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अखिलेश-राहुल के गठबंधन में कहां फंसा पेंच? दोनों दल 403 सीटों पर क्यों कर रहे तैयारी
Authored By: Galgotias Times Bureau
Published On: Monday, September 21, 2026
Last Updated On: Monday, September 21, 2026
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन को लेकर तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं है. दोनों दल साथ चुनाव लड़ने की बात कर चुके हैं, लेकिन सीट बंटवारे पर औपचारिक बातचीत शुरू होने में देरी हो रही है. इसी बीच सपा और कांग्रेस दोनों 403 सीटों पर संगठन और संभावित उम्मीदवारों की तैयारी कर रहे हैं. क्या यह सिर्फ रणनीतिक दबाव है या गठबंधन के भीतर सचमुच मतभेद बढ़ रहे हैं?
Authored By: Galgotias Times Bureau
Last Updated On: Monday, September 21, 2026
UP Election 2027: उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों के लिए सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन की चर्चा चल रही है, लेकिन सीट शेयरिंग का औपचारिक फॉर्मूला अभी सामने नहीं आया है. कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने सितंबर में कहा था कि पार्टी सभी 403 सीटों पर तैयारी कर रही है और संगठनात्मक काम पूरा होने के बाद सीट बंटवारे पर बातचीत आगे बढ़ेगी. दूसरी तरफ, सपा ने भी सभी सीटों पर अपनी तैयारी शुरू कर दी है.
यही वह स्थिति है जिसने गठबंधन की अंदरूनी रणनीति को चर्चा में ला दिया है. बाहर से दोनों पार्टियां साथ दिख रही हैं, लेकिन चुनावी जमीन पर दोनों अपने विकल्प खुले रखना चाहती हैं.
सपा क्यों नहीं कर रही जल्दबाजी?
ताजा रिपोर्ट के मुताबिक सपा ने 403 सीटों (Akhilesh Rahul alliance) पर संभावित उम्मीदवारों की प्रक्रिया शुरू कर दी है. टाइम्स ऑफ इंडिया ने सूत्रों के हवाले से बताया कि 100 से ज्यादा सीटों पर उम्मीदवारों के नाम तय किए जा चुके हैं, जबकि बाकी सीटों के लिए आवेदन प्रक्रिया चल रही है. हालांकि पार्टी ने अभी औपचारिक उम्मीदवार सूची जारी नहीं की है.
इसका एक मतलब यह भी है कि अखिलेश यादव की पार्टी सीट शेयरिंग की बातचीत शुरू होने से पहले अपना संगठन और संभावित उम्मीदवारों का पूरा होमवर्क तैयार रखना चाहती है. यानी बातचीत की मेज पर जाने से पहले सपा के पास हर सीट का अपना आकलन हो.
कांग्रेस को जल्दी क्यों है?
कांग्रेस की चिंता दूसरी है. पार्टी लंबे समय से उत्तर प्रदेश में अपना संगठन मजबूत करने और 2024 लोकसभा चुनाव UP Assembly Election 2027 में मिले राजनीतिक आधार को विधानसभा चुनाव में आगे ले जाने की कोशिश कर रही है. कांग्रेस नेताओं की ओर से जल्द सीट बंटवारे की मांग की जाती रही है, ताकि कार्यकर्ताओं और संभावित उम्मीदवारों को यह स्पष्ट हो सके कि उन्हें किन सीटों पर काम करना है.
Congress के लिए सीटों की संख्या केवल टिकट का सवाल नहीं है. जितनी सीटों पर पार्टी चुनाव लड़ती है, उतनी ही सीटों पर उसका संगठन, स्थानीय नेतृत्व और राजनीतिक पहचान सक्रिय रहती है. इसलिए कांग्रेस बातचीत में अपनी स्थिति कमजोर नहीं करना चाहती.
असली पेच कितनी सीटों का है?
यहीं गठबंधन की सबसे महत्वपूर्ण कहानी सामने आती है. कुछ रिपोर्टों में कांग्रेस के लिए करीब 105 सीटों के आसपास की मांग और सपा की तरफ से 60-70 सीटों के संभावित प्रस्ताव की चर्चा है. हालांकि दोनों पार्टियों ने इन आंकड़ों को अंतिम समझौते के रूप में सार्वजनिक रूप से घोषित नहीं किया है.
कांग्रेस के एक धड़े की नजर 2017 के फॉर्मूले पर भी है. उस चुनाव में सपा ने 298 और कांग्रेस ने 105 सीटों पर चुनाव लड़ा था. लेकिन वह गठबंधन चुनावी तौर पर सफल नहीं रहा और बाद के वर्षों में दोनों पार्टियों की राजनीतिक स्थिति भी बदली है.
2024 का नतीजा बातचीत को क्यों प्रभावित कर रहा है?
2024 लोकसभा चुनाव ने सपा-कांग्रेस गठबंधन को नई राजनीतिक जमीन दी. दोनों पार्टियां साथ लड़ीं और उत्तर प्रदेश में बीजेपी के खिलाफ विपक्षी मुकाबले में महत्वपूर्ण भूमिका में रहीं. यही वजह है कि 2027 के लिए गठबंधन को आगे बढ़ाने की बात दोनों ओर से होती रही है.
लेकिन विधानसभा चुनाव लोकसभा (UP Election 2027) से अलग गणित रखता है. 403 सीटों पर स्थानीय उम्मीदवार, जातीय समीकरण, संगठन और सीट-दर-सीट ताकत ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है. 2022 में सपा और कांग्रेस अलग-अलग लड़ी थीं; सपा ने 111 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस को सिर्फ एक सीट मिली थी.
क्या गठबंधन टूटने की स्थिति है?
अभी उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के आधार पर गठबंधन टूटने की कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है. बल्कि अखिलेश यादव की तरफ से कांग्रेस के साथ 2027 में आगे बढ़ने की बात कही गई है. दूसरी ओर कांग्रेस भी गठबंधन चाहती है, लेकिन सीटों और बातचीत की टाइमिंग को लेकर उसकी अपनी प्राथमिकताएं हैं.
इसलिए 403 सीटों की तैयारी को सीधे गठबंधन टूटने का संकेत मानना जल्दबाजी होगी. ज्यादा सटीक तस्वीर यह है कि दोनों दल गठबंधन का विकल्प बनाए रखते हुए अपनी-अपनी सौदेबाजी की स्थिति मजबूत कर रहे हैं. असली परीक्षा तब होगी जब सीटों और खास सीटों के दावों पर औपचारिक बातचीत शुरू होगी.
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