजूदगी का मकसद ईरानी खतरे से बचाव है. उन्होंने शासन परिवर्तन पर खुलकर बात करने से परहेज किया, लेकिन यह जरूर कहा कि ईरान की मौजूदा सरकार पहले से कहीं ज्यादा कमजोर दिख रही है.
यह बयान बताता है कि वॉशिंगटन भीतर की दरारों पर नजर रखे हुए है और शायद समय का इंतजार भी.
क्षेत्रीय कूटनीति की रफ्तार हुई तेज
मिस्र, तुर्की और सऊदी अरब सक्रिय रूप से तनाव कम करने की कोशिशों में जुटे हैं. मिस्र ने ईरान और अमेरिका दोनों से संपर्क किया है. तुर्की को डर है कि हस्तक्षेप से शरणार्थियों की नई लहर उठ सकती है. सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने साफ शब्दों में कहा है कि उनका देश किसी भी हमले का हिस्सा नहीं बनेगा.
मायूस होता ईरानी समाज
तेहरान के एक शिक्षक मोहम्मद हैदरी की बात शायद पूरे समाज की पीड़ा बयान करती है. उन्होंने कहा, ‘हम अपनी अगली पीढ़ी को बेहतर सबक नहीं दे पाए.’ यह सिर्फ आत्मालोचना नहीं, बल्कि उस टूटन का संकेत है जो ईरानी समाज के भीतर गहराती जा रही है.
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