Ayushman Bharat Yojana: किसे फायदा, किसे नुकसान? जानें पूरी जानकारी
Authored By: Galgotias Times Bureau
Published On: Thursday, September 24, 2026
Updated On: Thursday, September 24, 2026
Ayushman Bharat Yojana से जुड़े फायदे और सीमाओं को समझें. जानें किसे Ayushman Card का लाभ मिलता है, पात्रता क्या है और किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है.
Authored By: Galgotias Times Bureau
Updated On: Thursday, September 24, 2026
Ayushman Bharat Yojana: 23 सितंबर 2018 को शुरू हुई आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री आरोग्य योजना (AB-PMJAY) ने आठ साल पूरे कर लिए हैं. सरकार इसे दुनिया की सबसे बड़ी सार्वजनिक रूप से वित्तपोषित स्वास्थ्य सुरक्षा योजनाओं(Ayushman Bharat) में गिनती है. योजना का मूल उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती होने पर सालाना पांच लाख रु पये तक का कैशलेस कवर देना है. किसी-किसी राज्य में सालाना 25 लाख रुपये का कैशलेस कवर भी शामिल है. जैसे राजस्थान में 25 लाख की शुरुआती योजना थी, जिसे घटाकर 10 लाख रुपये कर दिया गया. राजस्थान में इस योजना को ‘चिरंजीवी योजना’ का नाम दिया गया है. उसी तरह पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार के समय इस योजना को ‘स्वास्थ्य साथी योजना’ का नाम दिया गया था. इन आठ वर्षो के दरमियान विश्व की सबसे बड़ी स्वास्थ्य सेवा योजना आज कहां खड़ी है, इसकी पड़ताल करती एक खास रिपोर्ट..
प्रधानमंत्री मोदी ने आंकड़ों के सहारे बताई उपलब्धि
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अनुसार, देश में कुल स्वास्थ्य खर्च में लोगों की अपनी जेब से होने वाली हिस्सेदारी 2014-15 के 62.6 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 43.4 प्रतिशत हो गई. सरकार इस गिरावट में सार्वजनिक स्वास्थ्य निवेश और सार्वजनिक रूप से वित्तपोषित स्वास्थ्य योजनाओं, जिनमें PM-JAY भी शामिल है, की भूमिका बताती है.
उपलब्धि तो है मगर सवाल भी कई हैं
आठवीं वषर्गांठ पर सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, 21 सितंबर 2026 तक 48.54 करोड़ से अधिक आयुष्मान कार्ड बन चुके थे. 31 अगस्त 2026 तक करीब 13.25 करोड़ अस्पताल दाखिलों के लिए 2.03 लाख करोड़ रु पये के उपचार अधिकृत किए जा चुके थे और 38,000 से अधिक सरकारी व निजी अस्पताल योजना से जुड़े थे.
आंकड़े योजना के बड़े विस्तार की तस्वीर पेश करते हैं, लेकिन आठ साल बाद असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने कार्ड बने या कितने इलाज हुए. सवाल यह भी है कि मरीज को वास्तव में कितनी आर्थिक राहत मिली, सरकारी अस्पतालों की स्थिति कितनी बदली और निजी अस्पतालों के लिए यह व्यवस्था कितनी टिकाऊ साबित हुई?
किसे फायदा हुआ?
आयुष्मान का सबसे महत्वपूर्ण लाभ (Ayushman Bharat benifits) उन परिवारों के लिए है जिनके पास महंगे इलाज के लिए पर्याप्त बचत नहीं होती. कैंसर, हृदय रोग, किडनी की बीमारी, सर्जरी और दूसरी गंभीर स्थितियों में अस्पताल का खर्च कई परिवारों को कर्ज लेने या संपत्ति बेचने तक पहुंचा सकता है. ऐसे में कैशलेस अस्पताल सुविधा आर्थिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम बनती है.
1. गरीब और ईबीसी वर्ग को सबसे बड़ा फायदा
अब तक 35 करोड़ से ज्यादा आयुष्मान कार्ड (Ayushman Bharat Card) बन चुके हैं और 8.5 करोड़ से ज्यादा लोग फ्री में अस्पताल में भर्ती हो चुके हैं. 5 लाख तक का इलाज प्राइवेट अस्पताल में भी फ्री मिल रहा है, जिसके लिए पहले जमीन-जेवर बेचना पड़ता था.
2. प्राइवेट अस्पतालों को
सरकार हर इलाज के लिए पैकेज देती है. छोटे शहरों के कई प्राइवेट अस्पतालों की 60-70% कमाई अब आयुष्मान से ही आ रही है.
3. बुजुर्गों को नया विस्तार
पिछले 1 साल में 70 साल से ऊपर के सभी बुजुगरे के लिए आयुष्मान लागू कर दिया गया है, चाहे उनकी आय कुछ भी हो. इससे मिडिल क्लास के बुजुर्गों को भी फायदा मिलना शुरू हुआ है.
किसे नुकसान या कहें योजना की क्या दिक्कतें हैं?
राजस्थान में सेवा दे रहे डॉ. राजशेखर यादव योजना के उद्देश्य को काफी बेहतर बताते हैं, मगर कई बिंदुओं पर उन्होंने योजना को लेकर सरकार की कार्यशैली से नाइत्तेफाकी भी जताई. उनका कहना है कि इस योजना की हर वर्ष समीक्षा होनी चाहिए, जो कि नहीं होती है. वहीं बजट का आवंटन भी निजी और सरकारी अस्पतालों के लिए अलग-अलग होना चाहिए क्योंकि दोनों के खर्च अलग होते हैं. कई प्रमुख बिंदुओं पर उनकी राय-
1. मिडिल क्लास जो गरीब भी नहीं, बुजुर्ग भी नहीं:
जिसकी सालाना आय 2-3 लाख है, राशन कार्ड नहीं है, वो इस योजना से बाहर है. उसे न सरकारी मदद मिलती है, न 5 लाख का बीमा.
2. सरकारी खजाने और सरकारी अस्पतालों पर बोझ:
सरकार को हर साल लगभग 12,000-15,000 करोड़ रु पये बीमा कंपनियों को देना पड़ता है. कई राज्यों में सरकार ने समय पर पैसा नहीं दिया तो अस्पतालों ने इलाज रोक दिया.
3. घोटाले और फर्जी बिल
कैग की रिपोर्ट में आया था कि कई जगह एक ही मोबाइल नंबर पर हजारों कार्ड, मृत लोगों के नाम पर इलाज, और एक ही दिन में एक मरीज का कई बार ऑपरेशन दिखाया गया. इससे असली जरूरतमंद का हक मारा जाता है.
4. इलाज की गुणवत्ता का सवाल
कई बड़े प्राइवेट अस्पताल कहते हैं कि सरकार का पैकेज बहुत कम है-जैसे घुटने के ऑपरेशन का 80,000 जबकि प्राइवेट में 2 लाख लगता है. इसलिए कई बार अस्पताल आयुष्मान मरीज को सस्ती दवा/कम दिन भर्ती रखते हैं.
वहीं कोलकाता में वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. रंजीत कुमार सिन्हा के मुताबिक यह व्यवस्था फिलहाल एक अंतरिम या अस्थायी समाधान हो सकती है. क्योंकि भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में हर किसी को सस्ता इलाज मुहैया कराना आसान तो बिल्कुल नहीं है.
उदाहरण के लिए; जर्मनी में, यह मान्यता कि स्वास्थ्य सेवा सरकार की एक बुनियादी ज़िम्मेदारी है, निजी अस्पतालों को सार्वजनिक वित्तीय सहायता के रूप में अवश्य मिलती है. हालांकि, यह सहायता किसी बिना शर्त राहत के बजाय एक कड़े, वैधानिक और व्यावहारिक तंत्र के तहत काम करती है. यह प्रणाली जर्मन स्वास्थ्य सेवा कानून के स्वामित्व के बहुलवाद के सिद्धांत पर आधारित है.
अगर समग्रता से इस योजना के बारे में बात की जाए तो सरकार के उद्देश्य या उसकी मंशा पर सवाल नहीं खड़ा करना चाहिए, मगर वषर्वार ऑडिटिंग, अस्पतालों की बीच-बीच में हड़ताल करने की प्रवृत्ति, सरकार की तरफ से पेमेंट देरी से करना आदि अनेक कारण हैं, जिस पर सरकार को गंभीरता से विचार करने की जरूरत है.
Written By- राजीव मंडल
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