कब तक होगा लागू वन नेशन वन इलेक्शन, संसद में आज क्या हुआ इस प्रस्ताव को लेकर !

Authored By: सतीश झा

Published On: Tuesday, December 17, 2024

one nation one election .
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'एक देश, एक चुनाव' विधेयक को केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने सदन में पेश किया। हालांकि, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इसका कड़ा विरोध किया। बीते गुरुवार को केंद्रीय कैबिनेट ने इस विधेयक को मंजूरी दी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2019 के स्वतंत्रता दिवस पर इस विचार को पहली बार सामने रखा था। 2024 में स्वतंत्रता दिवस पर उन्होंने इस मुद्दे को फिर से महत्व दिया, इसे देश की एकता और विकास से जोड़कर प्रस्तुत किया।

Authored By: सतीश झा

Last Updated On: Tuesday, December 17, 2024

लोकसभा में मंगलवार को ‘एक देश, एक चुनाव’ विधेयक पर चर्चा और वोटिंग हुई। यह पहली बार था जब नई संसद में इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम के जरिए वोटिंग कराई गई। विधेयक को पेश करने के पक्ष में 269 वोट पड़े, जबकि 198 सदस्यों ने इसके खिलाफ मतदान किया।

क्या है ‘एक देश, एक चुनाव’?

‘एक देश, एक चुनाव’ का उद्देश्य लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराना है। हालांकि, यह कोई नया प्रस्ताव नहीं है। आजादी के बाद 1952, 1957, 1962 और 1967 तक देश में एक साथ चुनाव हुए थे। बाद में विभिन्न कारणों से यह प्रक्रिया टूट गई।

चुनाव आयोग और कोविंद समिति का रुख

चुनाव आयोग इस पर तकनीकी और लॉजिस्टिक दृष्टिकोण से विचार कर रहा है। वहीं, ‘एक देश, एक चुनाव’ पर कोविंद समिति की सिफारिशें आने बाकी हैं।

कैसे लागू होगा एक देश एक चुनाव?

इससे पहले अधिकारियों ने पीटीआई को बताया था कि एक साथ चुनाव कराने के लिए संविधान में कम से कम पांच संशोधन करने होंगे। इनमें संसद के सदनों की अवधि से संबंधित अनुच्छेद 83, राष्ट्रपति द्वारा लोकसभा को भंग करने से संबंधित अनुच्छेद 85, राज्य विधानमंडलों की अवधि से संबंधित अनुच्छेद 172, राज्य विधानमंडलों के विघटन से संबंधित अनुच्छेद 174 और राज्यों में राष्ट्रपति शासन को लागू करने से संबंधित अनुच्छेद 356 शामिल हैं। इसके साथ ही संविधान की संघीय विशेषता को ध्यान में सभी दलों की सहमति जरूरी होगी। वहीं यह भी अनिवार्य है कि सभी राज्य सरकारों की सहमति प्राप्त की जाए।

क्यों हो रहा है इस पर सियासी बयानबाजी

‘एक देश, एक चुनाव’ (One Nation, One Election) की बहस 2018 में विधि आयोग की एक मसौदा रिपोर्ट के बाद शुरू हुई। इस रिपोर्ट में एक साथ चुनाव कराने के आर्थिक और प्रशासनिक लाभों को प्रमुखता से गिनाया गया।

विधि आयोग की रिपोर्ट के अनुसार

2014 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद हुए विभिन्न विधानसभा चुनावों पर लगभग समान खर्च हुआ था। यदि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाएं, तो खर्च का बोझ केंद्र और राज्यों के बीच 50:50 के अनुपात में बंट सकता है। यह न केवल चुनावों की लागत को कम करेगा, बल्कि चुनावों से जुड़े अन्य संसाधनों का भी बेहतर उपयोग सुनिश्चित करेगा।

इतिहास और बाधाएं 

  • 1967 तक की स्थिति: देश में एक साथ चुनाव कराने की परंपरा थी। 1952, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ-साथ हुए।
  • 1967 के बाद बदलाव: क्षेत्रीय दलों का उभार हुआ और कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों ने सत्ता संभाली।
  • संविधान की धारा 356 के उपयोग से कई बार राज्य सरकारों को समय से पहले भंग कर दिया गया, जिससे चुनावों का चक्र टूट गया।
  • आज, भारत में विभिन्न राजनीतिक दलों की उपस्थिति और राज्यों में अलग-अलग समय पर चुनाव होने से ‘एक देश, एक चुनाव’ का विचार चुनौतीपूर्ण हो गया है।
  • आजादी के शुरुआती वर्षों में कांग्रेस जैसी एक राष्ट्रीय पार्टी का प्रभुत्व था और क्षेत्रीय दल कमजोर थे।
  • धीरे-धीरे, क्षेत्रीय दलों की संख्या और प्रभाव में वृद्धि हुई।
  • वर्तमान में कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों की सरकारें हैं, जिनके पास स्वतंत्र निर्णय लेने की शक्ति है।

बिल की मौजूदा स्थिति

इस वोटिंग का उद्देश्य विधेयक को पेश करने की मंजूरी प्राप्त करना था। बिल को पास या खारिज करने के लिए नहीं, बल्कि चर्चा और विचार के लिए रखा गया। विधेयक को अब संसद की संयुक्त समिति (जेपीसी) में भेजा जाएगा, जिसे ‘मिनी संसद’ कहा जाता है।

विपक्ष की तीखी आलोचना

विपक्ष ने विधेयक को संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ बताया। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा, “यह संविधान की बुनियादी संरचना को चुनौती देता है।” तृणमूल कांग्रेस के कल्याण बनर्जी, समाजवादी पार्टी के धर्मेंद्र यादव और डीएमके के टीआर बालू ने भी विरोध में अपनी बात रखी।

सरकार का पक्ष

अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कैबिनेट में ही इस विधेयक को संसद की संयुक्त समिति के पास भेजने का सुझाव दिया था ताकि हर स्तर पर गहन चर्चा हो सके। गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, “अगर किसी को आपत्ति है या बटन गलत दब गया है, तो वह पर्ची के जरिए दोबारा वोट दे सकता है।” इसके बाद स्पीकर ओम बिरला ने सदस्यों को प्रक्रिया स्पष्ट करते हुए कहा कि पर्ची का विकल्प उपलब्ध है। लोकसभा के सेक्रेटरी जनरल ने सदस्यों को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग प्रणाली की प्रक्रिया समझाई।

About the Author: सतीश झा
सतीश झा की लेखनी में समाज की जमीनी सच्चाई और प्रगतिशील दृष्टिकोण का मेल दिखाई देता है। बीते 20 वर्षों में राजनीति, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समाचारों के साथ-साथ राज्यों की खबरों पर व्यापक और गहन लेखन किया है। उनकी विशेषता समसामयिक विषयों को सरल भाषा में प्रस्तुत करना और पाठकों तक सटीक जानकारी पहुंचाना है। राजनीति से लेकर अंतरराष्ट्रीय मुद्दों तक, उनकी गहन पकड़ और निष्पक्षता ने उन्हें पत्रकारिता जगत में एक विशिष्ट पहचान दिलाई है
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