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Chaturmas 2026: चातुर्मास 25 जुलाई से, लेकिन 12 जुलाई के बाद क्यों थम जाएंगे शुभ कार्य? जानिए गुरु वार्धक्य और गुरु अस्त का महत्व
Authored By: Nishant Singh
Published On: Thursday, July 9, 2026
Last Updated On: Thursday, July 9, 2026
Chaturmas 2026: चातुर्मास 25 जुलाई से शुरू होगा, लेकिन बृहस्पति के 12 जुलाई से वार्धक्य अवस्था में प्रवेश और 15 जुलाई को गुरु अस्त होने के कारण विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्य पहले ही बंद माने जाएंगे. इस अवधि में पूजा, दान और आध्यात्मिक साधना को विशेष महत्व दिया जाता है.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Thursday, July 9, 2026
Chaturmas 2026: हर साल चातुर्मास शुरू होने के साथ विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और अन्य मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है. इस वर्ष चातुर्मास की शुरुआत 25 जुलाई 2026 से हो रही है, लेकिन इस बार एक खास ज्योतिषीय संयोग के कारण शुभ कार्य 12 जुलाई के बाद ही बंद माने जाएंगे. इसकी मुख्य वजह बृहस्पति ग्रह का वार्धक्य अवस्था में प्रवेश और कुछ दिनों बाद गुरु का अस्त होना है. इसलिए यदि कोई मांगलिक कार्य करने की योजना है, तो समय का विशेष ध्यान रखना आवश्यक माना जा रहा है.
12 जुलाई से क्यों नहीं रहेंगे शुभ मुहूर्त?
वैदिक पंचांग के अनुसार 12 जुलाई को सुबह 11 बजकर 11 मिनट से बृहस्पति वार्धक्य अवस्था में प्रवेश करेंगे. ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति को विवाह, संतान, शिक्षा, भाग्य, धर्म और शुभ कार्यों का कारक ग्रह माना गया है. जब यह ग्रह वार्धक्य अवस्था में पहुंचता है, तब इसकी शुभ फल देने की क्षमता पहले की तुलना में कमजोर मानी जाती है. इसी कारण 12 जुलाई के बाद विवाह और अन्य मांगलिक कार्यों से बचने की सलाह दी जाती है.
क्या होती है बृहस्पति की वार्धक्य अवस्था?
वैदिक ज्योतिष में ग्रहों की अलग-अलग अवस्थाओं का वर्णन मिलता है, जैसे बाल्य, कुमार, युवा और वार्धक्य. इन अवस्थाओं के आधार पर ग्रहों की शक्ति और प्रभाव का आकलन किया जाता है. वार्धक्य अवस्था का अर्थ यह नहीं है कि ग्रह अशुभ हो जाता है, बल्कि उसकी सक्रियता और शुभ परिणाम देने की गति कम हो जाती है. जैसे एक वृद्ध व्यक्ति अनुभव से भरपूर होता है लेकिन पहले जैसी ऊर्जा नहीं रहती, उसी प्रकार इस अवस्था में बृहस्पति का प्रभाव अपेक्षाकृत कम माना जाता है.
15 जुलाई को गुरु अस्त, बढ़ेगा प्रभाव
12 जुलाई के बाद 15 जुलाई को शाम 7 बजकर 27 मिनट पर बृहस्पति पश्चिम दिशा में अस्त हो जाएंगे. ज्योतिष के अनुसार जब कोई ग्रह सूर्य के अत्यधिक निकट पहुंच जाता है तो उसका प्रभाव पृथ्वी से कमजोर माना जाता है. इसी स्थिति को गुरु अस्त कहा जाता है. गुरु अस्त रहने के दौरान विवाह, जनेऊ, मुंडन, सगाई और अन्य शुभ संस्कारों को टालने की परंपरा रही है, क्योंकि इस समय शुभ फलों में कमी मानी जाती है.
इस अवधि में किन कार्यों से बचें?
इन कार्यों को टालना बेहतर माना जाता है:
- विवाह, सगाई और अन्य मांगलिक संस्कार.
- गृह प्रवेश और नए व्यवसाय की शुरुआत.
- बड़े आर्थिक निवेश या महत्वपूर्ण फैसले.
- शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े नए प्रयासों में अतिरिक्त सावधानी.
इस समय किन कार्यों को महत्व दें?
- पूजा-पाठ, जप और ध्यान.
- दान-पुण्य और धार्मिक सेवा.
- आध्यात्मिक साधना और सत्संग.
- आत्मचिंतन और सकारात्मक जीवनशैली अपनाना.
हर व्यक्ति पर प्रभाव समान नहीं होता
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार वार्धक्य अवस्था और गुरु अस्त का प्रभाव सभी लोगों पर एक जैसा नहीं होता. किसी भी व्यक्ति के जीवन पर इसका असर उसकी जन्मकुंडली में बृहस्पति की स्थिति, महादशा, अंतर्दशा, गोचर और अन्य ग्रहों के संबंध पर निर्भर करता है. इसलिए महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले योग्य ज्योतिष विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर माना जाता है.
क्या रखें ध्यान?
यदि आप जुलाई में विवाह, गृह प्रवेश या कोई बड़ा शुभ कार्य करने की योजना बना रहे हैं, तो 12 जुलाई से पहले उपलब्ध शुभ मुहूर्तों का उपयोग करना अधिक उचित माना जाता है. वहीं 12 जुलाई के बाद से लेकर चातुर्मास और गुरु अस्त की अवधि में धार्मिक कार्यों, पूजा और आध्यात्मिक साधना पर अधिक ध्यान देना शुभ माना जाता है.
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