Starmer China visit: अमेरिका फर्स्ट से अमेरिका अलोन तक, ट्रंप की विदेश नीति खतरनाक मोड़ पर

Authored By: गुंजन शांडिल्य

Published On: Tuesday, January 27, 2026

Last Updated On: Tuesday, January 27, 2026

Starmer China Visit के संदर्भ में ट्रंप की विदेश नीति पर सवाल, अमेरिका फर्स्ट से अमेरिका अलोन की ओर बढ़ता रुख.
Starmer China Visit के संदर्भ में ट्रंप की विदेश नीति पर सवाल, अमेरिका फर्स्ट से अमेरिका अलोन की ओर बढ़ता रुख.

प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर आज (27जनवरी को) चीन के लिए उड़ान भरेंगे, जो आठ साल में किसी ब्रिटिश नेता का पहला दौरा होगा. इसका मकसद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के साथ संबंधों को सुधारना और तेजी से अप्रत्याशित होते संयुक्त राज्य अमेरिका पर निर्भरता कम करना है.

Authored By: गुंजन शांडिल्य

Last Updated On: Tuesday, January 27, 2026

Starmer China Visit: डोनाल्ड ट्रंप के दूसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद यह उम्मीद थी कि उनका ‘अमेरिका फर्स्ट’ एजेंडा पहले से अधिक आक्रामक होगा. पर शायद खुद वॉशिंगटन ने भी नहीं सोचा था कि इस नीति की सबसे बड़ी कीमत उसके ही सबसे करीबी मित्र और रणनीतिक साझेदार को चुकाना होगा. आज स्थिति यह है कि अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी- ब्रिटेन, कनाडा, यूरोपीय संघ और यहां तक कि जापान भी अपने आर्थिक और कूटनीतिक विकल्पों पर नए सिरे से विचार करने को मजबूर हुए हैं.

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर का आठ साल बाद चीन दौरा इसी बदलते वैश्विक संतुलन का संकेत है. यह बीजिंग और लंदन के बीच रिश्तों की बहाली भर नहीं है. बल्कि वॉशिंगटन के लिए एक कूटनीतिक चेतावनी भी है. ट्रंप की अनिश्चित और धमकी भरी विदेश नीति अमेरिका को उसके ही मित्रों से दूर धकेल रही है.

टैरिफ, धमकियां और भरोसे का संकट

ट्रंप की राजनीति का केंद्रीय तत्व हमेशा दबाव और धमकी से भरा रहा है. चाहे वह व्यापार हो या सुरक्षा. उनके दूसरे कार्यकाल में यह प्रवृत्ति और तेज़ हो गई है. कनाडा जैसे पड़ोसी और ऐतिहासिक सहयोगी को 100 प्रतिशत टैरिफ की धमकी देना इस बात का उदाहरण है कि ट्रंप प्रशासन अब मित्र और प्रतिद्वंद्वी में फर्क करने को तैयार नहीं दिखता.

कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी का चीन के साथ आर्थिक समझौता करना इसी असुरक्षा की उपज है. जब अमेरिका अपने साझेदारों को अस्थिर व्यापार नीतियों और दंडात्मक टैरिफ़ के ज़रिये डराने लगे, तो स्वाभाविक है कि वे वैकल्पिक आर्थिक साझेदार तलाशने शुरू कर दिए हैं. इस पर ट्रंप की प्रतिक्रिया पूरे कनाडाई निर्यात पर प्रतिबंधात्मक टैरिफ की चेतावनी, दिखाती है कि वे सहयोग नहीं, अधीनता चाहते हैं.

ग्रीनलैंड और ‘धमकी कूटनीति’

ट्रंप के ग्रीनलैंड पर नियंत्रण संबंधी बयान ने तो यूरोप में अमेरिका की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. डेनमार्क जैसे नाटो सहयोगी के क्षेत्र को लेकर खुलेआम दावे करना केवल सनक नहीं, बल्कि ‘ब्लैकमेल डिप्लोमेसी’ का हिस्सा है. और यही ट्रंप की पहचान बन चुकी है.

यही वजह है कि ऐतिहासिक रूप से अमेरिका का सबसे भरोसेमंद साझेदार ब्रिटेन भी यह सोचने पर मजबूर हो गया है कि क्या वॉशिंगटन पर पूरी तरह निर्भर रहना, उसके राष्ट्रीय हित में है या नहीं. कीर स्टार्मर की चीन यात्रा इसी रणनीतिक पुनर्संतुलन की अभिव्यक्ति है.

  • स्टार्मर 2018 के बाद चीन का दौरा करने वाले पहले ब्रिटिश प्रधानमंत्री हैं.
  • ब्रिटेन, चीन के साथ व्यापार और आर्थिक संबंध सुधारना चाहता है.
  • यह दौरा ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की धमकियों के बाद हो रहा है

चीन बनाम अमेरिका: नैरेटिव की जंग

विडंबना यह है कि ट्रंप जिस चीन को वैश्विक खतरे के रूप में पेश करते हैं, वही चीन आज खुद को ‘स्थिर और विश्वसनीय साझेदार’ के रूप में पेश कर रहा है. बीजिंग का ‘बहुध्रुवीय दुनिया’ का नैरेटिव उन देशों को आकर्षित कर रहा है, जो ट्रंप की अस्थिरता से परेशान हैं.

किंग्स कॉलेज लंदन के प्रोफेसर केरी ब्राउन का कहना कि AI, सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण जैसे वैश्विक मुद्दों पर लंदन, वाशिंगटन की तुलना में बीजिंग के अधिक करीब है. यह अमेरिका के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए. साथ ही यह संकेत देता है कि ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका वैश्विक एजेंडा-सेटर की भूमिका खोता जा रहा है.

अर्थव्यवस्था बनाम सुरक्षा

ब्रिटेन की तरह कई देश अब इस द्वंद्व में हैं कि वे सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर रहें या आर्थिक विकास के लिए चीन की ओर झुकें. ट्रंप इस दुविधा को और गहरा कर रहे हैं. एक ओर वे चीन को राष्ट्रीय सुरक्षा खतरा बताते हैं, दूसरी ओर अपने सहयोगियों को चीन से किसी भी तरह के आर्थिक रिश्ते पर सज़ा देने की धमकी देते हैं.

इसका परिणाम यह है कि अमेरिका की ‘लीडरशिप’ डर और दबाव पर आधारित दिखने लगी है. वहीँ चीन धैर्य और सौदों के ज़रिये अपनी जगह बना रहा है।.

अमेरिका की साख पर सबसे बड़ा सवाल

सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि ब्रिटेन या कनाडा चीन के करीब क्यों जा रहे हैं. असली सवाल यह है कि अमेरिका उन्हें अपने पास क्यों नहीं रख पा रहा. ट्रंप का दूसरा कार्यकाल यह स्पष्ट कर रहा है कि ‘अमेरिका फर्स्ट’ धीरे-धीरे ‘अमेरिका अलोन’ में बदलता जा रहा है.

जब दोस्त ही अमेरिका से दूरी बनाने लगें, तो यह किसी बाहरी साजिश का नहीं, बल्कि भीतर की नीति विफलता का संकेत बताया जाता है. ट्रंप की धमकी-आधारित विदेश नीति ने अमेरिका की सॉफ्ट पावर, भरोसे और नेतृत्व, तीनों को कमजोर किया है.

आज दुनिया एक नए संतुलन की तलाश में है. सवाल सिर्फ़ इतना है कि क्या अमेरिका, डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में, इस नई दुनिया का मार्गदर्शक बन पाएगा या फिर उसके सहयोगी देश उसे पीछे छोड़कर आगे बढ़ जाएंगे?

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गुंजन शांडिल्य समसामयिक मुद्दों पर गहरी समझ और पटकथा लेखन में दक्षता के साथ 10 वर्षों से अधिक का अनुभव रखते हैं। पत्रकारिता की पारंपरिक और आधुनिक शैलियों के साथ कदम मिलाकर चलने में निपुण, गुंजन ने पाठकों और दर्शकों को जोड़ने और विषयों को सहजता से समझाने में उत्कृष्टता हासिल की है। वह समसामयिक मुद्दों पर न केवल स्पष्ट और गहराई से लिखते हैं, बल्कि पटकथा लेखन में भी उनकी दक्षता ने उन्हें एक अलग पहचान दी है। उनकी लेखनी में विषय की गंभीरता और प्रस्तुति की रोचकता का अनूठा संगम दिखाई देता है।
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