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मृत्यु का देवता और धर्म के संरक्षक, ज्ञान के प्रतीक: कौन हैं यमराज?
Authored By: Nishant Singh
Published On: Friday, October 24, 2025
Last Updated On: Friday, October 24, 2025
जीवन और मृत्यु के बीच का रहस्य हमेशा से मानव के मन में जिज्ञासा जगाता रहा है. भारतीय सनातनी परंपरा में इसे नकारात्मक नहीं, बल्कि धर्म और ज्ञान का प्रतीक माना गया है. यमराज, मृत आत्माओं के मार्गदर्शक और धर्म के संरक्षक, न्याय और कर्म के नियमों का पालन कर सभी को सही मार्ग दिखाते हैं. वे सूर्यदेव के पुत्र और चित्रगुप्त के मार्गदर्शन में कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं. नचिकेता, सावित्री जैसी कथाओं में उनका ज्ञान और न्याय दिखता है, जो मानव जीवन और मृत्यु के गूढ़ रहस्यों को समझाता है.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Friday, October 24, 2025
Who is Yamraj: भारतीय सनातनी परंपरा में मृत्यु को जीवन का एक अनिवार्य और सकारात्मक हिस्सा माना गया है. यमराज को सिर्फ मृत्यु का देवता नहीं, बल्कि धर्म और न्याय का प्रतीक भी माना जाता है. पुराणों और वेदों में उन्हें मृत आत्माओं के मार्गदर्शक और धर्म के संरक्षक के रूप में वर्णित किया गया है. सनातन दृष्टिकोण में मृत्यु को नकारात्मक नहीं, बल्कि जीवन की अनिवार्यता के रूप में देखा जाता है. इसलिए यमराज को भय का नहीं, धर्म का प्रतीक माना जाता है.
धर्मराज यम: न्याय और कठोरता का संगम
यमराज का स्वरूप भयानक जरूर है, लेकिन यह भय उत्पन्न करने वाला नहीं है. वे धर्म के अटल संरक्षक हैं. पुराणों में उन्हें हरिश्चंद्र, विदुर और युधिष्ठिर जैसे धर्मनिष्ठ पात्रों में भी दिखाया गया है. यमराज हर जीव के कर्मों के अनुसार निर्णय लेते हैं और न्याय में कभी भेदभाव नहीं करते. यही वजह है कि उन्हें “धर्मराज” के नाम से जाना जाता है.
वेदों में विवस्वान यम
ऋग्वेद में यम को विवस्वान यम कहा गया है, जो सूर्यदेव के पुत्र हैं. ऋग्वेद के दशम मंडल के 14वें सूक्त यमसूक्त में कहा गया है कि यम मृत आत्माओं को श्मशान से निकालकर उन्हें उत्तम लोक प्रदान करते हैं. वे सभी कर्मों का ज्ञान रखते हैं और धर्म के मार्ग पर चलने वालों को सही दिशा दिखाते हैं. इस प्रकार यम के मार्ग को कोई भी नहीं बदल सकता; हर आत्मा अपने पूर्वजों के मार्ग और कर्मों के अनुसार यमलोक पहुंचती है.
पुराणों में यम के विभिन्न रूप
यम अपने कर्तव्य में अडिग रहते हैं. जीवन का चक्र समाप्त होने पर वे सभी के प्राण समान रूप से ग्रहण करते हैं. इसी कारण से पुराणों में हरिश्चंद्र, युधिष्ठिर और विदुर जैसे पात्रों को यम का अवतार माना गया. धर्म और सत्य के मार्ग पर चलने वालों को न्याय और सुरक्षा प्रदान करना ही यमराज का मुख्य कार्य है.
सूर्यदेव के पुत्र के रूप में जन्म
भागवत पुराण के अनुसार, यम सूर्यदेव और संध्या के पुत्र हैं. संध्या सूर्य के तेज को सहन नहीं कर पाईं और यम और यमी के जन्म के बाद अपनी छाया से शनि और ताप्ती को जन्म दिया. इस प्रकार यमचारित्र चारों ओर फैले जीवन और मृत्यु के चक्र का प्रतिनिधित्व करते हैं.
कठोपनिषद में नचिकेता के गुरु
कठोपनिषद में यम को ज्ञान और सत्य का प्रतीक माना गया है. नचिकेता की कथा में यम ने उसे जीवन के रहस्य और मृत्यु के बाद की वास्तविकताओं का ज्ञान दिया. यम का भयंकर रूप केवल एक दिखावा है; वे शांतचित्त और ज्ञानवान हैं. यही कारण है कि उन्हें आध्यात्मिक शिक्षक और आत्मा मार्गदर्शक माना जाता है.
सावित्री और सत्यवान की कथा
सावित्री ने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस लाए. इस कथा से स्पष्ट होता है कि यम अपने कर्तव्य में न्यायप्रिय हैं, लेकिन श्रद्धा और धर्म के मार्ग पर चलने वाले को वरदान भी देते हैं.
यमराज के सहयोगी: चित्रगुप्त
यमराज के साथ उनके सहयोगी चित्रगुप्त रहते हैं. चित्रगुप्त हर व्यक्ति के कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं. वे शांतचित्त और न्यायप्रिय हैं. दिवाली के पांचवे दिन यमद्वितीया और चित्रगुप्त पूजा का आयोजन किया जाता है, खासकर बंगाल, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में.
इस प्रकार, यमराज सिर्फ मृत्यु के देवता नहीं, बल्कि ज्ञान, धर्म और न्याय के प्रतीक हैं. वे मानव जीवन और कर्म के महत्व को समझने का मार्गदर्शन करते हैं, और यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक आत्मा को उसके कर्मों के अनुसार उचित स्थान मिले.
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