मायावती ने ‘आकाश’ को क्यों जमीं पे उतारा
Authored By: अरुण श्रीवास्तव
Published On: Monday, May 13, 2024
Updated On: Wednesday, May 15, 2024
सियासत की जमीन आकाश पर पहुंचाने की ताकत रखती है, लेकिन एक सच यह भी है कि सियासी चौसर पर पासे सही न फेंके गए तो अर्श से फर्श पर पहुंचने में भी समय नहीं लगता है। शायद यही हुआ है, बसपा के कुछ दिनों पूर्व तक उत्तराधिकारी रहे आकाश आनंद के साथ।
Authored By: अरुण श्रीवास्तव
Updated On: Wednesday, May 15, 2024
सियासतदानों की उम्र पर अक्सर बहस होती है। युवाओं को मौका देने की बातें भी सुर्खियां बटोरती है। पर अनुभव की भट्ठी में तुपे राजनेता के सामने युवा नेताओं का टिक पाना बहुत सुगम नहीं होता। बहुजन समाज पार्टी से जुड़ा ताजा घटनाक्रम सियासी गलियारों की इसी कहानी को बय़ां करता है।
अचानक अपनी भाषणशैली और हावभाव से लोकप्रियता के आकाश पर पहुंचे निवर्तमान बसपा सुप्रीमो आकाश आनंद फिलहाल जमीं पर पहुंच चुके हैं। बुआ मायावती ने अपने छोटे भाई को बेटे को महज पांच माह में ही सियासी उत्तराधिकारी के पद से हटा दिया है। बसपा के राष्ट्रीय संयोजक की जिम्मेदारी भी वापस ले ली है। क्रिकेट की भाषा पर कहें तो टीम में तो रखा है, लेकिन बेंच पर बैठा दिया है।
मायावती की राजनीति भी इसी प्रकार की है। जरा सी भी मन के विपरीत बात उन्हें बर्दाश्त नहीं है। जब वह यूपी की सीएम थीं तो राज्य की जनता उनकी सख्त प्रशासक की छवि से बहुत खुश थी। नेताओं को अपनी अंगुलियों पर नचाने वाले वरिष्ठ से वरिष्ठ नौकरशाह भी मायावती के सख्त रवैये से कांपते थे। इसके एक-दो नहीं, दर्जनों उदाहरण हैं।
बीते कुछ वर्षों से मायावती राजनीतिक रूप से ग्राउंड पर बहुत सक्रिय नहीं हैं। बीते दिसंबर उन्होंने जब छोटे भाई आनंद के बेटे आकाश को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया तो सियासी हलकों में चर्चा तेज हो गई कि अब बहन जी बसपा की कमान युवा हाथों को सौंपने जा रही हैं। उनकी कम सक्रियता से भी इन कयासों को बल मिला था। जब इस लोकसभा चुनाव में आकाश आनंद ने यूपी के नगीना से अपने असल राजनीतिक जीवन का आगाज किया तो बड़े चुनावी पंडित भी उन्हें बसपा की अगली पीढ़ी मानकर निश्चिंत हो चले थे, लेकिन सिसायत तो सियासत है। वह भला कहां एक स्थान पर टिकती है। यहां भी नहीं टिकी।
आकाश बोले और खूब बोले। लोगों ने तालियां पीटीं, अखबारों ने सुर्खियां बनाईं और टीवी ने हेडलाइंस, लेकिन इन सबसे दूर कोई था, जिसे आकाश का यह बेबाक अंदाज भा नहीं रहा था। नगीना में पहली ही जनसभा में जिस अंदाज में आकाश ने बहुजन राजनीति के एक और बड़े नाम आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद उर्फ रावण पर तीखा हमला बोला, वह बहन जी को रास नहीं आया।
सियासी नुकसान का अंदेथा था, फिर भी भतीजे की पहली गलती पर बुआजी खामोश रहीं। हो सकता है कि आकाश तक कुछ संकेत पहुंचें हों, लेकिन युवा खून युवा ही होता है। लेकिन राजनीति तो जोश से अधिक होश का खेल है। सीतापुर में तो आकाश आनंद ने राजनीति के एक्सप्रेसवे पर शब्दों का एक्सीलरेटर कुछ ज्यादा ही दबा दिया। भाजपा को उन्होंने आतंकवादियों की पार्टी बता दिया। अब शायद मायावती के सब्र का बांध टूट चुका था। अचानक आकाश की जनसभाएं बंद हो गईं। उन्हें दिल्ली भेज दिया गया और सप्ताह भीतर ही उत्तराधिकारी का ताज भी ले लिया गया।
अब राजनीतिक विश्लेषकों के बीच सुगबुगाहट इस बात की है कि बसपा की आगे की रणनीति क्या होगी। क्या आकाश की वापसी होगी। क्योंकि मायावती ने अपनी ‘एक्स’ पोस्ट में कहा कि अभी उनमें परिपक्वता की कमी है। तो क्या अनुभव होने के बाद भतीजे के हाथ फिर से बसपा की बागडोर होगी या नया वारिस सामने आएगा? सब जानते हैं कि बसपा में बीते दो दशक से मायावती की ही चल रही है और चलेगी भी। जाहिर है कि बड़ा सवाल बना हुआ है कि यूपी की राजनीति को सीधे-सीधे प्रभावित करने वाली बहन जी की पार्टी का चेहरा भविष्य में कौन होगा? कांशीराम से मायावती तक आई बसपा आगे राजनीति के आकाश में कहां तक और कितना ऊंचा सफर तय करेगी, इस समय तो सियासत के मैदान में इसी की चर्चा है।
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