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देश में अभी भी हो रहा है बाल विवाह, सुप्रीम कोर्ट को क्यों जारी करना पड़ा ये दिशा-निर्देश
Authored By: सतीश झा
Published On: Friday, October 18, 2024
Last Updated On: Friday, October 18, 2024
भारत में बाल विवाह की प्रथा अभी भी जारी है, भले ही सरकार और कई गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) द्वारा इसे रोकने के लिए कई प्रयास किए जा रहे हैं। बाल विवाह न केवल कानून के खिलाफ है, बल्कि यह बच्चों के अधिकारों और उनके विकास के लिए भी हानिकारक है। इस प्रथा के कारण लड़कियों और लड़कों दोनों को उनके बचपन से वंचित कर दिया जाता है, जिससे उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य की संभावनाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
Authored By: सतीश झा
Last Updated On: Friday, October 18, 2024
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने देशभर में बाल विवाह पर अहम फैसला देते हुए दिशा-निर्देश जारी किया है। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ (Chief Justice DY Chandrachud) की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि बाल विवाह (Child Marriage) रोकथाम अधिनियम को किसी भी पर्सनल लॉ के तहत परंपराओं से बाधित नहीं किया जा सकता।
बाल विवाह के कारण
- गरीबी: आर्थिक तंगी के कारण माता-पिता अपने बच्चों, विशेषकर लड़कियों की जल्दी शादी कर देते हैं ताकि उन पर से जिम्मेदारी कम हो सके।
- शिक्षा की कमी: अशिक्षा और जागरूकता की कमी के कारण लोग बाल विवाह के नकारात्मक प्रभावों से अनजान रहते हैं।
- सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यताएँ: कई समुदायों में यह मान्यता है कि लड़कियों की जल्दी शादी करना उनके परिवार के सम्मान और सुरक्षा के लिए आवश्यक है।
- लिंग भेदभाव: समाज में लड़कियों को लड़कों के मुकाबले कम महत्वपूर्ण समझा जाता है, जिसके कारण उन्हें बोझ के रूप में देखा जाता है और जल्दी शादी कर दी जाती है।
बाल विवाह के प्रभाव
- स्वास्थ्य पर प्रभाव: कम उम्र में शादी और गर्भधारण के कारण लड़कियों को शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। मातृ मृत्यु दर और नवजात शिशु मृत्यु दर भी बढ़ जाती है।
- शिक्षा से वंचित रहना: शादी के बाद, लड़कियों और लड़कों दोनों की शिक्षा छूट जाती है, जिससे उनके आगे के विकास और रोजगार के अवसरों पर असर पड़ता है।
- गरीबी : बाल विवाह के कारण बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं, जिससे वे आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं हो पाते और गरीबी का चक्र जारी रहता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, जीवन साथी चुनने की स्वतंत्र इच्छा का उल्लंघन
कोर्ट ने कहा कि माता-पिता अपने नाबालिग बेटियों या बेटों की शादी के लिए जीवनसाथी नहीं चुन सकते, भले उनका विवाह बालिग होने के बाद कराया जाए। बालिग होने से पहले शादी कराने के लिए सगाई करना नाबालिगों के जीवन साथी चुनने की स्वतंत्र इच्छा का उल्लंघन है। कोर्ट ने इस मामले पर दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा कि आम लोगों में इसको लेकर जागरुकता बढ़ाने के उपाय किये जाने चाहिए। हर समुदाय के लिए अलग तरीके अपनाए जाएं। समाज की स्थिति समझ कर ही रणनीति बने, क्योंकि दंडात्मक तरीके से सफलता नहीं मिलती। कोर्ट ने कहा कि बाल विवाह निषेध कानून को पर्सनल लॉ से ऊपर रखने का मसला संसद में लंबित है।
याचिका में राज्यों पर लगाया गया था आरोप
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई याचिकाकर्ताओं में से एक सोसाइटी फॉर इनलाइटनमेंट एंड वॉलंटरी एक्शन ने आरोप लगाया था कि राज्यों के स्तर पर बाल विवाह निषेध अधिनियम (Prohibition of Child Marriage Act) का सही तरह से अमल नहीं हो पा रहा है, जिसके चलते बाल विवाह के मामले बढ़ रहे हैं। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से बातचीत कर केंद्र सरकार को बताने के लिए कहा था कि बाल विवाह पर रोक लगाने के कानून पर प्रभावी अमल के लिए उसकी ओर से क्या कदम उठाए गए हैं। याचिका में बाल विवाह निषेध अधिनियम के प्रावधान को प्रभावशाली रूप से लागू कराए जाने की मांग की गई थी।
(हिन्दुस्थान समाचार एजेंसी के इनपुट के साथ)













