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Mahatma Gandhi Death Anniversary 2026: बिड़ला हाउस, जहां थम गई बापू की सांसें
Authored By: Nishant Singh
Published On: Friday, January 30, 2026
Last Updated On: Friday, January 30, 2026
Mahatma Gandhi Death Anniversary 2026: 30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिड़ला हाउस में महात्मा गांधी की हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया. यही स्थान आज गांधी स्मृति के नाम से जाना जाता है, जहां बापू ने जीवन के अंतिम 144 दिन बिताए थे. निजी निवास से राष्ट्रीय स्मृति बने इस स्थल पर गांधी जी के अंतिम कदम, विभाजन के दर्द और अहिंसा के संदेश की गूंज आज भी महसूस होती है.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Friday, January 30, 2026
Mahatma Gandhi Death Anniversary 2026: 30 जनवरी भारत के इतिहास में सिर्फ़ एक तारीख़ नहीं, बल्कि एक गहरा घाव है. इसी दिन 1948 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की नई दिल्ली के बिड़ला हाउस परिसर में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. हर साल यह दिन शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है. यह तारीख़ हमें सिर्फ़ बापू की याद नहीं दिलाती, बल्कि यह भी चेतावनी देती है कि जब समाज में नफरत, असहिष्णुता और कट्टरता हावी हो जाती है, तो उसका अंत कितना भयावह हो सकता है.
निजी निवास से राष्ट्रीय स्मृति तक
बिड़ला हाउस का निर्माण 1928 में देश के प्रसिद्ध उद्योगपति घनश्यामदास बिड़ला ने कराया था. यह उनका निजी आवास था, जो लगभग सात एकड़ में फैला हुआ था. इस विशाल बंगले में 12 कमरे और हरे-भरे बाग थे. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जी.डी. बिड़ला और महात्मा गांधी के बीच गहरा संबंध था, इसलिए बापू कई बार यहां ठहरते थे. यही घर धीरे-धीरे राजनीतिक और सामाजिक विचार-विमर्श का केंद्र बन गया.
बापू के जीवन के अंतिम 144 दिन
महात्मा गांधी ने अपने जीवन के अंतिम 144 दिन इसी बिड़ला हाउस में बिताए थे. 1947-48 का समय देश के लिए सबसे कठिन दौर था. विभाजन की हिंसा, शरणार्थियों का दर्द और साम्प्रदायिक तनाव हर ओर फैला हुआ था. बापू दिल्ली में रहकर राजनीतिक नेतृत्व और समाज पर नैतिक दबाव बनाना चाहते थे, ताकि शांति और सद्भाव कायम रहे. उनका यह रुख कुछ कट्टरपंथी विचारधाराओं को खटकने लगा.
विभाजन के बाद की उथल-पुथल और गांधी
स्वतंत्रता के बाद महात्मा गांधी सत्ता के केंद्र से दूर रहकर भी देश की अंतरात्मा बने रहे. उन्होंने शांति प्रार्थनाएं कीं, उपवास किए और हिंसा रोकने की लगातार अपील की. दिल्ली में उनका खास जोर इस बात पर था कि बदले की भावना न पनपे और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित हो. लेकिन इसी सोच के चलते उनके खिलाफ़ नफरत और अफवाहों का माहौल बनाया गया, जिसका अंत बेहद दर्दनाक साबित हुआ.
30 जनवरी 1948: जब देश थम गया
30 जनवरी 1948 की शाम बापू रोज़ की तरह प्रार्थना सभा के लिए बिड़ला हाउस के बगीचे की ओर बढ़ रहे थे. चलते-चलते वे लोगों से मिलते जा रहे थे. तभी नाथूराम विनायक गोडसे ने उनके बेहद पास जाकर गोलियां चला दीं. बापू वहीं गिर पड़े. कुछ ही पलों में भारत ने अपने राष्ट्रपिता को खो दिया. यह सिर्फ़ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि अहिंसा और सत्य के विचार पर हमला था.
हत्या के बाद की घटनाएं
गांधी जी की हत्या के बाद पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई. दिल्ली से लेकर दुनिया के कई देशों तक संवेदनाएं प्रकट की गईं. जांच शुरू हुई, साजिश से जुड़े लोगों को पकड़ा गया और मुकदमा चला. 1949 में नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को दोषी ठहराया गया और 15 नवंबर 1949 को फांसी दी गई.
आज की गांधी स्मृति
1971 में सरकार ने बिड़ला हाउस को खरीद लिया और 15 अगस्त 1973 को इसे ‘गांधी स्मृति’ के रूप में जनता को समर्पित किया गया. आज यहां वह मार्ग सुरक्षित है, जहां से बापू अपने अंतिम कदमों के साथ प्रार्थना सभा की ओर गए थे. संग्रहालय में उनके अंतिम दिनों से जुड़ी तस्वीरें, पत्र और वस्तुएं मौजूद हैं.
30 जनवरी की सबसे बड़ी सीख
गांधी स्मृति सिर्फ़ अतीत की याद नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए आईना है. बापू की पुण्यतिथि हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम असहमति को सहन कर पाते हैं. महात्मा गांधी की हत्या बताती है कि नफरत किसी विचार को खत्म नहीं कर सकती, बल्कि समाज को भीतर से घायल कर देती है. 30 जनवरी को बापू को याद करना, उनके मूल्यों को जीने का संकल्प लेने जैसा होना चाहिए, यही उनकी सच्ची श्रद्धांजलि है.
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