WhatsApp यूजरनेम फीचर पर विवाद: प्राइवेसी, साइबर सुरक्षा और जवाबदेही के बीच फंसे करोड़ों भारतीय यूजर्स
Authored By: Nishant Singh
Published On: Friday, July 3, 2026
Updated On: Friday, July 3, 2026
WhatsApp के यूजरनेम फीचर को लेकर सरकार और Meta आमने-सामने हैं. जहां कंपनी इसे प्राइवेसी बढ़ाने वाला कदम बता रही है, वहीं सरकार साइबर ठगी की आशंका जता रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि समाधान फीचर रोकने में नहीं, बल्कि मजबूत डेटा सुरक्षा कानून और प्रभावी साइबर सुरक्षा व्यवस्था बनाने में है.
Authored By: Nishant Singh
Updated On: Friday, July 3, 2026
WhatsApp का नया यूजरनेम फीचर भारत में लॉन्च होने से पहले ही विवादों में आ गया है. कंपनी का कहना है कि इस फीचर से यूजर्स को किसी नए व्यक्ति से बातचीत शुरू करने के लिए अपना मोबाइल नंबर साझा नहीं करना पड़ेगा, जिससे उनकी निजता पहले से अधिक सुरक्षित होगी. वहीं भारत सरकार ने इस फीचर को लेकर चिंता जताते हुए कंपनी को नोटिस भेजा है. सरकार का मानना है कि यदि यूजरनेम के जरिए किसी दूसरे व्यक्ति, संस्था या सरकारी विभाग जैसी पहचान बनाई गई तो ऑनलाइन ठगी, फिशिंग और डिजिटल अरेस्ट जैसे अपराध बढ़ सकते हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस विवाद के बीच आम यूजर के हितों की रक्षा कौन करेगा.
WhatsApp के पक्ष में क्या हैं तर्क?
WhatsApp का दावा है कि यूजरनेम फीचर लोगों की प्राइवेसी मजबूत करेगा. आज किसी से WhatsApp पर जुड़ने के लिए मोबाइल नंबर देना जरूरी होता है. इससे कई बार नंबर स्पैम कॉल, फर्जी लोन ऑफर और साइबर ठगी करने वालों तक पहुंच जाता है. नया फीचर इस समस्या को काफी हद तक कम कर सकता है.
WhatsApp के प्रमुख दावे
- मोबाइल नंबर सार्वजनिक करने की जरूरत नहीं होगी.
- फेसबुक और इंस्टाग्राम की तरह यूजरनेम से पहचान संभव होगी.
- बड़े ब्रांड, सरकारी संस्थान और वेरिफाइड अकाउंट्स के नाम सुरक्षित रहेंगे.
- यूजरनेम की कोई सार्वजनिक डायरेक्टरी नहीं होगी.
- ब्लॉक, रिपोर्ट और सुरक्षा संबंधी मौजूदा फीचर पहले की तरह काम करेंगे.
सरकार को किस बात की चिंता है?
सरकार का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति किसी प्रसिद्ध संस्था या अधिकारी जैसा यूजरनेम बना लेता है, तो लोगों को आसानी से भ्रमित किया जा सकता है. भारत में पहले से ही साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं. ऐसे में नया फीचर अपराधियों के लिए एक नया रास्ता बन सकता है.
सरकार की मुख्य चिंताएं
- फर्जी पहचान बनाकर ठगी की आशंका.
- फिशिंग और डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों में बढ़ोतरी.
- साइबर अपराधियों की पहचान करना कठिन हो सकता है.
- कानून प्रवर्तन एजेंसियों की जांच प्रभावित होने की संभावना.
क्या प्राइवेसी के पीछे डेटा का भी खेल है?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फीचर केवल प्राइवेसी तक सीमित नहीं है. WhatsApp यूजरनेम बनाते समय फेसबुक और इंस्टाग्राम अकाउंट से लिंक करने का विकल्प भी दे सकता है. इससे Meta के अलग-अलग प्लेटफॉर्म एक-दूसरे से और अधिक जुड़ जाएंगे. ऐसे में कंपनी के पास यूजर की डिजिटल प्रोफाइल पहले से अधिक विस्तृत हो सकती है. इसलिए कुछ लोग इसे प्राइवेसी के साथ-साथ डेटा इकोसिस्टम मजबूत करने की रणनीति भी मान रहे हैं.
क्या फीचर रोकने से साइबर फ्रॉड खत्म हो जाएगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल यूजरनेम फीचर रोक देना साइबर अपराधों का स्थायी समाधान नहीं है. आज Gmail, Telegram, Instagram और X जैसे कई प्लेटफॉर्म पर वर्षों से यूजरनेम की सुविधा मौजूद है. असली चुनौती अपराधियों तक पहुंचने और ठगी के पैसों को समय रहते रोकने की है.
साइबर फ्रॉड रोकने के प्रभावी उपाय
- म्यूल बैंक खातों की तेजी से पहचान.
- बैंक और साइबर एजेंसियों के बीच रियल-टाइम डेटा साझा करना.
- ठगी के तुरंत बाद संदिग्ध खातों को फ्रीज करने की व्यवस्था.
- डिजिटल अपराधों की तेज जांच और सख्त कार्रवाई.
प्राइवेसी और सुरक्षा के बीच संतुलन जरूरी
WhatsApp का यूजरनेम फीचर पूरी तरह सही या पूरी तरह गलत नहीं कहा जा सकता. यह एक ओर यूजर्स की निजता बढ़ा सकता है, तो दूसरी ओर इसका दुरुपयोग भी संभव है. इसलिए जरूरत किसी तकनीक पर रोक लगाने की नहीं, बल्कि मजबूत डेटा सुरक्षा कानून, प्रभावी साइबर सुरक्षा व्यवस्था और टेक कंपनियों की स्पष्ट जवाबदेही तय करने की है. जब तक प्राइवेसी और सुरक्षा के बीच संतुलन नहीं बनाया जाएगा, तब तक करोड़ों भारतीय यूजर्स के हित पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो पाएंगे.
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