Jagannath Rath Yatra: हर 12 साल में क्यों बदली जाती है भगवान जगन्नाथ की मूर्ति? जानिए नवकलेवर और ब्रह्म पदार्थ का रहस्य

Authored By: Nishant Singh

Published On: Monday, July 6, 2026

Last Updated On: Monday, July 6, 2026

Jagannath Rath Yatra में नवकलेवर के दौरान भगवान जगन्नाथ की नई मूर्ति और ब्रह्म पदार्थ का रहस्य
Jagannath Rath Yatra में नवकलेवर के दौरान भगवान जगन्नाथ की नई मूर्ति और ब्रह्म पदार्थ का रहस्य

Jagannath Rath Yatra: पुरी के जगन्नाथ मंदिर में हर 12 से 19 वर्ष में होने वाला नवकलेवर अनुष्ठान आस्था और रहस्य का अद्भुत संगम है. इस दौरान भगवान की लकड़ी की मूर्तियां बदली जाती हैं और गुप्त विधि से ब्रह्म पदार्थ नई प्रतिमाओं में स्थापित किया जाता है, जिसे लेकर कई धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं.

Authored By: Nishant Singh

Last Updated On: Monday, July 6, 2026

Jagannath Rath Yatra: ओडिशा के पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर अपनी भव्य रथ यात्रा के साथ-साथ कई रहस्यमयी परंपराओं के लिए भी प्रसिद्ध है. हर साल आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को निकलने वाली रथ यात्रा में लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं. मान्यता है कि इस यात्रा में भाग लेने से व्यक्ति को पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन के कई दोषों से मुक्ति मिलती है. लेकिन इस मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन की लकड़ी की मूर्तियों का समय-समय पर बदला जाना है, जो दुनिया के किसी अन्य प्रमुख मंदिर में देखने को नहीं मिलता.

क्या है नवकलेवर की परंपरा?

जगन्नाथ मंदिर में मूर्तियों को बदलने की इस विशेष प्रक्रिया को नवकलेवर कहा जाता है. ‘नव’ का अर्थ नया और ‘कलेवर‘ का अर्थ शरीर होता है. यानी भगवान नए शरीर को धारण करते हैं. चूंकि ये प्रतिमाएं नीम की लकड़ी से बनी होती हैं, इसलिए समय के साथ इनमें प्राकृतिक बदलाव आने लगता है. इसी कारण धार्मिक परंपरा के अनुसार पुरानी प्रतिमाओं के स्थान पर नई मूर्तियां स्थापित की जाती हैं. यह आयोजन हर साल नहीं, बल्कि तब होता है जब हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ महीने में अधिकमास आता है. आमतौर पर यह अवसर 12 से 19 वर्षों के अंतराल में आता है.

कैसे तैयार होती हैं नई प्रतिमाएं?

नई मूर्तियों के निर्माण के लिए साधारण लकड़ी का उपयोग नहीं किया जाता. मंदिर की परंपराओं के अनुसार विशेष गुणों वाले पुराने नीम के पेड़ों का चयन किया जाता है. इन पेड़ों की पहचान धार्मिक नियमों और विशेष संकेतों के आधार पर की जाती है. इसके बाद वैदिक मंत्रों और पारंपरिक विधियों के साथ भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन की नई प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं. पूरी प्रक्रिया को बेहद पवित्र माना जाता है और इसमें केवल अधिकृत सेवायत ही भाग लेते हैं.

ब्रह्म पदार्थ का सबसे बड़ा रहस्य

नवकलेवर का सबसे रहस्यमयी हिस्सा ‘ब्रह्म पदार्थ’ माना जाता है. धार्मिक मान्यता है कि पुरानी प्रतिमाओं के भीतर स्थापित इस दिव्य तत्व को नई मूर्तियों में स्थानांतरित किया जाता है. इसकी वास्तविक प्रकृति को सार्वजनिक नहीं किया जाता और इसे मंदिर की सबसे गोपनीय परंपराओं में गिना जाता है. इस प्रक्रिया के दौरान पूरे पुरी शहर की बिजली बंद कर दी जाती है, ताकि चारों ओर पूर्ण अंधकार रहे. केवल मंदिर के दइतापति पुजारी ही आंखों पर पट्टी बांधकर और हाथों को कपड़े से ढककर इस अनुष्ठान को पूरा करते हैं. कई पुजारियों ने वर्षों से यह अनुभव साझा किया है कि इस दिव्य तत्व को स्पर्श करते समय उन्हें धड़कन जैसी अनुभूति होती है. धार्मिक मान्यता इसे भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य हृदय से जोड़ती है, हालांकि इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है.

आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम

जगन्नाथ मंदिर की नवकलेवर परंपरा केवल मूर्तियां बदलने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जीवन, परिवर्तन और सनातन आस्था का प्रतीक मानी जाती है. यह परंपरा करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास को और मजबूत करती है. रहस्य, श्रद्धा और धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा यह अनुष्ठान आज भी दुनिया भर के लोगों के लिए आकर्षण और शोध का विषय बना हुआ है. यही वजह है कि पुरी का जगन्नाथ धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत का अद्भुत प्रतीक माना जाता है.

यह भी पढ़ें :- बद्रीनाथ धाम में चढ़ावे पर उठे सवाल, सोशल मीडिया के दावों से मचा बवाल, BKTC ने शुरू कराई जांच

About the Author: Nishant Singh
निशांत कुमार सिंह एक पैसनेट कंटेंट राइटर और डिजिटल मार्केटर हैं, जिन्हें पत्रकारिता और जनसंचार का गहरा अनुभव है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए आकर्षक आर्टिकल लिखने और कंटेंट को ऑप्टिमाइज़ करने में माहिर, निशांत हर लेख में क्रिएटिविटीऔर स्ट्रेटेजी लाते हैं। उनकी विशेषज्ञता SEO-फ्रेंडली और प्रभावशाली कंटेंट बनाने में है, जो दर्शकों से जुड़ता है।
Leave A Comment

अन्य लाइफस्टाइल खबरें