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Ship Fuel: बड़े जहाजों में कौन सा ईंधन होता है इस्तेमाल, जानें पेट्रोल-डीजल से कितना अलग है यह फ्यूल
Authored By: Nishant Singh
Published On: Saturday, March 14, 2026
Last Updated On: Saturday, March 14, 2026
Ship Fuel: बड़े समुद्री जहाज आमतौर पर हैवी फ्यूल ऑयल या बंकर फ्यूल से चलते हैं, जो कच्चे तेल की रिफाइनिंग के बाद बचा गाढ़ा अवशेष होता है. यह पेट्रोल-डीजल से काफी भारी होता है और इस्तेमाल से पहले इसे गर्म व शुद्ध किया जाता है. पर्यावरण कारणों से अब कम सल्फर वाले ईंधन के नियम भी लागू हैं.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Saturday, March 14, 2026
Ship Fuel: दुनिया भर में होने वाला बड़ा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय व्यापार समुद्री रास्तों के जरिए ही पूरा होता है. हाल के समय में मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और कुछ व्यापारिक जहाजों पर हमलों की खबरों ने वैश्विक शिपिंग मार्गों की अहमियत को और उजागर कर दिया है. बताया जाता है कि क्षेत्रीय टकराव के माहौल में कई मालवाहक जहाजों को नुकसान भी पहुंचा है. ऐसे हालात में यह सवाल भी उठता है कि इतने विशाल जहाजों को चलाने के लिए आखिर किस तरह के ईंधन का उपयोग किया जाता है. दरअसल बड़े जहाजों में इस्तेमाल होने वाला फ्यूल आम पेट्रोल या डीजल से काफी अलग होता है और इसकी प्रकृति भी ज्यादा भारी होती है.
बड़े समुद्री जहाजों में कौन सा फ्यूल चलता है
अधिकतर बड़े कार्गो जहाजों में हैवी फ्यूल ऑयल का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे समुद्री भाषा में बंकर फ्यूल भी कहा जाता है. यह कच्चे तेल की रिफाइनिंग के बाद बचने वाला सबसे भारी और गाढ़ा हिस्सा होता है. जब किसी रिफाइनरी में क्रूड ऑयल को प्रोसेस किया जाता है तो सबसे पहले पेट्रोल, डीजल और विमानन ईंधन जैसे हल्के उत्पाद अलग कर लिए जाते हैं. इसके बाद जो मोटा और गाढ़ा अवशेष बचता है, उसे प्रोसेस करके हैवी फ्यूल ऑयल बनाया जाता है. बड़े जहाजों के शक्तिशाली इंजनों के लिए यह ईंधन उपयुक्त माना जाता है.
पेट्रोल और डीजल से किस तरह अलग है यह ईंधन
हैवी फ्यूल ऑयल और सामान्य ईंधनों के बीच सबसे बड़ा फर्क उनकी गाढ़ेपन यानी विस्कोसिटी में होता है. पेट्रोल और डीजल हल्के तरल पदार्थ होते हैं जो सामान्य तापमान पर आसानी से बहते रहते हैं. इसके विपरीत जहाजों में इस्तेमाल होने वाला यह फ्यूल काफी मोटा और चिपचिपा होता है, जो कई बार डामर जैसा दिखाई देता है. इसी कारण इसे सीधे इंजन में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. जहाजों के टैंकों में इसे लगभग 100 से 120 डिग्री सेल्सियस तक गर्म किया जाता है, जिससे यह पतला होकर इंजन तक आसानी से पहुंच सके.
इंजन में जाने से पहले होती है सफाई
इस भारी ईंधन में कई बार पानी, धूल, रेत और धातु के छोटे कण भी मौजूद रहते हैं. अगर इन्हें हटाया न जाए तो जहाज के इंजन को नुकसान हो सकता है. इसलिए जहाजों में ईंधन को इस्तेमाल करने से पहले साफ करने की प्रक्रिया अपनाई जाती है. इसके लिए सेंट्रीफ्यूज और प्यूरीफायर जैसी विशेष मशीनों का सहारा लिया जाता है. ये मशीनें ईंधन में मौजूद अशुद्धियों को अलग कर देती हैं, जिससे इंजन बेहतर तरीके से काम कर सके.
पर्यावरण को लेकर बढ़े सख्त नियम
भारी ईंधन तेल के इस्तेमाल से पर्यावरण पर भी असर पड़ता है, क्योंकि इसमें सल्फर की मात्रा ज्यादा होती है. पहले बंकर फ्यूल में लगभग 3.5 प्रतिशत तक सल्फर पाया जाता था, जिससे जहाजों से निकलने वाला धुआं वायु प्रदूषण को बढ़ाता था. इसी समस्या को कम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नए नियम लागू किए गए. इन नियमों के तहत अब जहाजों को कम सल्फर वाला ईंधन इस्तेमाल करना जरूरी है, जिसमें सल्फर की मात्रा अधिकतम 0.5 प्रतिशत तक ही रखी गई है. इसका मकसद समुद्री परिवहन से होने वाले प्रदूषण को कम करना है.
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