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PoK में क्यों भड़का जनविद्रोह? महंगाई से शुरू हुआ आंदोलन कैसे बना पाकिस्तान सरकार और सेना के खिलाफ सबसे बड़ा विरोध
Authored By: Nishant Singh
Published On: Thursday, June 11, 2026
Last Updated On: Friday, June 12, 2026
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में महंगाई, बिजली संकट और राजनीतिक अधिकारों की मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अब बड़े जनविद्रोह का रूप ले चुका है. JAAC के नेतृत्व में चल रहे प्रदर्शनों पर प्रशासन की सख्ती, गिरफ्तारियां और इंटरनेट बंदी ने तनाव बढ़ा दिया है, जिससे पूरे क्षेत्र में अशांति का माहौल बना हुआ है.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Friday, June 12, 2026
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में हालात लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं. जिस आंदोलन की शुरुआत महंगाई, बिजली के बढ़ते बिल और रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी समस्याओं को लेकर हुई थी, वह अब पाकिस्तान सरकार और सेना के खिलाफ बड़े जनआंदोलन का रूप ले चुका है. सड़कों पर हजारों लोग उतर आए हैं और कई जगहों पर प्रदर्शन हिंसक झड़पों में बदल गए हैं. स्थानीय लोगों का आरोप है कि उनकी मांगों को सुनने के बजाय प्रशासन ने बल प्रयोग का रास्ता चुना, जिससे हालात और बिगड़ गए.
कितनी गंभीर है स्थिति?
रिपोर्टों के अनुसार पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़पों में 20 से 30 लोगों की मौत होने की बात कही जा रही है, जबकि 200 से अधिक लोग घायल बताए जा रहे हैं. हालांकि वास्तविक आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है. मुजफ्फराबाद, रावलकोट, मीरपुर, ददियाल, सुधनोती, भीमबर और गिलगित-बाल्टिस्तान समेत कई इलाकों में तनाव बना हुआ है.
स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि कई क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की अतिरिक्त तैनाती करनी पड़ी है. स्थानीय लोगों का कहना है कि विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां की जा रही हैं.
आखिर क्यों भड़का लोगों का गुस्सा?
PoK के लोगों की नाराजगी नई नहीं है. वर्षों से यहां के लोग राजनीतिक अधिकारों, आर्थिक सुविधाओं और स्थानीय प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठाते रहे हैं. लेकिन हाल के महीनों में महंगाई और बिजली की बढ़ती कीमतों ने लोगों की परेशानी कई गुना बढ़ा दी.
प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगें
- बिजली की दरों में कमी
- आटे और आवश्यक वस्तुओं पर सब्सिडी
- भ्रष्टाचार की जांच
- बेरोजगारी कम करने के लिए ठोस कदम
- स्थानीय लोगों को अधिक राजनीतिक अधिकार
- प्रशासनिक फैसलों में पारदर्शिता
- विधानसभा में आरक्षित 12 सीटों को खत्म करना
12 आरक्षित सीटों का विवाद क्या है?
PoK विधानसभा में 45 सीटें हैं, जिनमें से 12 सीटें उन शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं जो 1947 के बाद पाकिस्तान के अन्य हिस्सों में बस गए थे. प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि इन सीटों का इस्तेमाल स्थानीय राजनीति को प्रभावित करने के लिए किया जाता है.
आंदोलनकारियों का कहना है कि इन सीटों की वजह से स्थानीय जनता का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कमजोर होता है. जुलाई में होने वाले चुनावों को देखते हुए यह मुद्दा और ज्यादा संवेदनशील बन गया है.
आंदोलन का नेतृत्व कौन कर रहा है?
इस आंदोलन के केंद्र में जम्मू कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) नाम का संगठन है. यह व्यापारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, नागरिक संगठनों और स्थानीय समूहों का गठबंधन माना जाता है.
JAAC की मुख्य भूमिका
- पूरे क्षेत्र में विरोध प्रदर्शन आयोजित करना
- महंगाई और बिजली संकट के खिलाफ अभियान चलाना
- राजनीतिक अधिकारों की मांग उठाना
- सरकार के खिलाफ हड़ताल और बंद का आह्वान करना
इस संगठन का नेतृत्व सामाजिक कार्यकर्ता शौकत नवाज मीर कर रहे हैं, जो पिछले कुछ वर्षों से स्थानीय अधिकारों के मुद्दे उठा रहे हैं.
पाकिस्तान सरकार ने क्या कदम उठाए?
सरकार ने आंदोलन को नियंत्रित करने के लिए कड़े कदम उठाए हैं.
प्रशासनिक कार्रवाई
- JAAC को प्रतिबंधित घोषित किया गया
- आतंकवाद विरोधी कानून के तहत कार्रवाई
- 100 से ज्यादा कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी
- संगठन के कार्यालय को सील किया गया
- नेताओं पर राजद्रोह के मामले दर्ज किए गए
- कई नेताओं की गिरफ्तारी पर इनाम घोषित किया गया
सरकार का आरोप है कि JAAC क्षेत्र में अशांति फैला रहा है, जबकि संगठन खुद को शांतिपूर्ण अधिकार आंदोलन बता रहा है.
इंटरनेट बंद, संचार पर रोक
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कई क्षेत्रों में इंटरनेट और मोबाइल डेटा सेवाएं बंद कर दी गईं. प्रशासन ने बाहरी लोगों और पर्यटकों को भी क्षेत्र से दूर रहने की सलाह दी है.
आलोचकों का कहना है कि इंटरनेट बंद करने का मकसद प्रदर्शन की खबरों को दुनिया तक पहुंचने से रोकना है, जबकि प्रशासन इसे सुरक्षा का कदम बता रहा है.
शांतिपूर्ण आंदोलन हिंसक कैसे बना?
विश्लेषकों के अनुसार आंदोलन को हिंसक मोड़ देने वाली सबसे बड़ी घटना एक कार्यकर्ता शाहजेब हबीब की मौत थी.
बताया जाता है कि पुलिस कार्रवाई के दौरान गोलीबारी हुई, जिसमें शाहजेब हबीब की जान चली गई. उनकी मौत की खबर फैलते ही बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए. इसके बाद अस्पताल के बाहर प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों के बीच टकराव हुआ.
हिंसा बढ़ने की प्रमुख वजहें
- JAAC पर प्रतिबंध
- बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां
- इंटरनेट बंदी
- शाहजेब हबीब की मौत
- सुरक्षाबलों और प्रदर्शनकारियों के बीच सीधी झड़प
यहीं से आंदोलन पूरे PoK में फैल गया.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठे सवाल
PoK की स्थिति को लेकर कई मानवाधिकार संगठनों और विदेशी नेताओं ने चिंता जताई है.
प्रमुख प्रतिक्रियाएं
- भारत: भारत ने पुलिस कार्रवाई और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों को लेकर पाकिस्तान की आलोचना की है.
- एमनेस्टी इंटरनेशनल: संगठन ने इसे मानवाधिकारों के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया और निष्पक्ष जांच की मांग की.
- ब्रिटेन के सांसद: 50 से अधिक ब्रिटिश सांसदों ने संचार ब्लैकआउट और गिरफ्तारियों पर चिंता जताते हुए पाकिस्तान से संयम बरतने की अपील की.
- मानवाधिकार कार्यकर्ता: कई अंतरराष्ट्रीय कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग की आलोचना की है.
पाकिस्तान का रुख अब भी सख्त
लगातार आलोचनाओं के बावजूद पाकिस्तान सरकार अपने रुख में ज्यादा नरमी दिखाती नजर नहीं आ रही. अधिकारियों का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई जरूरी थी. वहीं पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता बिलावल भुट्टो जरदारी का दावा है कि प्रदर्शनकारियों की अधिकांश मांगों पर काम किया जा चुका है.
इसके बावजूद आंदोलनकारी नेतृत्व का कहना है कि उनकी मूल मांगों को अभी तक पूरा नहीं किया गया है.
निष्कर्ष
PoK में जारी आंदोलन अब केवल महंगाई या बिजली बिलों का मुद्दा नहीं रह गया है. यह आर्थिक अधिकारों, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक जवाबदेही की मांग से जुड़ा व्यापक जनआंदोलन बन चुका है. एक ओर सरकार कानून-व्यवस्था का हवाला देकर सख्ती बरत रही है, तो दूसरी ओर प्रदर्शनकारी इसे अपने अधिकारों की लड़ाई बता रहे हैं. आने वाले दिनों में चुनावों और बढ़ते जनदबाव के बीच यह संकट पाकिस्तान के लिए और बड़ी चुनौती बन सकता है.
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