Commonwealth Games 2026: जूडो में भारत का गोल्डन डे, 30 मिनट में अस्मिता डे और हर्ष सिंह ने रचा इतिहास
Authored By: Nishant Singh
Published On: Saturday, August 1, 2026
Updated On: Saturday, August 1, 2026
Commonwealth Games 2026: कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत ने जूडो में ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए महज 30 मिनट के भीतर दो स्वर्ण पदक जीते. अस्मिता डे और हर्ष सिंह ने अपने-अपने वर्ग में गोल्ड जीतकर नया इतिहास रचा, जबकि यामिनी मौर्य फाइनल में पहुंचकर कम से कम रजत पदक पहले ही सुनिश्चित कर चुकी हैं.
Authored By: Nishant Singh
Updated On: Saturday, August 1, 2026
Commonwealth Games 2026: कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के जूडो खिलाड़ियों ने ऐसा प्रदर्शन किया, जिसने खेल इतिहास में नया अध्याय जोड़ दिया. महज 30 मिनट के अंतराल में भारत ने दो स्वर्ण पदक जीतकर पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया. सबसे पहले 23 वर्षीय अस्मिता डे ने महिलाओं के 48 किलोग्राम वर्ग में गोल्ड जीतकर देश को गौरवान्वित किया. इसके तुरंत बाद हर्ष सिंह ने पुरुषों के 60 किलोग्राम वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर भारत की खुशी दोगुनी कर दी. वहीं, यामिनी मौर्य भी फाइनल में पहुंच चुकी हैं और उनका कम से कम रजत पदक तय हो गया है.
अस्मिता डे ने खत्म किया 36 साल का इंतजार
महिलाओं के 48 किलोग्राम वर्ग के फाइनल में अस्मिता डे का मुकाबला कनाडा की हेडी क्वाच से हुआ. शुरुआत में वह दबाव में दिखीं और पीछे भी हो गईं, लेकिन उन्होंने शानदार वापसी करते हुए मुकाबले को गोल्डन स्कोर तक पहुंचाया. निर्णायक क्षण में बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए उन्होंने स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया. इसके साथ ही वह कॉमनवेल्थ गेम्स में जूडो का गोल्ड जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बन गईं. 1990 में जूडो को कॉमनवेल्थ गेम्स में शामिल किए जाने के बाद से भारत को इस उपलब्धि का इंतजार था.
हर्ष सिंह ने भी रचा नया कीर्तिमान
अस्मिता की जीत के केवल आधे घंटे बाद हर्ष सिंह ने पुरुषों के 60 किलोग्राम वर्ग में ऑस्ट्रेलिया के अनुभवी खिलाड़ी जोशुआ कैट्ज़ को हराकर स्वर्ण पदक जीता. मुकाबला बेहद रोमांचक रहा और अंत से 41 सेकंड पहले हर्ष ने वाजा-आरी के जरिए बढ़त हासिल कर ली. यही बढ़त उनकी जीत की वजह बनी. वह कॉमनवेल्थ गेम्स में जूडो का स्वर्ण जीतने वाले पहले भारतीय पुरुष खिलाड़ी भी बन गए.
संघर्ष से सफलता तक का सफर
त्रिपुरा के बेलोनिया की रहने वाली अस्मिता डे साधारण परिवार से आती हैं. उनके पिता साइकिल मैकेनिक थे. आर्थिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने मेहनत नहीं छोड़ी. पहले एथलेटिक्स में हाथ आजमाने के बाद उन्होंने जूडो को चुना और लगातार राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन किया. आज उनकी मेहनत ने उन्हें इतिहास के पन्नों में जगह दिला दी है.
अब यामिनी पर देश की नजर
भारत की तीसरी फाइनलिस्ट यामिनी मौर्य भी शानदार प्रदर्शन करते हुए फाइनल में पहुंच चुकी हैं. उनके नाम कम से कम रजत पदक पहले ही सुनिश्चित हो चुका है. अब पूरा देश उनसे एक और स्वर्ण पदक की उम्मीद लगाए बैठा है. अस्मिता डे और हर्ष सिंह की ऐतिहासिक सफलता ने यह साबित कर दिया है कि भारतीय जूडो अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई पहचान बना चुका है.
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