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बिहार में स्वास्थ्य मंत्रालय पर नेतापुत्रों का कब्जा? तेज प्रताप के बाद निशांत की एंट्री से सियासत गरमाई
Authored By: Nishant Singh
Published On: Friday, May 8, 2026
Last Updated On: Friday, May 8, 2026
बिहार में स्वास्थ्य मंत्रालय को लेकर नई बहस छिड़ गई है. तेज प्रताप यादव के बाद अब निशांत कुमार को यह जिम्मेदारी मिली है, जिससे परिवारवाद बनाम योग्यता का सवाल उठ रहा है. बिना अनुभव के इतनी बड़ी जिम्मेदारी मिलने पर सबकी नजरें उनके प्रदर्शन पर टिकी हैं.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Friday, May 8, 2026
Bihar Health Ministry Political Controversy: बिहार की सियासत में स्वास्थ्य मंत्रालय हमेशा से एक संवेदनशील और चर्चित विभाग रहा है, लेकिन इस बार मामला कुछ अलग है. सम्राट सरकार के हालिया मंत्रिमंडल विस्तार में 32 मंत्रियों ने शपथ ली, जिसमें निशांत कुमार का नाम सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा. पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे को सीधे स्वास्थ्य मंत्री बनाया जाना कई सवाल खड़े कर रहा है. खास बात यह है कि इस पद से अनुभवी नेता मंगल पांडेय को हटाकर निशांत को मौका दिया गया, जिससे यह बहस तेज हो गई कि क्या यह फैसला अनुभव से ज्यादा परिवार को प्राथमिकता देने वाला है.
तेजप्रताप से शुरू हुई ‘नेतापुत्र राजनीति’ की कहानी
अगर पीछे देखें तो यह सिलसिला नया नहीं है. इसकी शुरुआत तेज प्रताप यादव के समय से मानी जाती है, जब 2015 में महागठबंधन सरकार बनी थी. लालू प्रसाद यादव के बेटे तेज प्रताप को सीधे स्वास्थ्य मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई थी, जबकि उनके पास प्रशासनिक अनुभव नहीं था. उनके कार्यकाल में कई विवाद भी सामने आए, जैसे डॉक्टरों की ड्यूटी को लेकर उठा मामला. उस समय भी विपक्ष ने इसे परिवारवाद का उदाहरण बताया था. अब निशांत कुमार की एंट्री के बाद वही बहस फिर से जीवित हो गई है.
बिना अनुभव के बड़ी जिम्मेदारी, सवालों का दौर
निशांत कुमार अब तक सक्रिय राजनीति से दूर थे और हाल ही में उन्होंने पार्टी की सदस्यता ली है. वह न तो विधायक हैं और न ही किसी सदन के सदस्य, फिर भी उन्हें सीधे स्वास्थ्य जैसे अहम विभाग की कमान सौंप दी गई. यह विभाग सीधे जनता से जुड़ा होता है, जहां छोटी गलती भी बड़े असर डाल सकती है. ऐसे में राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह फैसला एक सोचा-समझा प्रयोग है या फिर राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने की रणनीति.
स्वास्थ्य मंत्रालय: मौका या चुनौती?
बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति किसी से छिपी नहीं है. बेहतर इलाज के लिए लोगों को अक्सर दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ता है. ऐसे में स्वास्थ्य मंत्रालय किसी भी नेता के लिए खुद को साबित करने का सबसे बड़ा मंच बन सकता है. अगर सुधार होता है तो नेता की छवि मजबूत बनती है, लेकिन नाकामी सीधे आलोचना में बदल जाती है. अब नजरें निशांत कुमार पर टिकी हैं कि वह इस जिम्मेदारी को कैसे निभाते हैं. यह देखना दिलचस्प होगा कि यह फैसला बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था को नई दिशा देगा या फिर इसे सिर्फ एक और राजनीतिक प्रयोग माना जाएगा.
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