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जगन्नाथ रथ यात्रा का अनसुना रहस्य: क्यों पिशि मां के मंदिर के बिना अधूरी मानी जाती है भगवान जगन्नाथ की यात्रा?
Authored By: Nishant Singh
Published On: Saturday, July 11, 2026
Last Updated On: Saturday, July 11, 2026
Jagannath Rath Yatra: जगन्नाथ रथ यात्रा केवल गुंडिचा मंदिर तक सीमित नहीं है. मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ अपनी पिशि मां यानी बुआ के मंदिर जाकर 'पोडा पीठा' का भोग ग्रहण करते हैं. इसी परंपरा के बाद रथ यात्रा पूर्ण मानी जाती है, जो रिश्तों और श्रद्धा का अनूठा संदेश देती है.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Saturday, July 11, 2026
Jagannath Rath Yatra: जगन्नाथ पुरी की रथ यात्रा दुनिया के सबसे भव्य धार्मिक आयोजनों में गिनी जाती है. हर वर्ष लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के दर्शन के लिए ओडिशा के पुरी पहुंचते हैं. आमतौर पर लोग जानते हैं कि भगवान अपनी मौसी गुंडिचा देवी के मंदिर में कुछ दिनों के लिए विराजमान होते हैं, लेकिन बहुत कम लोग इस बात से परिचित हैं कि रथ यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव भगवान की ‘पिशि मां’ यानी बुआ के मंदिर से भी जुड़ा है. धार्मिक मान्यता है कि जब तक भगवान जगन्नाथ अपनी पिशि मां के मंदिर नहीं पहुंचते और वहां विशेष भोग ग्रहण नहीं करते, तब तक उनकी रथ यात्रा पूर्ण नहीं मानी जाती. यही परंपरा इस यात्रा को केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पारिवारिक भावनाओं से जुड़ा उत्सव भी बनाती है.
कौन हैं भगवान जगन्नाथ की पिशि मां?
ओड़िया भाषा में ‘पिशि’ का अर्थ होता है बुआ. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवी कुंती भगवान श्रीकृष्ण की बुआ थीं. कुंती के पिता राजा शूरसेन और श्रीकृष्ण के पिता वासुदेव सगे भाई थे. इसी रिश्ते के आधार पर पुरी में स्थित देवी कुंती के मंदिर को ‘पिशि मां की कुटिया’ कहा जाता है. रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ यहां पहुंचते हैं. यह परंपरा भगवान और उनके परिवार के बीच प्रेम, सम्मान और अपनत्व का प्रतीक मानी जाती है. यही कारण है कि इस मंदिर का धार्मिक महत्व भक्तों के बीच विशेष माना जाता है.
पिशि मां की कुटिया से जुड़ी खास मान्यता
मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ अपनी पिशि मां से बेहद स्नेह करते थे. उन्होंने अपनी बुआ से वचन दिया था कि जब भी वे नगर भ्रमण के लिए रथ यात्रा पर निकलेंगे, उनके घर अवश्य आएंगे. तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि भगवान का रथ कुछ समय के लिए पिशि मां के मंदिर के सामने रुकता है. इस दौरान भगवान का विशेष स्वागत किया जाता है और उन्हें उनका प्रिय व्यंजन ‘पोडा पीठा’ भोग के रूप में अर्पित किया जाता है. ओडिशा का यह पारंपरिक पकवान भगवान जगन्नाथ को अत्यंत प्रिय माना जाता है. श्रद्धालु मानते हैं कि इसी भोग के साथ भगवान अपनी बुआ का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और तब जाकर उनकी यात्रा पूर्ण होती है.
मंदिर की अनोखी विशेषताएं
पिशि मां की कुटिया केवल अपनी धार्मिक मान्यता के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी बनावट और वातावरण के कारण भी खास मानी जाती है. यह मंदिर चारों ओर से एक सुंदर तालाब से घिरा हुआ है. मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ यहां पहुंचकर नौका विहार भी करते हैं. मंदिर परिसर में देवी कुंती के साथ पांचों पांडवों की प्रतिमाएं स्थापित हैं. वहीं भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा भी यहां विराजमान हैं. यह शायद देश के उन दुर्लभ मंदिरों में से एक है, जहां भगवान श्रीकृष्ण के साथ उनकी बुआ की भी श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती है. यह दृश्य भक्तों के लिए आध्यात्मिक अनुभव के साथ-साथ पारिवारिक संस्कारों का भी संदेश देता है.
क्या है इस परंपरा का संदेश?
जगन्नाथ रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में रिश्तों के सम्मान और परिवार की अहमियत का भी प्रतीक है. भगवान स्वयं अपने परिजनों से मिलने जाते हैं, उनका आशीर्वाद लेते हैं और प्रेम का संदेश देते हैं. पिशि मां की कुटिया की यह परंपरा हमें सिखाती है कि जीवन में रिश्तों का सम्मान, बड़ों का आदर और परिवार से जुड़ाव सबसे बड़ा धर्म है. यही कारण है कि आज भी लाखों श्रद्धालु मानते हैं कि यदि भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा का वास्तविक आध्यात्मिक अनुभव लेना है, तो पिशि मां के मंदिर की इस अनोखी परंपरा को जानना और उसके महत्व को समझना भी उतना ही जरूरी है.
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