तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने विजय, लेकिन गठबंधन की बैसाखियों पर कब तक टिक पाएगी उनकी नई सरकार?
Authored By: Nishant Singh
Published On: Monday, May 11, 2026
Updated On: Monday, May 11, 2026
Vijay CM of Tamil Nadu: तमिलनाडु में अभिनेता से नेता बने सी. जोसेफ विजय मुख्यमंत्री तो बन गए, लेकिन उनकी गठबंधन सरकार कई राजनीतिक चुनौतियों से घिरी है. कांग्रेस और वाम दलों के समर्थन पर टिकी इस सरकार को DMK और AIADMK लगातार घेरने की तैयारी में हैं. अब सबकी नजर विजय की राजनीतिक समझ और सरकार बचाने की रणनीति पर है.
Authored By: Nishant Singh
Updated On: Monday, May 11, 2026
Vijay CM of Tamil Nadu: दक्षिण भारत की राजनीति में तमिलनाडु हमेशा से अलग पहचान रखता रहा है. यहां दशकों तक सत्ता का खेल दो द्रविड़ दलों DMK और AIADMK के बीच घूमता रहा. लेकिन साल 2026 में तस्वीर पूरी तरह बदल गई. फिल्मी दुनिया के सुपरस्टार और राजनीति में नए खिलाड़ी सी. जोसेफ विजय ने अपनी पार्टी टीवीके के दम पर सत्ता की कुर्सी हासिल कर ली. अभिनेता से नेता बने विजय ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर यह साबित कर दिया कि तमिलनाडु की जनता अब बदलाव चाहती है. हालांकि, असली सवाल अब यह है कि क्या विजय इस सत्ता को लंबे समय तक संभाल पाएंगे या फिर उनकी सरकार राजनीतिक दबावों के बीच डगमगा जाएगी?
चुनाव जीते, लेकिन बहुमत से रह गए दूर
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनकर जरूर उभरी, लेकिन बहुमत के जादुई आंकड़े से पीछे रह गई. विजय की पार्टी को 108 सीटें मिलीं, जबकि सरकार बनाने के लिए 118 सीटों की जरूरत थी. यही वजह रही कि उन्हें कांग्रेस, लेफ्ट पार्टियों, वीसीके और IUML जैसे दलों का सहारा लेना पड़ा. सरकार बनाने की प्रक्रिया भी आसान नहीं रही. राज्यपाल ने बहुमत पूरा न होने का हवाला देकर विजय के दावे को तीन बार ठुकरा दिया. इसके बाद सहयोगी दलों ने खुलकर समर्थन दिया और आखिरकार विजय मुख्यमंत्री बन गए. लेकिन शुरुआत से ही बैसाखी के सहारे बनी यह सरकार राजनीतिक अस्थिरता के संकेत भी दे रही है.
शपथ लेते ही एक्शन मोड में दिखे विजय
मुख्यमंत्री बनते ही विजय ने यह संदेश देने की कोशिश की कि उनकी सरकार सिर्फ चेहरों की नहीं बल्कि फैसलों की सरकार होगी. शपथ ग्रहण मंच से ही उन्होंने तीन बड़े फैसलों पर हस्ताक्षर कर दिए. पहला फैसला था हर घर को 200 यूनिट मुफ्त बिजली देने का. दूसरा फैसला नशे के खिलाफ हर जिले में विशेष बल बनाने का और तीसरा महिलाओं की सुरक्षा के लिए स्पेशल टास्क फोर्स बनाने का. इन फैसलों के जरिए विजय ने सीधे आम जनता, महिलाओं और युवाओं को साधने की कोशिश की. इसके बाद उन्होंने सचिवालय जाकर कामकाज शुरू किया और पेरियार स्मारक पहुंचकर श्रद्धांजलि भी दी. यह सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं थी, बल्कि द्रविड़ राजनीति को सम्मान देने का राजनीतिक संदेश भी था.
राहुल गांधी के साथ बढ़ती नजदीकी का मतलब
विजय के शपथ ग्रहण समारोह में कांग्रेस नेता राहुल गांधी की मौजूदगी ने राष्ट्रीय राजनीति में भी हलचल पैदा कर दी. मंच से विजय ने राहुल गांधी को “भाई” कहकर संबोधित किया. यह साफ संकेत था कि विजय खुद को बीजेपी विरोधी राजनीति के बड़े चेहरे के रूप में स्थापित करना चाहते हैं. तमिलनाडु में बीजेपी की पकड़ अभी सीमित मानी जाती है और विजय इसी भावना को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं. कांग्रेस और वाम दलों के साथ नजदीकी बनाकर वह खुद को राष्ट्रीय विपक्षी राजनीति के करीब ले जा रहे हैं. लेकिन यही रणनीति भविष्य में उनके लिए मुश्किल भी बन सकती है, क्योंकि सहयोगी दल अपनी शर्तों पर राजनीति करना जानते हैं.
गठबंधन सरकार की सबसे बड़ी चुनौती
विजय की सबसे बड़ी समस्या यही है कि उनकी पार्टी में ज्यादातर विधायक पहली बार चुनाव जीतकर आए हैं. खुद विजय भी राजनीति में नए हैं. दूसरी ओर उनके सहयोगी दलों के नेता दशकों से राजनीति कर रहे हैं. ऐसे में सरकार चलाने के दौरान अनुभव की कमी टीवीके पर भारी पड़ सकती है. गठबंधन सरकारों में अक्सर मंत्रालय, योजनाओं और फैसलों को लेकर दबाव बनता है. कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियां समर्थन के बदले अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं को लागू करवाने की कोशिश करेंगी. यदि विजय हर फैसले में सख्ती दिखाते हैं तो सहयोगी दल नाराज हो सकते हैं और यदि ज्यादा समझौता करते हैं तो उनकी मजबूत नेता वाली छवि कमजोर पड़ सकती है.
विजय ने क्यों कहा – सत्ता का केंद्र सिर्फ मैं
शपथ ग्रहण समारोह के दौरान विजय ने अपने भाषण में साफ कहा कि सरकार के भीतर सत्ता का केंद्र सिर्फ वही होंगे. उन्होंने दो टूक शब्दों में संकेत दिया कि बिना उनकी जानकारी कोई फैसला नहीं होगा. यह बयान सिर्फ प्रशासनिक नियंत्रण दिखाने के लिए नहीं था, बल्कि गठबंधन सहयोगियों को संदेश देने के लिए भी था कि टीवीके की सरकार में अंतिम फैसला विजय का ही चलेगा. उन्होंने यह भी कहा कि सरकार की सफलता का श्रेय भी वही लेंगे और असफलता की जिम्मेदारी भी उन्हीं की होगी. इस बयान ने साफ कर दिया कि विजय खुद को कमजोर मुख्यमंत्री के रूप में पेश नहीं करना चाहते.
DMK अभी भी सबसे बड़ा खतरा
भले ही DMK सत्ता से बाहर हो गई हो, लेकिन तमिलनाडु की राजनीति में उसका प्रभाव अभी भी बेहद मजबूत है. एमके स्टालिन और उनकी पार्टी का संगठन आज भी राज्य के गांव-गांव तक फैला हुआ है. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि DMK पर्दे के पीछे लगातार सक्रिय रहेगी. कांग्रेस और लेफ्ट दल वर्षों तक DMK के सहयोगी रहे हैं. ऐसे में यदि भविष्य में राजनीतिक समीकरण बदलते हैं, तो यही सहयोगी दल कभी भी पाला बदल सकते हैं. सबसे बड़ा खतरा यही है कि विजय की सरकार बहुमत के बहुत छोटे अंतर पर टिकी है. कुछ विधायकों की नाराजगी भी सरकार को संकट में डाल सकती है.
AIADMK भी नहीं चाहेगी विजय की लंबी पारी
सिर्फ DMK ही नहीं, बल्कि AIADMK भी नहीं चाहेगी कि विजय लंबे समय तक सत्ता में बने रहें. विजय ने सीधे तौर पर दोनों पारंपरिक द्रविड़ दलों की राजनीति को चुनौती दी है. ऐसे में आने वाले महीनों में तमिलनाडु की राजनीति में लगातार सियासी शतरंज देखने को मिल सकती है. विपक्ष सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ेगा. यदि जनता के बीच किए गए वादे समय पर पूरे नहीं हुए, तो विजय की लोकप्रियता पर भी असर पड़ सकता है. फिल्मी स्टारडम चुनाव जिताने में मदद कर सकता है, लेकिन सरकार चलाने के लिए राजनीतिक संतुलन और प्रशासनिक अनुभव जरूरी होता है.
क्या थलपति पूरी पारी खेल पाएंगे?
विजय ने मुख्यमंत्री बनकर इतिहास जरूर रच दिया है, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू हुई है. जनता ने उन्हें बदलाव की उम्मीद के साथ चुना है. अगर वह गठबंधन को संभालने, वादों को पूरा करने और विपक्ष के हमलों का जवाब देने में सफल रहते हैं, तो तमिलनाडु की राजनीति में नया अध्याय लिख सकते हैं. लेकिन अगर सहयोगी दलों का दबाव बढ़ा, राजनीतिक अस्थिरता आई या प्रशासनिक अनुभव की कमी सामने आई, तो उनकी सरकार ज्यादा लंबी नहीं चल पाएगी. फिलहाल तमिलनाडु की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है क्या ‘थलपति’ विजय सिर्फ जनता के हीरो बनकर रह जाएंगे, या फिर एक मजबूत और लंबे समय तक टिकने वाले मुख्यमंत्री भी साबित होंगे?
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