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क्या संभल मुद्दे पर बढ़ जाएगी राहुल गांधी और अखिलेश यादव में दूरी ?
Authored By: सतीश झा
Published On: Saturday, December 7, 2024
Last Updated On: Saturday, December 7, 2024
संभल हिंसा का मुद्दा कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) के बीच बढ़ती दूरी को और गहरा सकता है। संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान और उसके बाहर जिस तरह से यह मामला उछला, उसने दोनों दलों के बीच आपसी विश्वास पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
Authored By: सतीश झा
Last Updated On: Saturday, December 7, 2024
लोकसभा चुनाव के बाद ‘इंडिया’ ब्लॉक में कांग्रेस (Congress) और समाजवादी पार्टी (SP) के बीच बना सद्भाव अब गहराते तनाव में बदल गया है। इस टकराव की शुरुआत उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में हुए उपचुनावों से हुई, जो संसद के शीतकालीन सत्र में चरम पर पहुंच गई है।
संभल मुद्दे पर अलग-अलग रुख
सपा प्रमुख अखिलेश यादव (SP Chief Akhilesh Yadav) ने संसद में संभल हिंसा पर चर्चा की जोरदार मांग की और इसे “सोची-समझी साजिश” बताया। दूसरी ओर, कांग्रेस के नेता अडानी मुद्दे को प्रमुखता से उठाकर संसद की कार्यवाही रोक रहे थे। जब संसद सुचारू रूप से चलने लगी, तो राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने संभल जाने का ऐलान कर दिया।
यह कदम सपा को नागवार गुजरा। सपा नेताओं का मानना है कि कांग्रेस ने जानबूझकर राहुल और प्रियंका के दौरे से सारा ध्यान अपनी ओर खींच लिया, जबकि सपा इस मुद्दे पर पहले से मुखर थी।
संसद में सीट आवंटन से बढ़ा तनाव
संसद में अखिलेश यादव की सीट राहुल गांधी के साथ पहली कतार से हटाकर छठे ब्लॉक में कर दी गई। सपा इसे कांग्रेस की रणनीति मान रही है, ताकि सारा फोकस राहुल गांधी पर रहे। अखिलेश ने इस पर सार्वजनिक तंज कसते हुए कहा, “धन्यवाद कांग्रेस!”। इससे दोनों दलों के बीच मतभेद और स्पष्ट हो गए।
मुस्लिम वोट बैंक पर राजनीति
सपा को लग रहा है कि कांग्रेस मुस्लिम वोट बैंक को साधने के लिए स्वतंत्र रणनीति बना रही है। संभल जैसे मुस्लिम बहुल क्षेत्र में कांग्रेस का हस्तक्षेप सपा को कमजोर करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
क्या दूरी और बढ़ेगी?
- संभल का असर: अगर कांग्रेस और सपा इस मुद्दे पर अपने रुख से पीछे नहीं हटतीं, तो यह उनके रिश्तों में और दरार पैदा कर सकता है।
- चुनाव रणनीति: उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का सपा के साथ तालमेल न करने का फैसला पहले ही दोनों दलों के बीच अविश्वास बढ़ा चुका है।
- विपक्षी एकता पर प्रभाव: ‘इंडिया’ ब्लॉक की एकता इस तनाव से कमजोर हो सकती है, जिससे आगामी लोकसभा चुनाव में विपक्षी रणनीति प्रभावित होगी।
उत्तर प्रदेश के नौ सीटों के उपचुनाव में सपा ने कांग्रेस को दो सीटें देने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन कांग्रेस ने इसे ठुकरा दिया। कांग्रेस ने तर्क दिया कि दोनों सीटों पर जीत की संभावना बेहद कम है। इस असहमति के कारण कांग्रेस ने उपचुनाव से खुद को अलग कर लिया।
23 नवंबर को उपचुनाव के नतीजे आए, जिनमें सपा केवल दो सीटें जीत पाई। खास बात यह रही कि मुस्लिम बहुल तीन सीटों पर सपा को हार का सामना करना पड़ा।
संसद में बढ़ा नया विवाद
संसद के शीतकालीन सत्र में सपा और कांग्रेस के बीच दो मुद्दों पर टकराव हुआ:
- संभल हिंसा:संभल में शाही जामा मस्जिद के सर्वे और हिंसा के बाद चार लोगों की मौत का मामला सपा ने संसद में उठाया।
- उधर, कांग्रेस अडानी मामले को लेकर संसद ठप कर रही थी। जब कार्यवाही शुरू हुई, तो सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने संभल मुद्दे पर लोकसभा में भाषण दिया, जबकि उसी समय राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ने संभल जाने का कार्यक्रम बना लिया।
- सपा का आरोप है कि कांग्रेस ने राहुल-प्रियंका के कार्यक्रम से सारा ध्यान अपनी ओर खींचने की कोशिश की।
- संसद में सीट आवंटन:अखिलेश यादव को पहले राहुल गांधी के साथ पहली कतार में सीट दी गई थी। लेकिन नई व्यवस्था के तहत उनकी सीट छठे ब्लॉक में कर दी गई। सपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस ने ऐसा जानबूझकर किया ताकि राहुल गांधी को संसद में केंद्रित किया जा सके। अखिलेश ने पहली बार सदन में प्रवेश करते हुए तंज कसा, “धन्यवाद कांग्रेस!”
राहुल के साथ बैठने का प्रस्ताव ठुकराया
संसद में कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने अखिलेश यादव से कहा कि वे राहुल गांधी के साथ बैठें, लेकिन अखिलेश यादव ने इसे ठुकरा दिया। यह घटना विपक्षी एकजुटता के लिए एक बड़ा झटका मानी जा रही है।
आगे की राह कठिन
‘इंडिया’ ब्लॉक की दो प्रमुख पार्टियों के बीच यह खींचतान विपक्षी एकता को कमजोर कर सकती है। जहां कांग्रेस और सपा अपने-अपने वोट बैंक को लेकर सतर्क हैं, वहीं इस विवाद से भाजपा को राजनीतिक फायदा मिल सकता है। सवाल यह है कि क्या यह तकरार आगामी लोकसभा चुनाव में विपक्ष की रणनीति को प्रभावित करेगी?
समाधान की गुंजाइश?
दोनों दलों को समझना होगा कि एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप से फायदा भाजपा को होगा। यदि कांग्रेस और सपा आपसी संवाद स्थापित करके इस मुद्दे को सुलझा लेते हैं, तो विपक्षी एकता मजबूत हो सकती है।
हालांकि, जिस तरह से हालात बन रहे हैं, संभल मुद्दा राहुल गांधी और अखिलेश यादव के रिश्तों को और बिगाड़ सकता है। इसका असर न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है।












