Khatu Shyam Birthday 2024 : देश भर में मन रहा खाटू श्याम जन्मोत्सव, माने जाते हैं चमत्कारिक देव

Authored By: स्मिता

Published On: Tuesday, November 12, 2024

Last Updated On: Tuesday, November 12, 2024

khatu shyam birthday 2024
khatu shyam birthday 2024

श्रीकृष्ण के अनुसार, बर्बरीक या खाटू श्याम क्षत्रियों में सबसे ज्यादा वीर थे, पांडवों की जीत सुनिश्चित करने के लिए श्रीकृष्ण ने उनका सिर दान में मांग लिया। बर्बरीक अपने पिछले जन्म में एक यक्ष थे। खाटू श्याम को कृष्ण का अवतार भी माना जाता है।

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Devutthana Ekadashi 2024 : मनाया जा रहा खाटू श्याम का जन्मोत्सव

हिंदू धर्म में खाटूश्याम घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक के प्रतीक स्वरुप माना जाता है। मान्यता है कि कार्तिक माह शुक्ल पक्ष की एकादशी यानि देव उठनी एकादशी (Devutthana Ekadashi 2024) को खाटू श्याम का जन्म (khatu shyam birthday 2024) हुआ था। बर्बरीक की कथा की शुरुआत महाभारत से होती है। बर्बरीक या खाटू श्यामजी या श्याम बाबा पांडव भाइयों में दूसरे बहादुर राजकुमार भीम के पोते थे। बर्बरीक घटोत्कच के पुत्र थे और घटोत्कच भीम और हिडिम्बा के पुत्र थे। अब तो खाटू श्याम की देश भर में पूजा होती है, लेकिन इनके नाम से भारत के राजस्थान राज्य में सीकर जिले के सीकर शहर से 43 किमी दूर धार्मिक महत्व का शहर खाटू है। माना जाता है कि खाटू गांव प्रसिद्ध खाटू श्याम मंदिर का घर है। खाटू श्याम को भगवान कृष्ण का भी अवतार माना जाता है। इन्हें चमत्कार कर भक्तों की मदद करनेवाला भी माना जाता है।

बर्बरीक की कथा

बर्बरीक को राजस्थान में खाटूश्याम जी और गुजरात में बलियादेव के नाम से जाना जाता है। कथा के अनुसार, बर्बरीक एक संत और महान योद्धा थे। बर्बरीक के दादा राक्षस राजा मूष के अत्याचारों से भयभीत होकर इंद्र सहित सभी देवताओं और ऋषियों ने श्री कृष्ण और बलराम से मदद मांगी। भगवान कृष्ण ने देवताओं और ऋषियों की मदद के लिए मूष से युद्ध किया और उसका वध कर दिया। श्रीकृष्ण के अनुसार, बर्बरीक क्षत्रियों में सबसे ज्यादा वीर थे, पांडवों की जीत सुनिश्चित करने के लिए श्रीकृष्ण ने उनका सिर दान में मांग लिया। अपने वचन को पूरा करते हुए और कृष्ण की आज्ञा का पालन करते हुए बर्बरीक ने अपना सिर उन्हें दान में दे दिया। बर्बरीक अपने पिछले जन्म में एक यक्ष थे।

श्याम नाम की धुन गूंजती है

देश भर में खाटू श्याम के नाम से शोभा यात्रा निकाली जाती है। शोभा यात्रा में भजन कीर्तन के बीच भक्त ‘हारे हारे हारे हारे का सहारा तू…, मोर छड़ी लहराई रे…, सांवरे की महफिल को सांवरा सजाता है’ गाते हैं। गीत की धुनों पर शोभा यात्रा में शामिल श्रद्धालु भक्तिभाव से झूमते रहते हैं। बैंड बाजे में श्याम नाम की धुन गूंज रही थी। राजस्थान, वाराणसी के अतिरिक्त अन्य स्थानों पर भी रास्ते भर भजन लहर लहर लहराई रे श्याम ध्वजा लहराई रे… की धुन गूंजती रहती है। शोभा यात्रा में फूलों से सजी गाड़ी पर भगवान कृष्ण रूपी प्रभु श्याम की तैलीय चित्र रखा जाता है। यह गाड़ी शोभा यात्रा में आगे-आगे चलती है। इसके पीछे समाज की महिलाएं, पुरुष, बच्चे श्याम ध्वजा लिए चलते हैं।

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राधा-कृष्ण और शंकर-पार्वती गणेश की जीवन्त झांकी

महिलाएं सजी थाली लिए चलती हैं। रथ पर राधा-कृष्ण और शंकर-पार्वती गणेश की जीवन्त झांकी चलती है। रास्ते भर श्रद्धालु भगवान के तैलीय चित्र और शोभा यात्रा पर पुष्प अर्पित करते हैं। वाराणसी में शोभा यात्रा बुलानाला, चौक, बांसफाटक, गोदौलिया, गिरजाघर होते हुए लक्सा स्थित श्री श्याम मंदिर में जाकर समाप्त हुई। इसके बाद प्रभु के चरणों में निशान अर्पण की गई। प्रभु की आरती उतारी गई। श्याम चालीसा पढ़ा गया।

(हिन्दुस्थान समाचार के इनपुट के साथ) 

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स्मिता धर्म-अध्यात्म, संस्कृति-साहित्य, और स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर शोधपरक और प्रभावशाली पत्रकारिता में एक विशिष्ट नाम हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में उनका लंबा अनुभव समसामयिक और जटिल विषयों को सरल और नए दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत करने में उनकी दक्षता को उजागर करता है। धर्म और आध्यात्मिकता के साथ-साथ भारतीय संस्कृति और साहित्य के विविध पहलुओं को समझने और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने में उन्होंने विशेषज्ञता हासिल की है। स्वास्थ्य, जीवनशैली, और समाज से जुड़े मुद्दों पर उनके लेख सटीक और उपयोगी जानकारी प्रदान करते हैं। उनकी लेखनी गहराई से शोध पर आधारित होती है और पाठकों से सहजता से जुड़ने का अनोखा कौशल रखती है।
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