Losing a Pet Has Mental Impact on Pet Parents: पालतू जानवरों को खोने का मानसिक स्वास्थ्य पर होता गहरा असर
Authored By: अंशु सिंह
Published On: Friday, October 31, 2025
Updated On: Friday, October 31, 2025
भारत में पालतू जानवरों का पालन-पोषण शहरी मध्यवर्ग और नई पीढ़ी के बीच काफी लोकप्रिय हो रहा है. आज पालतू जानवरों को न केवल साथी, बल्कि परिवार के अभिन्न सदस्य के रूप में भी देखा जाता है. उनरे स्वास्थ्य, विशेष आहार, विलासिता और यहां तक कि सामाजिक समारोहों में शामिल करने को लेकर भी खास ध्यान रखा जाता है. रिसर्च कहते हैं कि पालतू जानवरों से लगाव मेंटल हेल्थ के लिए भी अच्छा है. लेकिन जब वे बिछड़ जाते हैं या उनकी मौत हो जाती है, तो उस गम से उबरना मुश्किल हो जाता है. ऐसी स्थिति में खुद को संभालना जरूरी है.
Authored By: अंशु सिंह
Updated On: Friday, October 31, 2025
Pet Loss Mystery: महानगरों और छोटे शहरों में पालतू जानवर युवा पेशेवरों और परिवारों के लिए संगति, तनाव मुक्ति और यहां तक कि पहचान का जरिया बन गए हैं. लैब्राडोर की जन्मदिन पार्टियों से लेकर फारसी बिल्लियों के इंस्टाग्राम अकाउंट तक, पालतू जानवरों की संस्कृति न सिर्फ बढ़ रही है, बल्कि उसका जश्न भी मनाया जा रहा है. इस प्रकार के स्नेह ने स्वाभाविक रूप से पालतू जानवरों के लिए बेहतर भोजन, बेहतर स्वास्थ्य सेवा और अधिक आरामदायक अनुभवों की मांग को जन्म दिया है. पालतू कुत्तों और बिल्लियों को आज परिवार के सदस्यों के रूप में देखा जा रहा है.
मिलेनियल एवं जेन जी पीढ़ी में पेट पैरेंटिंग का बढ़ता ट्रेंड (New Pet Parents)
पालतू जानवरों के पैरेंट्स की भूमिका निभाने में विशेष रूप से मिलेनियल पीढ़ी और जेन जी आगे है. कई लोग बढ़ते जीवन-यापन के खर्च, पर्यावरण संबंधी चिंताओं और बदलती जीवनशैली प्राथमिकताओं जैसे कारकों से प्रभावित होकर बच्चे पैदा करने के बजाय पालतू जानवरों को पालना पसंद कर रहे हैं. यह पीढ़ी न केवल उच्च दरों पर पालतू जानवरों को अपना रही है, बल्कि अपने पालतू जानवरों की सर्वोत्तम देखभाल सुनिश्चित करने के लिए प्रीमियम उत्पादों और सेवाओं में भी निवेश कर रही है. आंकड़े बताते हैं कि भारत में पालतू जानवरों के पालन-पोषण संबंधी उत्पाद और सेवाओं पर प्रतिवर्ष लगभग 50,000 रुपये से 1.5 लाख रुपये तक खर्च किए जा रहे हैं. जेनरेशन जी भी पालतू जानवरों के पालन-पोषण में योगदान दे रही है. देश में इस पीढ़ी के 70% पेट पैरेंट्स पालतू जानवरों के पालन-पोषण के मामले में अग्रणी हैं. ये पालतू जानवरों को परिवार का अभिन्न अंग मानते हैं. इसलिए उनके गोद लेने की दर में भी बढ़ोत्तरी हुई है. विशेष रूप से एकल परिवारों वाले शहरी क्षेत्रों में इस प्रवृत्ति को बढ़ावा मिल रहा है.
जब छूट जाए पालतू जानवरों का साथ (Loss of a pet animal)
कुत्ते और बिल्लियों जैसे पालतू जानवर इंसान से भावनात्मक रूप से गहराई से जुड़ सकते हैं. ब्रिटिश मनोवैज्ञानिक जॉन बॉल्बी द्वारा विकसित लगाव सिद्धांत बताता है कि मनुष्य स्वाभाविक रूप से घनिष्ठ संबंधों के साथ मजबूत बंधन बनाते हैं, खासकर उन रिश्तों के साथ जो साथ और आराम प्रदान करते हैं. पालतू जानवर, खासकर कुत्ते अपनी वफादारी, स्नेह और बिना शर्त प्यार के लिए जाने जाते हैं. ये गुण उन्हें एक आदर्श साथी बनाते हैं. जब कोई पालतू जानवर परिवार का सदस्य बन जाता है, तो वह अक्सर एक विश्वासपात्र, आराम का स्रोत और कभी-कभी एक प्राथमिक सहारा होता है. ऐसे में किसी पालतू जानवर की मृत्यु पर भी दुःख की वही प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं, जैसा किसी प्रियजन को खोने के बाद होती हैं, क्योंकि भावनात्मक लगाव काफी हद तक समान होता है. उसके चले जाने पर एक खालीपन आ जाता है.
हॉर्मोनल बदलाव होने से मानसिक स्वास्थ्य पर असर (Hormonal change can have impact on mental health)
पेट केयर एक्सपर्ट अक्षय महेंद्रू कहते हैं कि जैसा कि सभी जानते हैं कि ऑक्सिटोसिन एक ‘बंधन हार्मोन’ है. यह रिश्ते बनाने और लगाव की भावनाओं को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. जब कोई अपने पालतू जानवर के साथ समय बिताता है, चाहे उसे गले लगाना, खेलना हो या बस एक-दूसरे की उपस्थिति में रहना हो, उससे मस्तिष्क में ऑक्सिटोसिन रिलीज होता है, जिससे भावनात्मक बंधन मजबूत होते हैं. ऐसे में जब किसी के पालतू जानवर की मृत्यु हो जाती है, तो ऑक्सिटोसिन का निकलना अचानक बंद हो जाने से भावनात्मक दर्द पैदा करता है. इससे उदासी, अवसाद होने का खतरा रहता है. इसके अलावा, किसी पालतू जानवर को खोने से शरीर में कोर्टिसोल का स्तर बढ़ सकता है, जो अंतत: चिंता, तनाव और चिड़चिड़ेपन को बढ़ाता है. यही कारण है कि पालतू जानवर के खोने के बाद शोक अक्सर शारीरिक रूप से थका देने वाला महसूस हो सकता है. नींद, खान-पान और समग्र मनोदशा पर असर पड़ता है. मैसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल (एमजीएच) के शोधकर्ताओं की एक स्टडी के अनुसार, पालतू जानवर की मौत से बच्चों में लंबे समय तक गहरा प्रभाव पड़ता है. वे दुखी रहने लगते हैं, जो अंतत: मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं भी पैदा कर सकती है. अनुसंधानों से इसकी भी पुष्टि होती है कि अधिकांश लोगों के लिए उनके पालतू कुत्ते का जाना किसी प्रियजन को खोने के बराबर होता है. एक अन्य स्टडी कहती है कि किसी पालतू जानवर को खोने के बाद तीव्र दुःख के लक्षण एक से दो महीने तक रह सकते हैं. कुछ में यह पूरे एक वर्ष तक (औसतन) बना रह सकता है.
पालतू जानवरों को खोने के गम से उबरें (Coping the loss of a pet animal) :
किसी पालतू जानवर को हमेशा के लिए खोने का अनुभव हर किसी के लिए अलग हो सकता है. हर कोई अपने तरीके से प्रतिक्रिया देता है. ये अनुभव अक्सर आपकी उम्र और व्यक्तित्व, आपके पालतू जानवर की उम्र और उनकी मृत्यु की परिस्थितियों जैसे कारकों पर निर्भर करती है.
- लोगों से बात करें (talk to people): अगर आपके किसी दोस्त या परिवार के सदस्य ने अपने पालतू जानवर को खोया है, तो ऐसे व्यक्ति की खोज करें. वे आपके दुख को समझेंगे और सहानुभूति रखेंगे.
- अंतिम संस्कार करें (Perform last rites): आप अगर अपने मृत पालतू पशु का अंतिम संस्कार करते हैं, तो आपको और आपके परिवार को अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त करने में मदद मिलती है. उन लोगों को नज़रअंदाज करें जो सोचते हैं कि किसी पालतू जानवर का अंतिम संस्कार करना अनुचित है. वही करें जो आपको सही लगे।
- अपनी सेहत का ख्याल रखें (take care of yourself): किसी पालतू जानवर को खोने का तनाव आपकी एनर्जी एवं इमोशंस को प्रभावित कर सकता है. लेकिन अगर अपनी शारीरिक एवं भावनात्मक जरूरतों का ध्यान रखते हैं, तो इस मुश्किल समय से निपटने में मदद मिलेगी. उन लोगों के साथ समय बिताएं, जो आपकी परवाह करते हैं। न्यूट्रिशन युक्त डाइट, भरपूर नींद लें और मूड को बेहतर बनाने के लिए नियमित एक्सरसाइज करें.
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